विधानसभा चुनाव 2026 में ममता बनर्जी के प्रति राहुल गांधी का व्यवहार एमके स्टालिन जैसा तो बिल्कुल नहीं है, हो भी नहीं सकता क्योंकि तमिलनाडु में गठबंधन है. पर पश्चिम बंगाल में इस बार कांग्रेस अरसे बाद अकेले चुनाव लड़ रही है लेकिन सत्ताधारी पार्टी पर आक्रमण को लेकर शायद असमंजस में है. 2024 का लोकसभा चुनाव दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर लड़ने के बावजूद दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ राहुल गांधी को बेहद आक्रामक देखा गया था. बिहार चुनाव में तेजस्वी यादव के साथ होने के बावजूद, राहुल गांधी की रणनीति आरजेडी के खिलाफ ही देखी गई - लेकिन, ममता बनर्जी के मामले में वैसी बात नहीं देखने को मिलती है.
सवाल है कि क्या ममता बनर्जी के साथ राहुल गांधी का व्यवहार तेजस्वी यादव और अरविंद केजरीवाल से अलग होता है? सवाल ये भी है कि क्या पश्चिम बंगाल चुनावों में कांग्रेस नेतृत्व ममता बनर्जी के लिए मददगार साबित हो रहा है?
दिल्ली सेवा बिल के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी को भी कांग्रेस की तरफ से ऐसा ही सपोर्ट मिला था, नतीजे भले अलग हैं. दिल्ली सेवा बिल पास कराने में बीजेपी की केंद्र सरकार सफल रही, लेकिन महिला संशोधन विधेयक लोकसभा में गिर गया.
अगस्त, 2023 में अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस के सामने सपोर्ट के बदले INDIA ब्लॉक में शामिल होने की शर्त ही रख दी थी, और कांग्रेस नेतृत्व को मानना भी पड़ा था. जनवरी, 2023 में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के साथ अलग व्यवहार किया था. श्रीनगर में भारत जोड़ो यात्रा के समापन में कांग्रेस ने अरविंद केजरीवाल को बुलाया ही नहीं.
बंगाल चुनाव में कांग्रेस की रणनीति
पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस की हालत वैसी ही हो चुकी है, जो दिल्ली में. दिल्ली और बंगाल के मुकाबले बिहार में थोड़ी बेहतर है. 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी का जो तेवर देखने को मिला था, पश्चिम बंगाल में न तो 2021 में दिखा, और न ही 2026 में देखने को मिला है.
2021 में तो कोविड के कारण राहुल गांधी का एक ही दौरा हो पाया था, और इस बार भी चुनाव प्रचार के लिए राहुल गांधी का अब तक एक बार ही पश्चिम बंगाल जाना हुआ है. कहने को तो कांग्रेस पश्चिम बंगाल की सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन कैंपेन के लिए राहुल गांधी की रैली सिर्फ मालदा में ही हुई है. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का जनाधार भी मालदा में ही बचा है.
रायगंज की रैली में राहुल गांधी के निशाने पर मुख्य रूप से तो बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही देखे गए. राहुल गांधी ने बीजेपी-RSS पर तीखे हमले किए, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार पर वोट चोरी का आरोप लगाया.
2022-23 की अपनी भारत जोड़ो यात्रा का जिक्र करते हुए राहुल गांधी ने दोहराया कि हमारी लड़ाई संघ और बीजेपी की नफरत भरी विचारधारा के खिलाफ है... मैंने प्रेम और एकता का संदेश फैलाने के लिए चार हजार किलोमीटर की यात्रा की थी, लेकिन राहुल गांधी के भाषण में यात्रा के दौरान ममता बनर्जी के व्यवहार को लेकर कोई खास गुस्सा नहीं दिखा.
बेशक राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल के शारदा, रोज वैली और कोयला घोटालों का जिक्र किया, और उसके लिए सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के भ्रष्टाचार और सिंडिकेट राज को जिम्मेदार ठहराया. लेकिन, जब पश्चिम बंगाल में होती आई चुनावी हिंसा की बात आई, तो टीएमसी और बीजेपी को भी बराबर का जिम्मेदार बताया.
2021 की चुनावी रैली में भी राहुल गांधी के भाषण में ऐसी ही बातें सुनने को मिली थीं. राहुल गांधी ने ममता बनर्जी के प्रति भी अपनी राय वैसी ही जाहिर की थी, जैसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में रखते हैं. लेकिन, ममता बनर्जी के प्रति रस्मअदायगी ही महसूस हो रही थी.
राहुल गांधी का दिल्ली और बिहार प्लान
राहुल गांधी चुनावों में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बख्श देते हैं, ऐसा तो कोई नहीं कह सकता, लेकिन उनके साथ तेजस्वी यादव और अरविंद केजरीवाल जैसा ही बराबरी वाला व्यवहार करते हैं, कोई भी ये दावा नहीं कर सकता. तीनों राज्यों में राहुल गांधी के भाषण और कांग्रेस की चुनावी रणनीति पर नजर डालें तो ऐसा ही लगता है.
यह ठीक है कि ममता बनर्जी के खिलाफ भी राहुल गांधी उन बातों को उछालते हैं, जो तृणमूल कांग्रेस की राजनीति के खिलाफ बीजेपी के इल्जाम होते हैं - लेकिन दिल्ली चुनाव जैसा कैंपेन तो पश्चिम बंगाल के बीते तीन चुनावों में देखने को नहीं ही मिला है. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी, 2021 और 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी.
