पुत्रदा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है. मान्यता है कि इसके कथा श्रवण से योग्य संतान की प्राप्ति, संतान की रक्षा और जीवन में सुख-समृद्धि मिलती है. साथ ही, ज्ञात-अज्ञात पापों का नाश होकर अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है.
भद्रावती नाम की एक नगरी में सुकेतुमान नाम का राजा शासन करता था. राजा के पास धन-धान्य, सुख-सुविधा और विलासिता तो थी, लेकिन पुत्र न होने की कमी हमेशा सताती थी. राजा की पत्नी का नाम शैव्या था. संतान सुख की चाह सिर्फ राजा में ही नहीं, बल्कि पितरों में भी थी, क्योंकि उनका मानना था कि राजा के मरने के बाद हमें पिंड कौन देगा?
राजा हमेशा इसी ख्याल में डूबा रहता था कि, मरने के बाद मेरा अंतिम संस्कार कौन करेगा? बिना पुत्र के पितरों और देवताओं का ऋण कैसे चुकेगा? अधिक सोचने के कारण राजा इस कदर चिंतित हो गया कि, उसने प्राण त्यागने का निश्चय कर लिया लेकिन आत्महत्या को पाप समझकर उसने ऐसा नहीं किया.
एक दिन राजा अपने विचारों में डूबे हुए घोड़े पर सवार होकर वन की ओर चल दिया. वन में चलते-चलते उसने देखा कि, जंगल में हिरण, बाघ, सूअर, शेर, बंदर, सांप आदि सब भ्रमण कर रहे हैं. हाथी अपने परिवार के साथ जंगल में घूम रहा था.
वन में अलग-अलग दृश्यों को देखकर वह सोचने लगा कि, मैंने काफी यज्ञ हवन, ब्राह्मणों को खाना खिलाया फिर भी मुझे दुख ही क्यों मिला? वन में अधिक घूमने के कारण राजा प्यास के मारे अत्यंत दुखी होकर इधर-उधर पानी की खोज करने लगा. तभी राजा को एक सरोवर दिखाई दिया. जिसके चारों तरफ मुनियों का आश्रम बना हुआ था.
राजा को देखकर मुनियों ने कहा कि, हे राजन! हम तुमसे काफी खुश हैं. बताओ तुम्हारी क्या इच्छा है? राजा ने पूछा महर्षि आप लोग यहां क्यों आए हैं? तब मुनियों ने बताया कि, आज संतान प्रदान करने वाली पुत्रदा एकादशी है, हम लोग विश्वदेव हैं और इस तालाब में नहाने के लिए आए हैं.
यह सुनकर राजा कहने लगा कि, मेरी भी कोई संतान नहीं है, यदि आप मुझ से खुश हैं तो एक पुत्र का वरदान दे दीजिए. मुनि बोले- हे राजन, आज पुत्रदा एकादशी है. आप इस व्रत का निष्ठापूर्वक पालन करें भगवान के आशीर्वाद से आपके घर में जरूर एक पुत्र होगा.
मुनि की बातों को सुनकर राजा ने उसी दिन एकादशी व्रत किया और द्वादशी तिथि पर पारण किया. जिसके फल स्वरूप कुछ समय बाद राजा की पत्नी को एक पुत्र की प्राप्ति हुई. वह बच्चा आगे चलकर अत्यंत शूरवीर राजकुमार बना.
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, हे राजन, पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत करना चाहिए. जो मनुष्य इस कथा को पढ़ता या सुनता है उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है.
विष्णु जी आरती
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥
-----समाप्त-----