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सफेद कपड़े, हाथ में वीणा और विद्या की देवी... माता सरस्वती को इतना ही मत समझिए 

देवी सरस्वती केवल ज्ञान और बुद्धि की देवी नहीं हैं, बल्कि वे संगीत, कला, वाणी और विद्या की देवी हैं जिनके कई रहस्य और तांत्रिक रूप हैं. वे दस महाविद्याओं में सीधे शामिल नहीं हैं, लेकिन उनका तांत्रिक स्वरूप मातंगी प्रसिद्ध है.

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सरस्वती जी की आरती
सरस्वती जी की आरती

सफेद कमल या कुमुदिनी के फूल पर बैठने वाली, सफेद कपड़े पहने वाली, वीणा बजाने वाली देवी को हम माता सरस्वती कहते हैं. हंस उनकी सवारी है.वेद की पुस्तकें उनकी पहचान हैं और हाथ में स्फटिक की माला संसार के लगातार बदलते रहने का प्रतीक है. देवी सरस्वती की छवि सौम्य है और हम-आप उनके बारें में केवल इतना जानते हैं कि देवी सरस्वती ज्ञान और बुद्धि की देवी हैं. इतना ही जानकर हमारी-आपकी इतिश्री हो जाती है.

इसे ज्यादा न कभी हमने जाना और न ही कभी किसी कथा-कहानी में उनका बहुत बड़ा जिक्र ही उभर कर आता है. बसंत पंचमी को छोड़ दें तो उनके नाम पर किसी बड़े व्रत, त्योहार और दिन-परंपरा की भी मौजूदगी नहीं मिलती है. 

लेकिन, देवी सरस्वती को सिर्फ वीणा वादिनी कहना-समझना हमारी भूल ही है, क्योंकि यह देवी इतने अधिक रहस्यों से भरी हैं, कि इनके बारे में जरा सी भी ज्यादा जानकारी हमारा दिमाग चकराने के लिए काफी है. इस दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है और हम जो कुछ भी कर रहे हैं देवी सरस्वती चुपचाप बैठकर हमसे कराती हैं और फिर इसका जरिया कभी कोई अन्य देवता बनता है या फिर उन्हीं के अंश से निकली कोई देवी.

विद्या की देवी, लेकिन 10 महाविद्या में नहीं है जिक्र 
सरस्वती का पहला सबसे बड़ा रहस्य यही है कि हम जिन 10 महाविद्या देवियों को जानतें हैं उनमें भी कहीं सरस्वती का सीधा नाम नहीं हैं. वहां आपको काली, मातंगी, तारा, त्रिपुर भैरवी, कमला आदि सभी देवियों के नाम मिलेंगे, लेकिन देवी सरस्वती के नाम से कोई जिक्र नहीं मिलेगा. क्योंकि देवी सरस्वती गुप्त विद्या हैं और इसलिए हर काम में अहम भूमिका होने के बावजूद वह खुद को छिपा कर रखती हैं. 

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संगीत, कला, वाणी, विद्या की देवी हैं मां सरस्वती
सरस्वती बुद्धि, ज्ञान, संगीत, कला, वाणी और विद्या की देवी हैं. वेदों में कहा गया है कि 'ॐ' की ध्वनि से ही सृष्टि का निर्माण हुआ. ब्रह्मा ने उन्हें “वाग्देवी” नाम दिया, यानी वाणी और ध्वनि की देवी. इस प्रकार देवी सरस्वती ने अपनी पहली कंपन (वाइब्रेशन) के जरिये संसार को गति दी. सारी सृष्टि कंपन (वाइब्रेशन) पर आधारित है और 'वाइब्रेशन ही सब कुछ है.' ऋग्वेद में देवी सरस्वती का सबसे प्राचीन उल्लेख मिलता है, जहां उन्हें एक देवी और एक नदी—दोनों रूपों में वर्णित किया गया है. 

देवी महात्म्य में सरस्वती, महाकाली और महालक्ष्मी के साथ त्रिदेवी का हिस्सा हैं. महासरस्वती को आठ भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया गया है, जिनके हाथों में घंटा, त्रिशूल, हल, शंख, गदा, चक्र, धनुष और बाण होते हैं. यह दर्शाता है कि वे केवल ज्ञान की देवी ही नहीं, बल्कि सृष्टि के संचालन में भी समान भागीदार हैं.

