वट सावित्री व्रत विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं. इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है, जिसे स्थायित्व और दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है. इसमें महिलाएं वट वृक्ष के चारों ओर धागा बांधती हैं, उसकी परिक्रमा करती हैं और विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करती हैं. इसे दांपत्य जीवन में प्रेम, सुरक्षा और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है.
एक समय मद्र देश में अश्वपति नाम का राजा राज करता था. वह अत्यंत ही दयालु एवं धार्मिक प्रवृत्ति का था, लेकिन उसके कोई संतान न थी. उन्होंने ज्योतिषियों की सलाह पर संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ किया. जिसके बाद उनके यहां एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया, जिसका नाम सावित्री रखा. जब सावित्री बड़ी हुई तो उसने विवाह के लिए सत्यवान नाम के नवयुवक को चुना. जब यह बात देवर्षि नारद को पता चली तो उन्होंने सावित्री के पिता अश्वपति को बताया कि जिस सत्यवान से सावित्री विवाह करने जा रही है, उसकी आयु बहुत कम है, ऐसे में उसे कोई दूसरा वर चुनना चाहिए. नारद मुनि से यह बात पता चलते ही राजा अश्वपति ने सावित्री को बहुत समझाने का प्रयास किया, लेकिन सावित्री ने यह तर्क देते हुए अपनी बात पर अड़ी रही कि हिन्दू स्त्रियां वर के रूप में केवल एक ही बार किसी पुरुष को चुनती हैं. इसके बाद राजा अश्वपति ने सावित्री का विवाह सत्यवान के साथ कर दिया.
सत्यवान के पिता का नाम द्युमत्सेन था, जिनका राजपाट छिन चुका था. सत्यवान के माता और पिता दोनों की दृष्टि भी जा चुकी थी और वे वन में रहा करते थे. विवाह के बाद सावित्री भी अपने पति के सत्यवान के साथ उसी वन में रहकर अपने पति के साथ सास-ससुर की सेवा करने लगी. कुछ दिनों बाद नारद मुनि सावित्री के पास आए और उसे बताया कि अब सत्यवान की मृत्यु का समय आ गया है. जब यह बात सावित्री को पता चली तो उसने अपने पति की लंबी आयु की प्राप्ति के लिए उपवास करना प्रारंभ कर दिया. मान्यता है कि जिस तिथि पर सत्यवान की मृत्यु की बात नारद मुनि ने बताई थी, सावित्री ने उस दिन भी अपना व्रत रखा.
सत्यवान उस दिन जब जंगल में लकड़ी काटने के लिए जाने लगा तो सावित्री भी उसके साथ गई. जंगल में सत्यवान जब लकड़ी काट रहा था तो उसके सिर में अचानक से बहुत ज्यादा पीड़ा होने लगी औ वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया. सावित्री ने अचानक देखा कि वहां पर यम देवता अपने दूतों के साथ आ पहुंचे हैं. इसके बाद जब यमराज सत्यवान के प्राण हर ने के बाद दक्षिण दिशा की ओर जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगी. सावित्री को पीछे आता देख यमराज ने कहा कि हे पतिव्रता नारी! जहां तक तमु अपने पति का साथ दे सकती थी तुमने दिया, अब तुम वापस लौट जाओ. तब सावित्री ने कहा कि "जहां मेरे पति रहेंगे, मुझे भी उनके साथ वहीं रहना है. यही मेरा पति के प्रति धर्म है.
सावित्री की बात को सुनकर यमराज प्रसन्न हो गए और उन्होंने उससे वर मांगने को कहा. तब सावित्री ने उनसे अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी लौटाने को कहा. यमराज ने तथास्तु कहते हुए सावित्री को लौट जाने को कहा, लेकिन फिर सावित्री उनके पीछे-पीछे चलती रही. सावित्री की पतिव्रता को देखते हुए एक बार फिर यमराज ने उससे वर मांगने को कहा. तब सावित्री ने उनसे अपने सास-ससुर से खोया हुआ राज्य वापस मांगा. यमराज ने तथास्तु कहते हुए उसकी यह मनोकामना भी पूरी कर दी, लेकिन सावित्री फिर भी यम देवता के पीछे-पीछे चलती रही.
सावित्री के द्वारा पतिव्रत धर्म को निभाता देख एक बार फिर यमराज ने सावित्री से वर मांगने को कहा, तब उसने बोला मैं सत्यवान के 100 पुत्रों की मां बनना चाहती हूं. यमराज ने सावित्री के पतिव्रता को देखते हुए यह वरदान भी दिया और सत्यवान के प्राण वापस लौटा दिए. इस प्रकार सावित्री ने न सिर्फ अपने पति के प्राण बल्कि अपने सास-ससुर की दृष्टि और राज्य को भी वापस दिलवा दिया.
मान्यता है कि इस वट सावित्री की इस पावन कथा को कहने या सुनने से विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है.
वट सावित्री आरती
ओम जय जय सावित्री, ओम जय जय गायत्री
अपनी अनुपम तेज से जग पावन करती।।
ओम जय जय सावित्री, ओम जय जय गायत्री
अपनी अनुपम तेज से जग पावन करती।।
ओम जय जय सावित्री।
तुम ही रक्षक सबका, प्राणों का तुम प्राण
भक्तजन मिले सारे, नित्य करें तेरा ध्यान
ओम जय जय सावित्री, ओम जय जय गायत्री
भक्त तरसे तुम हो सभी विधि करें उपकार
अंतर्मन से सुमिर लो, सुने वो तभी पुकार,
ओम जय जय सावित्री।।
भक्तों का दुख भंजन रक्षा करें आठों याम,
दिव्य ज्योति तुम्हारी, रहें सदा अविराम
ओम जय जय सावित्री। ओम जय जय गायित्री।।
चारों विधि के मंत्रों का गुरु मंत्र तुम्हे कहते।
ऋषि मुनि योगी सारे गुणगान तुम्हारा करें।
ओम जय जय सावित्री। ओम जय जय गायित्री।।
अपनी अनुपम तेज से जग पावन करती।।
ओम जय जय सावित्री।
हृदय विराजो हे मां, भटक न जाऊ किसी ओर
ले लो अपनी शरण में, न छूटे कभी डोर।
ओम जय जय सावित्री। ओम जय जय गायित्री।।
अपनी अनुपम तेज से जग पावन करती।।
ओम जय जय सावित्री।
| नियम | विवरण |
| व्रत का दिन | ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि |
| पूजा का समय | सुबह |
| क्या खाएं | फलाहार |
| व्रत की अवधि | सुबह से दोपहर तक |
| क्या न करें | बाल या नाखून ना काटें |
| व्रत का महत्व | स्वास्थ्य , दीर्घायु और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि |
-------समाप्त-------