scorecardresearch
 

कहानी उस मुस्लिम शासक की, जिसकी वजह से आज भी बड़े मंगल पर होते हैं भंडारे

बड़े मंगल पर भंडारा कराने की शुरुआत अवध के नवाब मोहम्मद वाजिद अली शाह के समय से शुरू हुई थी. करीब 200 साल पहले शुरू हुई यह परंपरा आज भी जारी है. आज न सिर्फ लखनऊ, बल्कि देश के विभिन्न शहरों और हनुमान जी के प्रमुख मंदिरों में जमकर लंगर चलता है.

Advertisement
X
हनुमान न सिर्फ लक्ष्मण के लिए संकटमोचक थे, बल्कि उनकी कृपा से अवध के नवाब के बेटे की जान भी बची थी. (Photo: ITG)
हनुमान न सिर्फ लक्ष्मण के लिए संकटमोचक थे, बल्कि उनकी कृपा से अवध के नवाब के बेटे की जान भी बची थी. (Photo: ITG)

केसरी नंदन हनुमान न होते तो लक्ष्मण के प्राण शायद न बच पाते. वो संकटमोचन हनुमान ही थे जो संजीवनी का पूरा पर्वत कंधे पर उठा लाए थे. आपने यह वाकया रामायण में जरूर देखा या पढ़ा होगा. लेकिन बहुत से लोग यह बात नहीं जानते हैं कि हनुमान न सिर्फ लक्ष्मण के लिए संकटमोचक थे, बल्कि उनकी कृपा से एक मुस्लिम शासक के बेटे की जान भी बची थी. इतना ही नहीं, ज्येष्ठ के बड़े मंगल पर जगह-जगह होने वाले विशाल भंडारे का भी इस मुस्लिम शासक की कहानी से गहरा कनेक्शन है.

कहते हैं कि बड़े मंगल को व्यापक मोर्चे पर मनाने और इस दिन भंडारा कराने की परंपरा की शुरुआत ऐतिहासिक शहर लखनऊ से हुई थी. ऐसा बताया जाता है कि बड़े मंगल पर भंडारा करने की शुरुआत अवध के नवाब मोहम्मद वाजिद अली शाह के समय से ही शुरू हुई थी. करीब 200 साल पहले शुरू हुई यह परंपरा आज भी जारी है. आज भी न सिर्फ लखनऊ, बल्कि देश के कई बड़े शहरों और हनुमान जी के प्रमुख मंदिरों में जमकर लंगर चलता है.

क्या है कहानी?
ऐसा बताया जाता है कि एक बार लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह के बेटे की तबीयत बेहद खराब हो गई. बेटे की नाजुक हालत देख नवाब और उनकी बेगम बहुत परेशान थे. बहुत इलाज कराने के बाद भी तबियत में सुधार नहीं आ रहा था. नवाब अपने बेटे के अच्छे स्वास्थ्य के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे, लेकिन उन्हें कोई फायदा नहीं मिला. तब किसी ने उन्हें सुझाव दिया कि अलीगंज स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर में मंगलवार के दिन जाकर भगवान हनुमान से प्रार्थना करें.

Advertisement

वाजिद अली चाहते थे कि उनका बेटा किसी भी तरह ठीक हो जाए. और इसलिए वो अपनी बेगम के कहने पर हनुमान जी के उस प्राचीन मंदिर गए और वहां जाकर अपने बेटे के अच्छे स्वास्थ्य की मन्नत मांगी. थोड़े समय के बाद ही उनके बेटे की तबीयत में सुधार होने लगा. इसे चमत्कार मानते हुए नवाब और उनकी बेगम ने अलीगंज के उस हनुमान मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया. मंदिर का यह निर्माण कार्य ज्येष्ठ माह में पूरा हुआ.

फिर मंदिर के नवीनीकरण की खुशी में नवाब ने पूरे लखनऊ में गुड़ का प्रसाद बांटा और इसे एक बड़े उत्सव की तरह मनाया गया. समय के साथ यह परंपरा इतनी लोकप्रिय हो गई कि आज लखनऊ में बड़े मंगल के दिन जगह-जगह भंडारे आयोजित किए जाते हैं और हनुमान जी की विशेष पूजा होती है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement