16 जुलाई से ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ रथ यात्रा का शुभारंभ होने जा रहा है. इस दिन भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकलेंगे. भगवान जगन्नाथ की महिमा से जुड़ी अनेक कथाएं और लोकमान्यताएं आज भी श्रद्धालुओं के बीच जीवंत हैं. इन्हीं में से एक सबसे प्रसिद्ध कथा भक्त सालबेग की है. यह कहानी केवल भक्ति की शक्ति का वर्णन नहीं करती, बल्कि यह भी बताती है कि भगवान के लिए सच्ची श्रद्धा ही सबसे बड़ा परिचय है. ओडिशा के पुरी में आज भी इस वार्षिक रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ भक्त सालबेग की समाधि के सामने कुछ समय के लिए रुकता है.
क्यों समाधि के आगे रुकता है भगवान का रथ?
लोक मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की ओर बढ़ रही थी. चारों ओर "जय जगन्नाथ" के जयघोष गूंज रहे थे और हजारों श्रद्धालु रथ खींच रहे थे. तभी कुछ दूरी तय करने के बाद रथ अचानक एक स्थान पर आकर ठहर गया. रथ को आगे बढ़ाने के लिए श्रद्धालुओं ने पूरा प्रयास किया, लेकिन सभी कोशिशें असफल रहीं. किसी को समझ नहीं आया कि आखिर रथ क्यों नहीं चल रहा. लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं होने लगीं. कुछ इसे भगवान की इच्छा मान रहे थे तो कुछ इसे दिव्य संकेत समझ रहे थे. कहते हैं कि तभी एक वृद्ध व्यक्ति भीड़ के बीच पहुंचा. उसने किसी तरह का विवाद नहीं किया, बल्कि लोगों का ध्यान सामने स्थित सालबेग की समाधि की ओर दिलाया. इसके बाद श्रद्धालुओं ने भगवान जगन्नाथ के साथ भक्त सालबेग का भी जयघोष किया.
कहा जाता है कि जैसे ही "जय जगन्नाथ" के साथ "जय भक्त सालबेग" का उद्घोष हुआ, वैसे ही रुका हुआ रथ दोबारा चल पड़ा. इसी घटना के बाद यह मान्यता और मजबूत हुई कि भगवान अपने प्रिय भक्त के सम्मान में उनके समाधि स्थल पर अवश्य ठहरते हैं.
कौन थे भक्त सालबेग?
लोक कथाओं के अनुसार सालबेग का जीवन मुगलकाल से जुड़ा माना जाता है. उनके पिता मुस्लिम और माता हिंदू थीं. एक युद्ध में गंभीर रूप से घायल होने के बाद उनकी माता ने उन्हें भगवान जगन्नाथ की शरण लेने की सलाह दी. माता से भगवान की महिमा सुनकर उनके मन में प्रभु के प्रति गहरी श्रद्धा जागी.
वे पुरी पहुंचे, लेकिन उस समय मंदिर में प्रवेश की अनुमति उन्हें नहीं मिल सकी. इसके बाद उन्होंने मंदिर के बाहर रहकर भगवान जगन्नाथ का निरंतर स्मरण और भजन करना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे उनकी भक्ति इतनी प्रगाढ़ मानी गई कि वे भगवान जगन्नाथ के महान भक्तों में गिने जाने लगे.
कहते हैं कि जीवन के अंतिम समय में सालबेग की एक ही इच्छा थी कि वे भगवान जगन्नाथ के दर्शन करें. श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित कथा कहती है कि भगवान ने उन्हें आश्वासन दिया कि भविष्य में उनकी रथयात्रा भक्त सालबेग के स्थान पर रुके बिना आगे नहीं बढ़ेगी.
इसी विश्वास के कारण आज भी पुरी में रथयात्रा के दौरान भक्त सालबेग की समाधि के सामने रथ के ठहरने की परंपरा का उल्लेख किया जाता है. यह कथा इस बात का संदेश देती है कि भगवान के लिए जाति, धर्म या जन्म नहीं, बल्कि निष्कलंक भक्ति और समर्पण सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं.