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‘मैं समय हूं’... लेकिन क्या ग्रीनविच से उज्जैन वापस लाया जा सकता हूं?

मैकाले वाली मानसिकता को दूर करने का बीड़ा उठाए केंद्र सरकार ने समय चक्र का निर्धारण करने वाले केंद्र पर नई बहस छेड़ी है. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि वक्त आ गया है कि दुनिया को बताया जाए कि दुनिया का टाईम ग्रीनविच रेखा से तय न होकर उज्जैन से किया जाए. जहां महाकाल विराजमान है.

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समय को लेकर खींचतान...
समय को लेकर खींचतान...

उज्जैन को लेकर एक पुरानी बहस फिर नए सिरे से उठ खड़ी हुई है. जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मप्र के सीएम मोहन यादव की मौजूदगी में यह कहा कि दुनिया का स्टैंडर्ड टाइम उज्जैन को केंद्र मानकर तय होना चाहिए, तो यह महज़ एक बयान नहीं रहा. यह इतिहास, परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच खिंची एक दिलचस्प रेखा बन गया. सवाल सीधा है, लेकिन जवाब उतना सरल नहीं.

धर्म और आध्यात्म के गूढ़ विषयों में दिलचस्पी रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार डॉ. विवके चौरसिया बताते हैं 'उज्जैन को क्यों कहा जाता है काल गणना का केंद्र?'

प्राचीन काल से अवंतिका, उज्जयिनी अथवा आज का उज्जैन कालगणना का केंद्र रहा है. माना जाता है कि स्टैंडर्ड टाइम के संदर्भ में आज जो प्रतिष्ठा ग्रीनविच की है वह एक ज़माने में उज्जैन की थी. यह स्थान ही समय अर्थात काल का मानक था. कदाचित इसी कारण यहां के प्रधान देवता महाकाल हुए. महाकाल, अर्थात मानक समय के महान देवता. और काल अर्थात मृत्यु के भय से मुक्ति प्रदान करने वाले मृत्युंजय देवता भी महाकाल हैं. अनजाने काल से चला आ रहा यही लोकविश्वास कालयात्रा की असंख्य सदियों के बाद उत्तरोत्तर और अधिक दृढ़ होता गया है.

उज्जैन कालगणना का केंद्र रहा और है, इसके पीछे जो वैज्ञानिक तर्क गिनाए जाते हैं उनमें प्रमुख हैं पुराणों में बारम्बार उज्जैन को दी गई नाभिदेश की उपमा. वराह पुराण में तैत्तरीय श्रुति के प्रमाण से कहा गया है कि 'नाभिदेशे महाकालस्तन्नाम्ना तत्र वै हर:.' अर्थात नाभिदेश में महाकाल नाम से वे शिव यहां विराजमान हैं. सृष्टि का प्रारंभ महाकाल से ही हुआ. अतः महाकाल को कालचक्र का प्रवर्तक और प्रतापी भी कहा गया है. 'कालचक्रप्रवर्तको महाकाल: प्रतापन:.' इस तरह उज्जैन धरती का नाभिदेश अर्थात केंद्र है और यहां के देवता महाकाल इसके केंद्रबिंदु होकर कालगणना के आधार हैं. उज्जैन को नाभिदेश कहने का वैज्ञानिक आधार भी है.

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ध्यान रहे उत्तरी ध्रुव की स्थिति पर 21 मार्च से प्रायः छह मास के दिनों के तीन मास बीत जाने पर सूर्य दक्षिण क्षितिज से अत्यंत दूर की ऊंचाई पर चला जाता है. आचार्य वराहमिहिर की मान्यता थी कि उस समय सूर्य उज्जैन के ठीक मस्तक पर आ जाता है. उज्जैन के अक्षांश और परमकांति दोनों ही 24 अंश माने गए हैं. सूर्य की ठीक मस्तक पर स्थिति उज्जैन के अतिरिक्त विश्व के किसी और अक्षांश पर प्राप्त नहीं होती. इसी प्राकृतिक और भौगोलिक विशेषता के कारण उज्जैन एकमात्र ऐसा स्थान है जहां से काल का ठीक-ठीक ज्ञान पाना सम्भव है. यह भी कि जिस प्रकार आकाश में सूर्य मस्तक पर ठीक उज्जैन में आता है वैसे ही खगोल में भी उज्जैन को ठीक मध्यवर्ती स्थान मिला हुआ है. आकाश और धरती का केंद्र होने से ही उज्जैन को नाभिदेश माना गया है.

