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Kashmir Mosques: सिर्फ नमाज नहीं..., कश्मीर की मस्जिदों ने लिया ये अहम फैसला

Kashmir Mosques: कश्मीर की मस्जिदों में अब ड्रग्स, आत्महत्या, मानसिक तनाव और पर्यावरण जैसे सामाजिक मुद्दों पर चर्चा होगी. शिया-सुन्नी उलेमाओं ने समाज सुधार के लिए नई पहल की योजना बनाई है.

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नशाखोरी, आत्महत्या, पर्यावरण क्षति: कश्मीर की मस्जिदें धर्म से परे मुद्दों पर भी ध्यान देंगी
नशाखोरी, आत्महत्या, पर्यावरण क्षति: कश्मीर की मस्जिदें धर्म से परे मुद्दों पर भी ध्यान देंगी

Kashmir Mosques: घाटी की हवा में अब एक नया बदलाव महसूस हो रहा है. कश्मीर की मस्जिदें अब पारंपरिक धार्मिक दायरे से बाहर निकल रही हैं. वे अब समाज से जुड़े उन सुलगते मुद्दों पर खुलकर बात करेंगी, जो सीधे तौर पर आम इंसान की जिंदगी को प्रभावित करते हैं. इनमें ड्रग्स की लत, आत्महत्या, मानसिक तनाव और पर्यावरण का डिग्रेडेशन जैसे गंभीर विषय शामिल हैं. यह फैसला घाटी के धार्मिक विद्वानों की एक महत्वपूर्ण बैठक में लिया गया है. 

शिया-सुन्नी मौलवी आए एक मंच पर

यह बैठक मंगलवार को आयोजित की गई थी. इसकी अध्यक्षता घाटी के प्रमुख धार्मिक गुरु मीरवाइज उमर फारूक ने की. इस बैठक की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के शिया और सुन्नी दोनों समुदायों के प्रमुख clerics और scholars ने हिस्सा लिया. सभी ने मतभेदों को दरकिनार कर एक साथ मंच साझा करते हुए समाज सुधार के इस बड़े एजेंडे पर अपनी सहमति जताई. 

क्यों उठाया गया यह कदम?

बैठक के बाद बात करते हुए मीरवाइज उमर फारूक ने मौजूदा हालात पर गहरी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि आज के युवाओं में भावनात्मक और मानसिक तनाव बहुत तेजी से बढ़ रहा है. इसके साथ ही हमारे पर्यावरण का लगातार नुकसान भी हो रहा है. 

मीरवाइज ने साफ कहा कि ये ऐसे मुद्दे नहीं हैं जिन्हें सिर्फ सरकार के भरोसे छोड़ा जाए या कभी-कभार होने वाले सेमिनार तक सीमित रखा जाए. इन समस्याओं से निपटने के लिए निरंतर सामाजिक प्रयासों की जरूरत है. 

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उन्होंने आगे कहा कि मस्जिदों और मेंबर (पल्पिट) का समाज में एक अनूठा प्रभाव है. उलेमाओं (विद्वानों) की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे इस मंच का उपयोग रचनात्मक रूप से समाज को सही दिशा दिखाने के लिए करें. 

काउंसलिंग और जागरूकता केंद्र बनेंगी मस्जिदें

इस नई रणनीति के तहत, घाटी के विभिन्न स्कूलों और विचारों से जुड़े धार्मिक विद्वान मुत्ताहिदा मजलिस-ए-उलेमा (MMU) के बैनर तले एक साथ आए हैं.  इन्होंने तय किया है कि अब मस्जिदों और मदरसों को कम्युनिटी वेलफेयर सेंटर्स के रूप में भी विकसित किया जाएगा. इसका मतलब यह है कि मस्जिदें केवल इबादत की जगह नहीं रहेंगी. वे काउंसलिंग सेंटर, यूथंगेजमेंट हब और परिवार कल्याण सहायता केंद्र के रूप में भी काम करेंगी. 

MMU की ओर से जारी एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि उलेमा की भूमिका को बहुत अच्छी तरह समझते हैं. यह मंच लोगों में जागरूकता फैलाने, परिवारों को शुरुआती स्तर पर समस्याओं की पहचान करने में मदद करने और मानसिक तनाव, अकेलेपन या एंग्जायटी से जूझ रहे युवाओं को सुरक्षित स्थान देने में अहम भूमिका निभा सकता है. 

आगे की योजना और अभियान

इसकी शुरुआत करने के लिए धार्मिक विद्वानों ने एक ठोस रूपरेखा तैयार की है. इसके तहत विद्वान और उलेमा क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों की यात्रा करेंगे. वे स्थानीय धार्मिक नेताओं और आम लोगों से मिलकर वहां की जमीनी समस्याओं को गहराई से समझेंगे. हर क्षेत्र की खास जरूरतों के मुताबिक व्यावहारिक उपाय विकसित किए जाएंगे. 

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ड्रग्स के खिलाफ कड़ा रुख

बैठक में ड्रग्स के बढ़ते खतरे पर विशेष चिंता जताई गई.  विद्वानों का मानना है कि इस अभिशाप के खिलाफ समाज को जागरुक करने का अभियान तभी सफल होगा जब इसके साथ प्रशासनिक कदम भी उठाए जाएंगे. 

इस संदर्भ में, विद्वानों ने मांग की है कि पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर नए शराब के लाइसेंस जारी करने या उनके विस्तार पर रोक लगाई जानी चाहिए.  समाज को बचाने के लिए नीतिगत मोर्चे पर भी कड़े कदम उठाने की जरूरत है. यह पहल कश्मीर के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने की दिशा में एक बेहद साहसिक और सकारात्मक कदम माना जा रहा है.

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