Saraswati

जगदंबा के रूप में सरस्वती वही हैं, जो दुर्गा, काली, संतोषी, गायत्री, शीतला, अन्नपूर्णा, उमा और अंबा देवी के रूप में सामने आती हैं. जब वे साधकों की बाधाओं को दूर करती हैं, तो वह स्वरूप दुर्गा के रूप में दिखाई देता है. जब वे भय और नकारात्मकता को नष्ट करती हैं, तो वे काली के रूप में प्रकट होती हैं. इसी प्रकार जब वे संतोष प्रदान करती हैं, तो संतोषी माता कहलाती हैं. सुख देने में वे गायत्री हैं, शीतलता देने में शीतला देवी, भोजन और स्वास्थ्य के लिए अन्नपूर्णा देवी, उत्साह के लिए उमा देवी और प्रेम, दया व करुणा के लिए अंबा देवी के रूप में जानी जाती हैं.

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कौन हैं देवी मातंगी, जो मां सरस्वती का ही एक रूप हैं
देवी सरस्वती की खोज में पुराणों को खंगालें तो उनका रहस्य और गहराता जाता है. रुई की तरह सफेद उनके जिस रूप को हम जानते हैं वह भी धीरे-धीरे गहरा होता जाता है. यहीं हमारा परिचय होता है, देवी मातंगी से. मातंगी भी दस महाविद्याओं में से एक हैं, जो तांत्रिक परंपरा की प्रमुख देवियां मानी जाती हैं और आदिशक्ति (दिव्य माता) का ही एक स्वरूप हैं. अब आप चौंक जाएंगे कि यही मातंगी देवी सरस्वती का तांत्रिक रूप मानी गई हैं. 

मातंगी के हाथ में भी तार वाद्य है जो वीणा की ही तरह है. वह बहुत से रहस्य भरे साउंड, रागों और स्वरों का गायन करती हैं. ये राग डर भी पैदा करते हैं और मोह को भी तोड़ते हैं. मातंगी तंत्र विद्या में संगीत और कला की देवी हैं. वे वाणी, संगीत, ज्ञान और सभी कलाओं पर शासन करती हैं. उनकी उपासना खास तौर पर अलौकिक शक्तियों को पाने  और शत्रुओं पर नियंत्रण, लोगों को आकर्षित करने, कलाओं में निपुणता और परम ज्ञान प्राप्त करने के लिए की जाती है.


मातंगी का संबंध अक्सर अशुद्धता, अपशकुन और समाज के हाशिये पर रहने वाले वर्गों से जोड़ा जाता है. उनका एक प्रमुख रूप उच्छिष्ट-चांडालिनी (उच्छिष्ट मातंगिनी) कहलाता है. इस रूप में वे एक चांडालिनी (अछूत) के रूप में वर्णित हैं और उन्हें जूठा या बचा हुआ भोजन मिलता है, जो पारंपरिक रसोई में अशुद्ध माना जाता है. मातंगी का रंग पन्ना (हरे) जैसा बताया गया है. उच्छिष्ट मातंगिनी के हाथों में पाश, तलवार, अंकुश और गदा होती है, जबकि उनके एक अन्य प्रसिद्ध रूप 'राज मातंगी' को वीणा बजाते हुए और तोते के साथ दिखाया जाता है.

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64 कलाओं की देवी भी हैं सरस्वती
मातंगी 64 कलाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं. 64 का नंबर सनातन परंपरा में अपने आप में एक रहस्य है, यह सीधे मनुष्य के जीवन से जुड़ा है और अनंत आकाश के तमाम रहस्यों से भी. क्योंकि 64 कलाओं में 64 काम कलाएं भी आती है. 64 तरह का ज्ञान भी शामिल है. देवी परंपरा की 64 योगिनियां शामिल हैं. हमारे शरीर के तंत्रिका तंत्र में 64 मर्म बिंदु होते हैं. इस तरह इन सभी 64 तरह की कलाओं पर देवी सरस्वती का एकमात्र अधिकार है.

किसी तपस्वी को तपस्या की प्रेरणा देने वाली सरस्वती हैं. तपस्वी को क्या वरदान मांगना है, यह भी सरस्वती ही तय करती हैं. याद कीजिए कुंभकर्ण का उदाहरण जब उसे ब्रह्माजी से इंद्रासन मांगना था तब देवी सरस्वती के ही प्रभाव से उसके शब्द बदल गए और वह निद्रासन मांग बैठा था. साधक को उसकी साधना का फल देने वाली सरस्वती हैं और साधना का क्या परिणाम होगा यह भी निर्धारित करने वाली भी सरस्वती हैं.

