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धरती की तरफ बढ़ रहा है सूरज का महातूफान; भारत समेत दुनिया भर में दिख सकती है अद्भुत रोशनी

सूर्य की सतह पर हुए विस्फोट से एक तेज मैग्नेटिक तूफान पृथ्वी की ओर बढ़ रहा है. इसके असर से भारत के उत्तरी क्षेत्रों में नॉर्दन लाइट्स (ऑरोरा) दिखने की संभावना है.

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सूरज से निकला महातूफान सीधे भारत की तरफ आ रहा है. (File Photo: Getty)
सूरज से निकला महातूफान सीधे भारत की तरफ आ रहा है. (File Photo: Getty)

हमारा सूर्य इस समय बेहद आक्रामक और अशांत नजर आ रहा है. सूरज की सतह पर इस पूरे हफ्ते से लगातार भयानक विस्फोट हो रहे हैं, जिससे वहां से चुंबकीय गैसों के विशाल गुबार बेहद तेज गति से अंतरिक्ष में फैल रहे हैं. इसी कड़ी में एक बेहद बड़ी और डराने वाली वैज्ञानिक घटना सामने आई है.

सूर्य की सतह पर हुए एक शक्तिशाली विस्फोट के बाद वहां से एक विशाल कोरोनल मास इजेक्शन और अत्यधिक घनत्व वाला फिलामेंट सीधे पृथ्वी की ओर बढ़ रहा है.नासा और स्पेस वेदर प्रेडिक्शन सेंटर ने इसे लेकर बेहद गंभीर चेतावनी जारी की है.

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यह सौर तूफान पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराने वाला है, जिसके कारण अंतरिक्ष मौसम विभाग ने G3 कैटेगरी के भू-चुंबकीय तूफान यानी जियोमैग्नेटिक तूफान की घोषणा की है. इस सौर आंधी की सबसे बड़ी और खूबसूरत बात यह है कि इसके प्रभाव से भारत के उत्तरी हिस्सों, यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के आसमान में एक अनोखा और चमकीला नजारा देखने को मिल सकता है, जिसे विज्ञान में ऑरोरा (Aurora) या उत्तरी रोशनी (Northern Lights) कहा जाता है.  

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 Massive solar eruption Northern Lights India

कितनी रफ्तार से बढ़ रहा है हमारी तरफ?

सूर्य की सतह पर 'एक्टिव रीजन 4461' नाम के एक बेहद सक्रिय हिस्से में 6 जून, 2026 की सुबह एक जोरदार धमाका हुआ. इस धमाके को वैज्ञानिकों ने M1.8 श्रेणी का सोलर फ्लेयर नाम दिया है. सोलर फ्लेयर का मतलब होता है सूर्य की सतह से निकलने वाला अचानक और अत्यधिक तेज रेडिएशन का विस्फोट, जो चुंबकीय ऊर्जा के अचानक मुक्त होने के कारण पैदा होता है. इस बार का यह विस्फोट इसलिए खास और चिंताजनक है क्योंकि इसके केंद्र से एक बेहद घना, भारी और अत्यधिक चुम्बकीय 'फिलामेंट' बाहर निकला है. 

यह फिलामेंट इस समय हमारे आंतरिक सौरमंडल को पार करते हुए 1,400 किलोमीटर प्रति सेकंड की अविश्वसनीय और डरावनी रफ्तार से सीधे पृथ्वी की दिशा में आगे बढ़ रहा है. स्पेस वेदर वैज्ञानिक तमीथा स्कोव ने उपग्रह से मिली तस्वीरों का विश्लेषण करने के बाद इसे एक'टेक्स्टबुक कोर फिलामेंट इरप्शन कहा है, यानी एक ऐसा आदर्श विस्फोट जो सीधे तौर पर पृथ्वी के वायुमंडल को प्रभावित करने की पूरी क्षमता रखता है.

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क्या होता है फिलामेंट और कितना खतरनाक?

मान लीजिए कि आसमान में बिजली या चुंबक से बना एक विशाल पुल हवा में लटका हुआ है. यह पुल किसी लोहे या पत्थर के खंभे पर नहीं, बल्कि सूर्य के अदृश्य मैग्नेटिक फील्ड्स के सहारे टिका है. इस पुल के भीतर गैस की एक बेहद घनी और ठंडी नदी बह रही है. इसी अद्भुत संरचना को सूर्य का फिलामेंट कहा जाता है.

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सूर्य का बाहरी वायुमंडल, जिसे कोरोना कहते हैं, वहां तापमान लगभग 10 से 20 लाख डिग्री सेल्सियस तक होता है. लेकिन इस फिलामेंट के अंदर फंसी हुई प्लाज्मा का तापमान केवल 5,000 से 10,000 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है. 

सूर्य के पैमाने पर यह बेहद ठंडा और बहुत भारी माना जाता है. जब इस भारी गैस को थामे रखने वाला चुंबकीय पिंजरा कमजोर या अस्थिर हो जाता है, तो यह फिलामेंट अचानक टूट जाता है. रबर बैंड की तरह झटके से अंतरिक्ष में फैल जाता है. चूंकि यह फिलामेंट बहुत भारी और घना है, इसलिए जब यह पृथ्वी के चुंबकीय कवच से टकराएगा, तो एक बहुत ही तीव्र सौर तूफान पैदा करेगा.

