गणेश महोत्सव की शुरुआत हो चुकी है. इस साल गणेशोत्सव 14 सितंबर से लेकर 25 सितंबर तक मनाया जाएगा. 10 दिन की इस पवित्र अवधि में भगवान गणेश की पूजा पूरे विधि-विधान से की जाती है. भक्त बप्पा को मोदक, लड्डू, दूर्वा और लाल फूल अर्पित करते हैं. मान्यता है कि ये चीजें गणपति को बेहद प्रिय हैं. जबकि उनकी पूजा में तुलसी दल नहीं चढ़ाया जाता है. क्या आप जानते हैं कि पवित्र होने के बावजूद भगवान गणेश को तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती है. आइए पौराणिक कथा के माध्यम से समझते हैं.
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान गणेश गंगा नदी के किनारे तपस्या कर रहे थे. तभी वहां भ्रमण करते हुए तुलसी जी की नजर तपस्या में लीन भगवान गणेश पर पड़ गई. रत्नों से सजे गणेश जी अपने दिव्य स्वरूप में सिंहासन पर विराजमान थे. उनके शरीर पर चंदन लगा था. भगवान गणेश के स्वरूप को देखकर तुलसी उनके प्रति आकर्षित हो गईं. उनके मन में गणेश जी से विवाह करने की इच्छा जाग उठी. इसी इच्छा के चलते उन्होंने गणपति की तपस्या भंग कर दी.
तपस्या से उठने के बाद भगवान गणेश ने तुलसी को समझाया. उन्होंने कहा कि तपस्या में बाधा डालना उचित नहीं है. इसके बाद गणेश जी ने स्वयं को ब्रह्मचारी बताते हुए तुलसी के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया.भगवान गणेश के इनकार से तुलसी क्रोधित हो गईं और उन्होंने गणेश जी को दो विवाह होने का शाप दे दिया.
तुलसी के शाप से भगवान गणेश भी क्रोधित हो उठे. तब उन्होंने तुलसी को शाप दिया कि उनका विवाह एक असुर से होगा और उन्हें राक्षस की पत्नी बनना पड़ेगा. यह सुनकर तुलसी को अपनी गलती का एहसास हुआ. उन्होंने भगवान गणेश से क्षमा मांगी. तब भगवान गणेश ने कहा कि मैं अपना श्राप तो वापस नहीं ले सकता, लेकिन तुम्हें यह वरदान देता हूं के आगे चलकर तुम भगवान विष्णु को प्रिय होगी और उनके द्वारा ही तुम्हारा उद्धार होगा. साथ ही यह भी स्पष्ट किया की गणपति की पूजा में कभी तुलसी का उपयोग नहीं किया जाएगा. बस तभी से यह मान्यता चली आ रही है.
गणेश को प्रिय है दूर्वा
भगवान गणेश जी को पूजा में तुलसी दल या तुलसी से निर्मित चीजों का भोग नहीं लगाया जाता है. गणपति जी को दूर्वा प्रिय है, इसलिए उन्हें यही चढ़ाने की परंपरा है. इसके अलावा, गणपति जी को मोदक, लड्डू, जामुन और गुड़-चने का प्रसाद चढ़ाना उत्तम माना जाता है. इसके अलावा गणपति को केला, नारियल, श्रीफल आदि भी चढ़ाए जा सकते हैं.