सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान की तेहरान यात्रा और हूतियों को एक अरब डॉलर देने के कथित प्रस्ताव ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि खाड़ी क्षेत्र की सबसे शक्तिशाली राजशाही कब तक सैन्य दबाव और आर्थिक सौदेबाजी का सहारा लेती रहेगी. इजरायली अखबार इजरायल हायोम की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी पक्ष ने ईरान की मध्यस्थता से हूती नियंत्रित इलाकों में सरकारी कर्मचारियों के वेतन और बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए यह राशि देने का प्रस्ताव रखा है. बदले में हूतियों से सऊदी तेल सुविधाओं, हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों पर हमले रोकने की अपेक्षा है. सऊदी अधिकारियों ने धन हस्तांतरण की पुष्टि नहीं की है और इसे तीन साल पुरानी समझौते के कार्यान्वयन से जोड़ा है. फिर भी, इस खबर ने राजनीतिक और मीडिया हलकों में फिरौती और सरेंडर जैसे शब्दों को जन्म दे दिया है.
सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में हार की स्वीकृति है या लंबी लड़ाई से निकलने का व्यावहारिक रास्ता? यमन में सऊदी अरब की सैन्य भागीदारी 2015 से चल रही है. उद्देश्य था हूतियों को सत्ता से हटाना और यमन की अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्यता प्राप्त सरकार को बहाल करना. लेकिन हूती न केवल टिके रहे, बल्कि ईरानी समर्थन से मिसाइल और ड्रोन क्षमता विकसित कर ली है. उन्होंने लाल सागर में शिपिंग को भी निशाना बनाया और अब सऊदी भूमि पर हमले तेज कर दिए हैं. तेल निर्यात पर निर्भर सऊदी अर्थव्यवस्था के लिए ये हमले महंगे साबित हो रहे हैं. एक अरब डॉलर की राशि, भले ही बड़ी लगे, सऊदी बजट और दैनिक तेल राजस्व के मुकाबले सीमित है. अगर इससे हमले रुकते हैं और निर्यात स्थिर रहता है, तो आर्थिक गणना सऊदी पक्ष के पक्ष में जाती है.
यह प्रस्ताव पूरी तरह नया नहीं है. तीन साल पहले की समझ में सऊदी अरब को हूती इलाकों में वेतन और पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक मदद देनी थी. हूतियों का आरोप है कि रियाद ने इन प्रतिबद्धताओं से मुकर लिया, जिसके कारण हमले फिर शुरू हुए. मौजूदा बातचीत उसी ढांचे को पुनर्जीवित करने की कोशिश है. मक्का संयुक्त रक्षा गठबंधन के तहत पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर और तुर्की के खुफिया प्रमुख इब्राहिम कलिन की उपस्थिति इसे क्षेत्रीय कूटनीति का रूप देती है. ईरान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है, जो उसकी क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की रणनीति के अनुरूप है. हालांकि सऊदी विदेश मंत्रालय अपनी इस यात्रा को तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान का हिस्सा बताया है. जो सही भी है. क्योंकि यह साफ दिख रहा है कि सऊदी किसी भी कीमत पर शांति चाहता है.
फिर भी, इसे समझौता कहने से से पहले कई बातें ध्यान में रखनी होंगी. हूती किसी एक खास देश के किरदार नहीं हैं. वो यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवादी समूह के रूप में भी जाने जाते हैं. उनसे आर्थिक मदद के बदले हमले रोकने की अपेक्षा करना अल्पकालिक राहत तो दे सकता है, लेकिन स्थायी शांति की गारंटी नहीं. अतीत में भी हूतियों ने समझौतों का इस्तेमाल अपनी सैन्य स्थिति मजबूत करने के लिए किया है. अगर सऊदी का धन हूती नेतृत्व या ईरानी चैनलों के जरिए जाता है, तो उसकी निगरानी कठिन होगी. सऊदी पक्ष के लिए यह शर्मनाक भी है. सैन्य शक्ति से कमजोर विरोधियों को न रोक पाना और फिर पैसे देने का प्रस्ताव देने को क्या कहा जाएगा?
दरअसल सऊदी अरब किसी भी तरह तेल निर्यात की निरंतरता, घरेलू स्थिरता और क्षेत्रीय तनाव में कमी चाहता है. लंबे युद्ध ने अरब स्प्रिंग के बाद की सऊदी विदेश नीति की सीमाएं दुनिया के सामने उजागर कीं हैं. सैन्य समाधान न हो पाने की स्थिति में कूटनीतिक और आर्थिक प्रोत्साहन का इस्तेमाल कई देशों ने पहले भी किया है. लेकिन जब यह प्रोत्साहन हमलावर पक्ष को दिया जाए, तो इसे सरेंडर की श्रेणी में डालना आसान हो जाता है. अंतर यह है कि सरेंडर में शर्तें एकतरफा होती हैं और समझौते में दोनों पक्ष कुछ देते और कुछ पाते हैं. यहां सऊदी पक्ष हमले रोकने और सीमित शांति के बदले पैसा दे रहा है यह पूरी तरह एकतरफा नहीं है, लेकिन शक्ति संतुलन हूतियों के पक्ष में झुका हुआ दिखता है.
क्षेत्रीय संदर्भ भी महत्वपूर्ण है. मक्का गठबंधन में पाकिस्तान और तुर्की शामिल हैं, लेकिन हमलों के बावजूद उन्होंने सैन्य बल नहीं भेजा. यह गठबंधन की व्यावहारिक सीमाएं दिखाता है. ईरान के साथ बातचीत सऊदी-ईरानी संबंधों के सामान्यीकरण के बाद की जटिलता को भी रेखांकित करती है. दोनों देश प्रतिद्वंद्वी बने हुए हैं, लेकिन सीधी टकराव से बचने की कोशिश कर रहे हैं. हूती मुद्दा इस संतुलन की परीक्षा है.
अंततः, यह सौदा समझौता और सरेंडर के बीच की एक धुंधली रेखा पर खड़ा है. इसे शुद्ध सरेंडर कहना अतिरंजित होगा, क्योंकि सऊदी अरब अभी भी सैन्य क्षमता रखता है और शर्तें रख रहा है. लेकिन इसे सामान्य कूटनीतिक समझौता भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह एक ऐसे समूह को वित्तीय सहायता देता है जिसने वर्षों से सऊदी हितों को निशाना बनाया है. इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि धन का उपयोग वास्तव में नागरिकों के हितों होता है या नहीं. इसके साथ ही हूती हमले स्थायी रूप से रुकते हैं या नहीं यह भी देखना होगा. अगर हमले जारी रहे या शर्तें तोड़ी गईं, तो यह प्रस्ताव कमजोरी की मिसाल बन जाएगा. अगर शांति बनी रही, तो इसे व्यावहारिक राज्यनीति कहा जाएगा.
खाड़ी क्षेत्र की राजनीति में शक्ति, पैसा और प्रतिरोध अक्सर एक साथ चलते हैं. सऊदी अरब की यह कोशिश दिखाती है कि सैन्य समाधान की सीमाएं पहचान ली गई हैं. लेकिन लंबे समय में स्थायी शांति केवल आर्थिक प्रोत्साहन से नहीं, बल्कि यमन की आंतरिक राजनीति, क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और विश्वसनीय निगरानी तंत्र से आएगी. फिलहाल यह प्रस्ताव जोखिम भरा है, जो समझौते के नाम पर सरेंडर ज्यादा दिखता है.