Kali Puja

सरस्वती देवी का ही एक रूप हैं नील सरस्वती
पश्चिम बंगाल की ओर बढ़ें तो वहां काली पूजा का खास असर देखने को मिलता है. इसी असर की वजह से वहां सरस्वती का काला-नीला, (नीलमेघ श्याम) स्वरूप मिलता है. इन्हें नील सरस्वती कहा जाता है. नील सरस्वती देवी को दस महाविद्या में से दूसरी विद्या तारा के रूप में भी माना जाता है. इसलिए इन्हें नीला तारा भी कहा जाता है, दरअसल महाविद्या तारा ही ज्ञान और वाणी से जुड़ा रूप हैं. इनका प्रकट होना इसलिए हुआ ताकि दुनिया को ज्ञान और बोलने की शक्ति (वाणी) दी जा सके. 

महाविद्या तारा से भी है देवी सरस्वती का जुड़ाव
नील सरस्वती, तारा विद्या का सबसे गुप्त और विशेष पक्ष हैं, जिसे गुरु-शिष्य परंपरा से ही प्राप्त किया जा सकता है. कुछ लोग नील सरस्वती को उग्रतारा का ही एक रूप मानते हैं. जब तारा देवी अपना पूरा उग्र और ज्ञानमय रूप धारण करती हैं, तो वे नील सरस्वती कहलाती हैं. ये रूप दुष्टों के लिए डरावना, लेकिन भक्तों के लिए कल्याणकारी होता है. ठीक वैसे ही जैसे मां काली का उग्र और क्रोधित स्वरूप दुष्टों के लिए डरावना लेकिन संतों-सज्जनों के लिए ममता से भरा होता है.

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इसलिए देवी सरस्वती कोई साधारण देवी नहीं हैं, बल्कि जो कुछ हो रहा है और जो कुछ होने वाला है, उसका कारण हैं. वही सर्व सिद्ध हैं और त्रिदेवियों में सबसे पहले उनका नाम लिया जाता है.सरस्वती केवल ज्ञान की देवी नहीं हैं, वे ज्ञान के पीछे काम करने वाली अदृश्य शक्ति हैं, जो सृजन भी करती हैं और परिणाम भी तय करती हैं.

नवरात्रि में भी सरस्वती साधना
इसलिए नवरात्रि जो नौ दिनों का अनुष्ठान है. इसके आखिरी तीन दिन सप्तमी, अष्टमी और महानवमी के दिन देवी सरस्वती की भी पूजा की जाती है. देवी सरस्वती जो शुरुआत का प्रतीक हैं, उनकी पूजा में उन्हें आम की मंजरी, सरसों के फूल और पीले रंग के फूल चढ़ाए जाते हैं. देवी काली से उनका सीधा कनेक्शन होने के कारण अनार के फूल भी देवी सरस्वती को प्रिय हैं. 

इसके अलावा उन्हें पीले मीठे पुलाव, जिन्हें बिरंज कहा जाता है उसका भोग लगाया जाता है. पीली मिठाइयां, बूंदी-जलेबी आदि भी देवी सरस्वती के प्रिय भोग हैं. देवी सरस्वती राहु को भी नियंत्रण करती हैं. सरस्वती जी को राहु की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, क्योंकि राहु को भ्रम पैदा करता है और मां सरस्वती ज्ञान और बुद्धि की देवी मानी जाती हैं.

राहु पर भी नियंत्रण करती हैं देवी सरस्वती
सरस्वती जी को विद्या और कला की देवी माना जाता है, और राहु के असर से भी कई तरह की कलाओं में सिद्धियां मिलती हैं, लेकिन राहु के असर से कला का निगेटिव रिजल्ट हो सकता है, इसलिए देवी सरस्वती की पूजा की जाती है ताकि वह राहु को कंट्रोल करके रखें. इसीलिए , सरस्वती जी को राहु की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, क्योंकि वह राहु की शक्तियों को नियंत्रित करने में मदद करती हैं और ज्ञान, बुद्धि और विद्या में वृद्धि करने में मदद करती हैं.

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