हिमालय में जितनी बर्फबारी का अनुमान अब तक लगाया जा रहा था, असल में उससे कहीं ज्यादा बर्फ गिर रही है. यह दावा एक नई अंतरराष्ट्रीय स्टडी में किया गया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, दुनियाभर में इस्तेमाल होने वाले मौसम डेटा और मॉडल हिमालय के कई इलाकों में बर्फबारी का सही अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं. इससे मौसम का पूर्वानुमान, पानी का आकलन और बर्फानी तूफान की चेतावनी पर असर पड़ सकता है.
यह स्टडी इस महीने मंथली वेदर रिव्यू जर्नल में छपी प्रकाशित हुई है. इसका नेतृत्व ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के वैज्ञानिक सिद्धार्थ गुम्बर ने किया. इस रिसर्च में यूके मेट ऑफिस, IIT खड़गपुर, यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स, यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज, यूनिवर्सिटी ऑफ शेफील्ड और यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम के वैज्ञानिक भी शामिल रहे.
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वैज्ञानिकों ने हिमालय में बर्फबारी को समझने के लिए एक नया हाई-रिजॉल्यूशन मौसम मॉडल तैयार किया. इसमें ऐसे नए बर्फबारी के आंकड़े भी जोड़े गए, जो पहले ग्लोबल मौसम डेटा में शामिल नहीं थे. इसके बाद पता चला कि कई जगहों पर पहले के अनुमान से ज्यादा बर्फ गिर रही है.

रिसर्चर्स का कहना है कि हिमालय का इलाका बहुत ऊंचा और ऊबड़-खाबड़ है. यहां कुछ किलोमीटर की दूरी पर भी बर्फबारी में बड़ा फर्क हो सकता है. लेकिन दुनियाभर में इस्तेमाल होने वाले मौसम मॉडल इतने बड़े इलाके का एक साथ अनुमान लगाते हैं कि वे ऐसे छोटे बदलावों को सही तरह से नहीं पकड़ पाते. इसी वजह से कई जगहों पर बर्फबारी का आंकड़ा कम दिखाई देता है.
मनाली में 37% तक कम निकला अनुमान
स्टडी में हिमाचल प्रदेश के मनाली इलाके का भी अध्ययन किया गया. वैज्ञानिकों ने पाया कि पहले इस्तेमाल किए जा रहे मौसम डेटा ने सिर्फ एक सर्दी के मौसम में कुल बर्फबारी का अनुमान 37 फीसदी तक कम लगाया था. नए मॉडल में नए आंकड़े जोड़ने के बाद यह गलती काफी कम हो गई.
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नई स्टडी के मुताबिक, कुछ इलाकों में पूरे सीजन के दौरान प्रति वर्ग मीटर 800 किलोग्राम से ज्यादा बर्फ जमा हुई. यह पहले के ग्लोबल मौसम डेटा में बताए गए अनुमान से काफी ज्यादा थी.

सही आंकड़े कैसे मिले?
वैज्ञानिकों ने हिमालय के साथ-साथ यूरोप के आल्प्स और अमेरिका के रॉकी पर्वतों में भी अपने मॉडल की जांच की. इसके लिए जमी हुई झीलों पर खास सेंसर लगाए गए. ये सेंसर झील पर जमा होने वाली बर्फ का वजन मापते हैं. इससे पता चलता है कि कितनी बर्फ गिरी है. इस तरीके से दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों में भी काफी सही आंकड़े मिल सके.
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यह स्टडी क्यों अहम है?
हिमालय की बर्फ गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियों के लिए पानी का बड़ा स्रोत है. यही बर्फ ग्लेशियरों को भी बनाए रखने में मदद करती है. इसके अलावा खेती, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और करोड़ों लोगों की पानी की जरूरत भी इसी पर निर्भर करती है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर बर्फबारी का सही अनुमान मिलेगा तो मौसम का पूर्वानुमान बेहतर होगा. बर्फानी तूफान की चेतावनी ज्यादा सटीक दी जा सकेगी. साथ ही यह समझने में भी मदद मिलेगी कि क्लाइमेट चेंज का हिमालय की बर्फ और वहां के पर्यावरण पर आगे क्या असर पड़ सकता है.