यदि असम में हिमंता बिस्वा सरमा ‘मियां’ के नाम पर और पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी ‘जय सनातन’ बोलकर विपक्ष की मुस्लिम वोटबैंक पॉलिटिक्स को टारगेट करते रहे, तो ऐसा सिर्फ सेकुलर-विरोध के कारण नहीं था असम में कांग्रेस और बंगाल में टीएमसी की रणनीति में उनके ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ का खेल चुनाव नतीजों से उजागर हो गया है. दोनों ही पार्टियां मुसलमान बहुल इलाकों में सिमट गई हैं. और ताजा चुनाव में वहां भी ये संघर्ष करती नजर आईं.
भारतीय राजनीति में 'सेकुलरिज्म' शब्द पिछले कुछ दशकों में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा है, लेकिन इसके मायने जमीन पर कितनी तेजी से बदले हैं, इसका सबसे सटीक उदाहरण पश्चिम बंगाल और असम के हालिया चुनावी नतीजे पेश करते हैं. कभी 'सर्वधर्म समभाव' के नाम पर लड़ी जाने वाली राजनीति अब खास भौगोलिक इलाकों और खास वोटबैंक तक सिमटती नजर आ रही है. बंगाल और असम में सेकुलरिज्म का झंडा उठाने वाली पार्टियों का आधार अब केवल मुस्लिम बहुल पॉकेट्स तक ही सीमित रह गया है.
बंगाल चैप्टर - टीएमसी की 'मुस्लिम किलेबंदी' में लगी सेंध
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने लंबे समय तक एक ऐसी 'सेकुलर' इमेज बनाई, जिसका केंद्र बिंदु राज्य का 27 से 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता रहा है. लेकिन हालिया चुनावी डेटा और जमीन पर बदलते समीकरण एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं. जिसे ममता बनर्जी अपनी ताकत मानती थीं, वही अब उनकी सबसे बड़ी चुनौती और पहचान बन गई है. बीजेपी ने उनके मुस्लिम तुष्टिकरण को एजेंडा बनाया. मुसलमानों की मजलिस में उनकी हिजाब पहने तस्वीरों और वीडियो को वायरल किया गया. बताया गया कि कैसे ईद के बाद मुसलमानों को संबोधित करते हुए उन्होंने कॉमन सिविल कोड, CAA, वक्फ कानून का विरोध किया.
एक समय था जब टीएमसी पूरे बंगाल में सर्वमान्य थी, लेकिन धीरे-धीरे उसकी 'सेकुलर' पॉलिटिक्स मुस्लिम डोमिनेटेड जिलों जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर और दक्षिण 24 परगना तक सिमटती चली गई. और साख बचाने के लिए इन्हीं इलाकों पर निर्भर रहना पड़ा.

मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे इलाकों में मुस्लिम आबादी 50 फीसदी या उससे भी अधिक है. वहां टीएमसी का प्रभाव जरूर है, लेकिन अब वह निर्विरोध नहीं रही. दिलचस्प बात यह है कि ममता बनर्जी जिसे 'सेकुलरिज्म' का नाम देती थीं, बीजेपी साबित कर दिया कि वो 'मुस्लिम अपीजमेंट' से ज्यादा कुछ नहीं है. और शायद यही वजह है कि हिंदू बहुल इलाकों में टीएमसी के प्रति एक अंडरकरंट नाराजगी पैदा हुई, जिसने पार्टी को इन खास मुस्लिम बेल्ट्स तक धकेल दिया.
मुस्लिम उम्मीदवारों का गणित और स्ट्राइक रेटः टीएमसी ने इस चुनाव में एक बहुत बड़ा दांव खेला और 47 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे. इनमें से 32 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की, जो किसी भी पार्टी के लिए एक शानदार स्ट्राइक रेट है. लेकिन इस आंकड़े के पीछे की हकीकत यह है कि ये 32 विधायक टीएमसी के कुल विधायकों का लगभग 40 फीसदी हिस्सा हैं.
यह डेटा यह बताने के लिए काफी है कि टीएमसी के भीतर अब मुस्लिम चेहरों का दबदबा बढ़ गया है. हालांकि यह उनकी जीत का आधार है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे पार्टी के 'सांप्रदायिक ध्रुवीकरण' के रूप में देख रहे हैं. जब एक कथित सेकुलर पार्टी के करीब आधे विधायक एक ही समुदाय से आने लगें, तो वह पार्टी अपनी व्यापक स्वीकार्यता खोने लगती है और एक 'कम्युनिटी स्पेसिफिक' पार्टी बनकर रह जाती है. भाजपा हिंदू पार्टी होना अफोर्ड कर पा रही है, लेकिन इस चुनाव ने बता दिया कि टीएमसी के लिए मुस्लिम पार्टी की पहचान घातक हो गई है.
मुस्लिम वोटबैंक में बिखराव: टीएमसी को हमेशा यह भरोसा रहता था कि बंगाल की 70-75 मुस्लिम बहुल सीटों पर उसका एकाधिकार है. लेकिन इस बार यह 'भ्रम' टूटता नजर आया. मुस्लिम मतदाताओं ने इस बार केवल ममता के नाम पर वोट नहीं दिया.
मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे इलाकों में मतदाताओं ने टीएमसी के बजाय स्थानीय मुस्लिम नेतृत्व को तरजीह दी. हुमायूं कबीर जैसे नेताओं की जीत, कांग्रेस के दो मुस्लिम उम्मीदवारों की वापसी और सबसे बढ़कर पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की पार्टी ISF (इंडियन सेकुलर फ्रंट) का उदय यह बताता है कि मुस्लिम वोटर अब टीएमसी के 'कम्पल्शन' से बाहर निकलना चाहता है. मुस्लिम मतदाताओं को लगा कि टीएमसी उन्हें केवल बीजेपी का डर दिखाकर वोट लेती रही है, जबकि जमीनी स्तर पर उनके लिए स्थानीय विकल्प बेहतर हो सकते हैं.
असम चैप्टर - कांग्रेस का 'अस्तित्व' मुस्लिम विधायकों के हवाले
अगर बंगाल में सेकुलरिज्म सिमट रहा है, तो असम में तो यह लगभग वेंटिलेटर पर है. असम की राजनीति हमेशा से 'आइडेंटिटी पॉलिटिक्स' के इर्द-गिर्द रही है, लेकिन हालिया नतीजों ने कांग्रेस की हालत को बेहद दयनीय बना दिया है.
126 सीटों वाली असम विधानसभा में कांग्रेस के मात्र 19 विधायक चुनकर आए हैं. इस आंकड़े का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इन 19 में से 18 विधायक मुस्लिम समुदाय से हैं. यानी असम में कांग्रेस अब 'इंडियन नेशनल कांग्रेस' के बजाय एक ऐसी पार्टी नजर आ रही है जिसका प्रतिनिधित्व केवल एक समुदाय कर रहा है.
गौरव गोगोई खुद अपनी सीट बचाने में नाकाम रहे, जिन्हें कांग्रेस का भविष्य माना जा रहा था. यह इस बात का प्रमाण है कि असम का गैर-मुस्लिम वोटर अब कांग्रेस से पूरी तरह कट चुका है. कांग्रेस ने 'सेकुलरिज्म' के नाम पर जो राजनीति की, उसे असम के आम नागरिक ने 'तुष्टिकरण' माना और पार्टी को सिरे से नकार दिया.

अजमल के साथ 'लव-हेट' रिलेशनशिप का अंजामः असम में मुस्लिम वोटों के बड़े दावेदार बदरुद्दीन अजमल और उनकी पार्टी AIUDF रही है. कांग्रेस ने लंबे समय तक अजमल के साथ 'पर्दे के पीछे' और कभी 'पर्दे के आगे' गठबंधन किया. इस बार गठबंधन नहीं होने के बावजूद, नतीजों ने दिखाया कि मुस्लिम मतदाताओं ने अजमल को छोड़कर कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों को चुना.
AIUDF को केवल दो सीटों पर संतोष करना पड़ा, जबकि कांग्रेस के 18 मुस्लिम उम्मीदवार जीत गए. इसका मतलब यह नहीं है कि कांग्रेस मजबूत हुई है, बल्कि इसका मतलब यह है कि मुस्लिम वोटरों ने 'टैक्टिकल वोटिंग' करते हुए कांग्रेस को बीजेपी के खिलाफ सबसे मजबूत विकल्प माना. लेकिन इस प्रक्रिया में कांग्रेस ने अपना बचा-कुचा हिंदू आधार भी खो दिया.
भूपेन बोरा ने निकाल दिए थे तुष्टिकरण के गड़े मुर्देः असम कांग्रेस के भीतर मचे घमासान ने तब सुर्खियां बटोरीं जब पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा ने पार्टी छोड़ी. बोरा ने जाते-जाते कांग्रेस की आलाकमान और प्रदेश इकाई पर मुस्लिम तुष्टिकरण के गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पार्टी केवल एक खास वोटबैंक को खुश करने के चक्कर में असम के मूल निवासियों की भावनाओं को नजरअंदाज कर रही है. बोरा का यह बयान उस 'फ्रस्ट्रेशन' का नतीजा था जो कांग्रेस के भीतर के उन नेताओं में है, जो देख रहे हैं कि कैसे पार्टी एक 'रिलीजियस प्रेशर ग्रुप' बनकर रह गई है.
क्या यह 'सेकुलर' राजनीति का अंत है?
बंगाल और असम के नतीजे बताते हैं कि 'सेकुलरिज्म' का भारतीय संस्करण अब एक गहरे संकट में है. जब पार्टियां 'सेकुलर' होने का दावा करती हैं, लेकिन उनका इलेक्टोरल बेस केवल मुस्लिम पॉकेट्स तक सीमित हो जाता है, तो वह 'सेकुलरिज्म' नहीं बल्कि 'कम्युनल रिप्रेजेंटेशन' बन जाता है.
इन दोनों राज्यों की राजनीति यह सबक देती है कि तुष्टिकरण की राजनीति का एक 'सैचुरेशन पॉइंट' होता है. जब बहुसंख्यक समाज को लगता है कि 'सेकुलरिज्म' केवल उनके हितों की बलि चढ़ाकर किसी एक वर्ग को खुश करने का जरिया है, तो वे एक ठोस 'काउंटर-पोलराइजेशन' की ओर बढ़ते हैं. बंगाल और असम की राजनीति अब इसी चौराहे पर खड़ी है, जहां 'सेकुलर' कहलाने वाली पार्टियां खुद ही अपने बनाए हुए 'मुस्लिम बाहुल्य' के घेरे में कैद हो गई हैं. नतीजा, अब वोटर भी या तो ‘हिंदू’ है, या फिर ‘मुस्लिम’. न ‘सेकुलर’ बचा, और न सेकुलरिज्म.