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Karwa Chauth 2026: चांद से ये कैसा डर! जानें क्यों करवा चौथ पर छन्नी की आड़ में देखा जाता है चांद

करवा चौथ का व्रत चंद्र दर्शन के बिना बिल्कुल अधूरा है. चंद्रमा को सामान्यतः आयु, सुख और शांति का कारक माना जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि करवा चौथ पर चंद्रमा को अर्घ्य देते वक्त इसे सीधे आंखों से देखना निषेध माना जाता है. तभी तो महिलाएं छन्नी के माध्यम से चंद्र दर्शन करती हैं. आइए आपको इसकी वजह बताते हैं.

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चतुर्थी तिथि को शुभ कार्य वर्जित होते हैं. मान्यता है कि इस दिन चंद्र दर्शन से अपयश और कलंक लग सकता है. (Photo: ITG)
चतुर्थी तिथि को शुभ कार्य वर्जित होते हैं. मान्यता है कि इस दिन चंद्र दर्शन से अपयश और कलंक लग सकता है. (Photo: ITG)

आज देशभर में सुहागनों ने करवा चौथ का व्रत रखा है. यह व्रत हर साल कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को रखा जाता है. इस दिन महिलाएं शिव-पार्वती और करवा माता की पूजा करती हैं. फिर शाम को छन्नी से चंद्रमा के दर्शन करके व्रत खोलती हैं और पति की लंबी आयु की कामना करती हैं. चंद्र दर्शन के बिना यह व्रत बिल्कुल अधूरा है. चंद्रमा को सामान्यतः आयु, सुख और शांति का कारक माना जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि करवा चौथ पर चंद्रमा को अर्घ्य देते वक्त इसे सीधे आंखों से देखना निषेध माना जाता है. तभी तो महिलाएं छन्नी के माध्यम से चंद्र दर्शन करती हैं. इसके पीछे एक प्रचलित कथा भी है.

ज्योतिषाचार्य पंडित मनोज त्रिपाठी कहते हैं कि जितनी भी चतुर्थियां हैं. कृष्ण पक्ष की या शुक्ल पक्ष की. इन सभी में गणपति के पूजन की परंपरा है. माना जाता है कि जो भी दंपति मात्र चतुर्थी का पूजन करते हैं. उनके घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है. लेकिन चतुर्थी पर चंद्रमा को खुली आंखों से सीधे नहीं देखना चाहिए.

पौराणिक मान्यताओं में चतुर्थी तिथि को रिक्ता और खला कहा जाता है. ज्योतिष में चतुर्थी तिथि को शुभ कार्य वर्जित होते हैं. मान्यता है कि इस दिन चंद्र दर्शन से अपयश और कलंक लग सकता है. इसलिए इस दिन चंद्र दर्शन निषेध यानी मना होता है. इस दिन गणेश जी की उपासना करके चंद्रमा को नीची निगाह से अर्घ्य देने की परंपरा है. कहते हैं कि ऐसा करने से अपयश का दोष भंग हो जाता है. इसलिए करवा चौथ पर महिलाएं छन्नी या पानी में चंद्रमा की परछाईं देखकर व्रत खोलती हैं

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चतुर्थी के कलंक का भय कैसे दूर करें?
चतुर्थी तिथि पर भगवान् गणेश के सामने घी का दीपक जलाएं. उन्हें लड्डुओं का भोग लगाएं और "वक्रतुण्डाय हुं" का 108 बार जाप करें. जल में सफेद फूल डालकर नीची निगाह से चंद्रमा को अर्घ्य दें. आपके ऊपर पड़ने वाले अपयश का योग भंग हो जाएगा.

चतुर्थी का चांद न देखने की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के मुताबिक, एक बार भगवान गणेश अपनी प्रिय मिठाई का भोग कर रहे थे. तभी वहां से गुजर रहे चंद्र देव की नजर उन पर पड़ी. अपने रूप और सुंदरता पर घमंड करने वाले चंद्र देव ने गणेश जी का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया. चंद्र देव के इस व्यवहार से भगवान गणेश रुष्ट हो गए और उन्होंने श्राप दे दिया कि उनकी सुंदरता और चमक समाप्त हो जाएगी. साथ ही, जो भी व्यक्ति चंद्रमा के उस रूप को देखेगा, उसे भी कलंक का सामना करना पड़ेगा.

भगवान गणेश का श्राप मिलते ही चंद्र की चमक फीकी पड़ने लगी और उनकी कई कलाएं क्षीण हो गईं. चंद्रमा को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने गणेश जी से क्षमा मांगी और उनकी आराधना की. उनके पश्चाताप से प्रसन्न होकर गणेश जी ने श्राप का प्रभाव कम करने का निर्णय लिया. उन्होंने बताया कि श्राप को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, लेकिन उसके प्रभाव को एक निश्चित तिथि तक सीमित किया जा सकता है. गणेश जी ने कहा कि हर मास के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा के दर्शन करने वालों पर ही कलंक लगने का भय रहेगा. इसके अलावा, बाकी दिनों में वह श्रापमुक्त रहेंगे और उनकी चमक हमेशा पहले जैसी बनी रहेगी.

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गलती से चांद देख लें तो क्या करें?
यदि चतुर्थी के दिन अनजाने में चंद्रमा के दर्शन हो जाएं तो इससे जुड़े दोष के निवारण के लिए श्रीमद्भागवत में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण और स्यमंतक मणि की कथा सुनने या उसका पाठ करने की परंपरा है. माना जाता है कि इस कथा के श्रवण से चंद्र दर्शन के कारण लगने वाले कलंक का प्रभाव दूर होता है. इसके अलावा, कुछ भक्त भगवान गणेश के मंत्रों का जाप करके भी उनसे क्षमा और कृपा की प्रार्थना करते हैं.

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