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चुंबकीय क्षेत्र का S-शेप: जिसने बढ़ाई नासा की चिंता

वैज्ञानिकों ने बताया कि सूरज के जिस हिस्से से यह फिलामेंट निकला है, वहां की चुंबकीय रेखाएं अंग्रेजी के 'S' अक्षर के आकार में एक स्प्रिंग की तरह बुरी तरह आपस में उलझी और मरोड़ी हुई थीं. जब कोई चुंबकीय क्षेत्र इस तरह मुड़ जाता है, तो वह अपने अंदर अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा जमा कर लेता है.

जैसे ही यह चुंबकीय तनाव अपनी चरम सीमा पर पहुंचा, ये रेखाएं अचानक टूट गईं और आपस में दोबारा जुड़ गईं. इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में 'मैग्नेटिक रीकनेक्शन' कहते हैं. इसे आप ऐसे समझ सकते हैं जैसे दो रबर बैंड्स को उनकी क्षमता से ज्यादा खींचकर अचानक छोड़ दिया जाए.

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इस झटके से एक तरफ भयानक एक्स-रे (X-ray) विकिरण निकला, जिसने पृथ्वी पर रेडियो संचार व्यवस्था को प्रभावित किया. दूसरी तरफ एक अरब टन वजनी चुम्बकीय प्लाज्मा का बादल 1,400 किमी/सेकंड की रफ्तार से हमारी तरफ चल पड़ा.

क्या भारत के आसमान में भी दिखेगी हरी-लाल रोशनी?

अंतरिक्ष मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इसकी पूरी संभावना है. जब यह चार्ज्ड सौर कण पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में मौजूद गैसों (जैसे ऑक्सीजन और नाइट्रोजन) से टकराते हैं, तो आसमान में हरे, बैंगनी और लाल रंग के खूबसूरत चमकदार पर्दे जैसे नजारे बनते हैं. आमतौर पर यह नजारा केवल ध्रुवीय क्षेत्रों (जैसे अलास्का, कनाडा या नॉर्वे) में ही दिखाई देता है. लेकिन जब सौर तूफान G3 (Strong) या उससे ऊपर G4 (Severe) श्रेणी का होता है, तो ऑरोरा का यह घेरा खिसककर नीचे आ जाता है.

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यदि सोमवार या मंगलवार की रात को आसमान पूरी तरह साफ और अंधेरा रहता है, तो उत्तरी भारत (जैसे लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के ऊंचे इलाके), मध्य यूरोप और दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया के आसमान में रंग-बिरंगी रोशनी की चमकीली चादर देखी जा सकती है. भारत में नुब्रा वैली, पैंगोंग झील, कश्मीर के कुछ हिस्सों में दिखाई पड़ेगा. इससे पहले मई 2024 में आए एक ऐतिहासिक सौर तूफान (G5 श्रेणी) के दौरान भी भारत के लद्दाख में ऑरोरा की अद्भुत तस्वीरें कैमरे में कैद की गई थीं।

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जब दो तूफान बन जाते हैं एक महादानव

इस सौर तूफान की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि अंतरिक्ष में पहले से ही उथल-पुथल मची हुई है. इस हफ्ते की शुरुआत में सूरज के एक अन्य हिस्से से भी कई छोटे-छोटे विस्फोट हुए थे, जिनकी वजह से अंतरिक्ष में पहले से ही धीमी गति वाले सौर बादलों का कचरा जमा है.

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जब पीछे से आ रहा यह नया और अत्यधिक तेज (1,400 किमी/सेकंड) चुंबकीय बादल आगे चल रहे धीमे बादलों को अपनी चपेट में ले लेगा, तो इसे 'कैनीबल सीएमई' (Cannibal CME) कहा जाता है. इस प्रक्रिया में दोनों तूफान आपस में मिलकर एक विशाल और अधिक घने महादानव में बदल जाते हैं. अगर ऐसा होता है, तो पृथ्वी पर आने वाले भू-चुंबकीय तूफान की तीव्रता अनुमान से कहीं ज्यादा खतरनाक और व्यापक हो सकती है.

केवल 15 से 60 मिनट पहले चलेगा असली खेल का पता

इस पूरे सौर महा-संग्राम में एक सबसे बड़ा सस्पेंस अभी भी बरकरार है, जिसका जवाब खुद सूरज भी नहीं दे सकता. जब यह तूफान पृथ्वी के पास पहुंचेगा, तो पृथ्वी का चुंबकीय कवच इससे हमारी रक्षा करेगा. लेकिन यह कवच टूटेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि सौर बादल के भीतर का चुंबकीय क्षेत्र किस दिशा में है.

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अगर यह 'Bz' दक्षिण की तरफ इशारा करता हुआ आया, तो यह पृथ्वी के विपरीत चुंबकीय क्षेत्र से तुरंत जुड़ जाएगा और हमारे सुरक्षा कवच का दरवाजा खुल जाएगा, जिससे आसमान में भयानक और भव्य ऑरोरा दिखाई देंगे. लेकिन इसका सटीक पता तब चलेगा जब यह बादल पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर दूर स्थित निगरानी सैटेलाइट्स को पार करेगा. वहां से हमें केवल 15 से 60 मिनट पहले ही अंतिम चेतावनी मिलेगी.  

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