यह प्रमाणित है कि कर्क रेखा उज्जैन से होकर गुजरती है. इसी तरह उत्तर-दक्षिण की भूमध्य रेखा कभी उज्जैन से होकर गुजरती थी. इन रेखाओं ने भी उज्जैन को कालगणना का केंद्र बनने में महती भूमिका निभाई. यह भी मान्यता है कि कालगणना में शंकु यंत्र का महत्व है. पृथ्वी के केंद्र उज्जैन में उस शंकु यंत्र का स्थान महाकाल ज्योतिर्लिंग है. उज्जैन की इन्हीं विशेषताओं के कारण आचार्य वराहमिहिर ने इसे अपनी कर्मस्थली बनाया और राजा जयसिंह ने देश के अन्य चार नगरों की भांति उज्जैन को वेधशाला के निर्माण के लिए चुना. जयसिंह की बनवाई वेधशाला के प्राचीन यंत्रों से आज भी सटीक कालगणना हो रही है.

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लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या ग्रीनविच लाइन के पास गया समय लौटेगा?

इस सवाल तक पहुंचने से पहले कि क्या वाकई आज के दौर में उज्जैन को वैश्विक समय का केंद्र बनाया जा सकता है, यह जानना जरूरी है कि अगर उज्जैन इतना महत्वपूर्ण था, तो फिर ग्रीनविच कैसे दुनिया का समय केंद्र बन गया? इसका जवाब इतिहास की राजनीति में छिपा है. औद्योगिक क्रांति के दौर में ब्रिटेन समुद्री व्यापार और वैश्विक ताकत का केंद्र बन चुका था. शिपिंग के लिए एक समान समय और देशांतर रेखा की जरूरत थी. 1884 में अंतरराष्ट्रीय मेरिडियन सम्मेलन हुआ, जिसमें ग्रीनविच को शून्य देशांतर मान लिया गया. यह फैसला वैज्ञानिक कम और राजनीतिक-आर्थिक ज्यादा था. क्योंकि, हमारे समेत दुनिया के बड़े हिस्से पर कमोबेश ग्रीनविच वाले अंग्रेजों का राज था. आज भारत पूर्वी देश इसलिए कहा जाता है, क्योंकि पॉलिटिकल ज्योग्राफी में दिशाएं भी अंग्रेजों ने तय कीं.

यहां से बहस का दूसरा पहलू शुरू होता है. क्या आज, जब दुनिया तकनीकी रूप से कहीं आगे बढ़ चुकी है, हम फिर से समय के केंद्र को लेकर सोच सकते हैं? सैद्धांतिक रूप से यह संभव है, लेकिन व्यावहारिक रूप से बेहद मुश्किल. पूरी दुनिया की घड़ियां, जीपीएस, सैटेलाइट सिस्टम, एटामिक वॉच, एयर ट्रैफिक, इंटरनेट सर्वर- सब कुछ ग्रीनविच टाइम पर टिका हुआ है. इसे बदलना ऐसा ही होगा जैसे पूरी दुनिया की भाषा बदलने की कोशिश करना.

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फिर भी, इस बहस का महत्व कम नहीं हो जाता. उज्जैन को कालगणना का केंद्र मानने का विचार हमें अपनी वैज्ञानिक विरासत की याद दिलाता है. अक्सर हम अपनी परंपराओं को केवल धार्मिक चश्मे से देखते हैं, जबकि उनमें गहरा वैज्ञानिक आधार छिपा होता है. उज्जैन इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जहां महाकाल का मंदिर और वेधशाला एक ही शहर में खड़े होकर यह बताते हैं कि आस्था और विज्ञान कभी विरोधी नहीं थे.

आज जरूरत इस बात की है कि हम इस विरासत को नए नजरिए से देखें. उज्जैन को दुनिया का टाइम सेंटर बनाना शायद संभव न हो, लेकिन इसे ज्ञान और अनुसंधान का केंद्र जरूर बनाया जा सकता है. खगोलशास्त्र, इतिहास और गणित के क्षेत्र में उज्जैन को फिर से स्थापित करने की पहल हो सकती है. इससे न केवल हमारी परंपरा को सम्मान मिलेगा, बल्कि नई पीढ़ी को भी यह समझ आएगा कि भारत का अतीत केवल गौरवगाथा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक उपलब्धियों की कहानी भी है.

ऐसे में इस बात पर समय नष्ट नहीं करना चाहिए कि दुनिया का स्टैंडर्ड टाइम तय करने के लिए ग्रीनविच के बजाय उज्जैन को मानक माना जाए. खासतौर पर सरकारी उपक्रम में तो ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए. जिसमें साइंस काउंसिल भी शामिल हो. हां, यह भारतीय नॉलेज सिस्टम में अध्ययन का विषय अवश्य है. प्रधान जब इसे 1947 के ‘विकसित भारत’ मिशन से जोड़ देते हैं, तो सवाल उठता है कि क्या वाकई ऐसा होने से भारत विकसित कहा जाएगा? यह बहस किसी शहर को दूसरे के मुकाबले खड़ा करने की नहीं है. यह उस आत्मविश्वास की बात है, जिसमें हम अपने अतीत को समझकर वर्तमान को मजबूत करते हैं. उज्जैन को लेकर उठी यह चर्चा हमें यही याद दिलाती है कि समय सिर्फ घड़ी में नहीं चलता. वह हमारी सोच और हमारी पहचान में भी बहता है.

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