दिल्ली चुनाव में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ 'शीशमहल' और दिल्ली एक्साइज पॉलिसी केस (दिल्ली शराब घोटाला) को लेकर राहुल गांधी बिल्कुल वैसे ही आक्रामक थे, जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री अमित शाह और बाकी बीजेपी नेता. हालांकि, राहुल गांधी के हमलों पर अरविंद केजरीवाल की तरफ से भी वैसा ही रिएक्शन आया था. बीजेपी और कांग्रेस में मिलीभगत का आरोप लगाते हुए अरविंद केजरीवाल पूछने लगे कि आम आदमी पार्टी के नेताओं की तरह गांधी परिवार के लोग या रॉबर्ट वाड्रा जेल क्यों नहीं भेजे जाते?
बिहार चुनाव को लेकर तो राहुल गांधी दिल्ली चुनाव के दौरान ही एक्टिव हो चुके थे. बिहार दौरे के कारण राहुल गांधी को दिल्ली में पहले से तय किए हुए रोड शो भी रद्द करने पड़े थे. बिहार में राहुल गांधी ने वोटर अधिकार यात्रा तेजस्वी यादव के साथ ही निकाली थी, लेकिन आरजेडी नेता को मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं घोषित किया. राहुल गांधी अगली बार के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताने के बावजूद कांग्रेस नेता तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाए जाने के सवालों को सीधे सीधे टाल जाते थे.
राहुल गांधी और ममता बनर्जी
विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक में राहुल गांधी के सामने सबसे ज्यादा चुनौती ममता बनर्जी ही पेश करती रही हैं. 2024 के हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के बाद तो इंडिया ब्लॉक के नेतृत्व पर ही दावा कर दिया था. लालू यादव सहित कई नेता ममता बनर्जी को सपोर्ट भी करने लगे थे, लेकिन फिर पश्चिम बंगाल चुनाव के नजदीक आते आते मामला ठंडा पड़ गया.
अब अगर ममता बनर्जी इस बार भी बंगाल में 2021 की तरह 'खेला' कर देती हैं, तो इंडिया ब्लॉक की लीडरशिप पर दावेदारी और भी मजबूत हो सकती है. यह भी देखने को मिला है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के प्रति राहुल गांधी का व्यवहार दिल्ली में बिल्कुल बदल जाता है.
2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद ममता बनर्जी ने दिल्ली यात्रा का प्लान किया था. जुलाई, 2021 की कोलकाता रैली के दौरान कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम और महाराष्ट्र के दिग्गज नेता शरद पवार भी दिल्ली से वर्चुअल तरीके से शामिल हुए थे. ममता बनर्जी ने दोनों नेताओं से दिल्ली में विपक्ष की बैठक बुलाने को कहा था. चुनाव के दौरान ममता बनर्जी कहती थीं, एक पैर से बंगाल और दो पैरों से दिल्ली भी जीतेंगे. बंगाल तो जीत गईं, लेकिन उनके दिल्ली आते ही राहुल गांधी ने पेच फंसा दिया.
राहुल गांधी विपक्ष के नेताओं के साथ बैठक करने लगे. और, ममता बनर्जी दिल्ली में अकेले पड़ गईं. अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं से उनकी मुलाकात जरूर हुई, लेकिन शरद पवार ने तो दिल्ली में होते हुए भी मिलने का टाइम नहीं दिया. बगैर मिले ही, ममता बनर्जी मायूस होकर कोलकाता लौट गईं. बाद में शरद पवार से मिलने के लिए ममता बनर्जी मुंबई गई थीं, लेकिन सपोर्ट नहीं मिलने से हथियार डाल देने पड़े थे.
ममता बनर्जी सही मौके के इंतजार में सब कुछ बर्दाश्त करती रहीं. भारत जोड़ो यात्रा के तहत राहुल गांधी के बंगाल में एंट्री से पहले ही ममता बनर्जी ने कांग्रेस के लिए नो-एंट्री का बोर्ड लगा दिया. राहुल गांधी की यात्रा बंगाल में दाखिल होने की पूर्व संध्या पर ही ममता बनर्जी ने टीएमसी के लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान कर दिया. मतलब, कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन नहीं.
ममता बनर्जी के तेवर बरकरार रहे, लेकिन कांग्रेस नेताओं की तरफ से लगातार नरमी बरती गई. 2019 में 2 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 1 पर आ गई. ममता बनर्जी के खिलाफ आक्रामक तेवर में मोर्चा संभालने वाले अधीर रंजन चौधरी अपना चुनाव भी हार गए. बाद में उनको बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष पद से भी हटा दिया गया. ममता बनर्जी कभी भी अधीर रंजन को पसंद नहीं करती हैं - अधीर रंजन अब विधानसभा चुनाव के मैदान में बहरामपुर से उतरे हैं.
लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने के बावजूद नतीजे आने से पहले ममता बनर्जी ने दो तरह के बयान दिए थे. आखिरी बयान में ममता बनर्जी ने टीएमसी को इंडिया ब्लॉक का हिस्सा बताया था, लेकिन लोकसभा स्पीकर के चुनाव में कांग्रेस की तरफ से विपक्ष का उम्मीदवार उतार देने से नाराज हो गईं - कहते हैं, राहुल गांधी ने फोन पर बात की, तब ममता बनर्जी मान भी गईं - बाकी दिनों में तो कभी नीम-नीम, और कभी शहद-शहद जैसा ही रिश्ता महसूस होता है.