राज ठाकरे को अब तक सब कुछ साफ साफ नजर आने लगा होगा. ये भी मालूम हो गया होगा कि वो बाल ठाकरे कतई नहीं हैं. जैसे प्रियंका गांधी अपनी दादी जैसी होने के बावजूद, इंदिरा गांधी नहीं बन पाईं. किसी के जैसा लगने से कुछ नहीं होता. किसी की स्टाइल कॉपी करने से भी कुछ नहीं होता. फील्ड कोई भी हो, अपना ही हुनर तराशना होता है.
राज ठाकरे और प्रियंका गांधी में एक बड़ा फर्क भी है. प्रियंका गांधी को खुली छूट कभी नहीं मिली, जबकि राज ठाकरे हर जगह राजनीति में मनमर्जी चलाते रहे हैं. जब जो जो मन किया, करते रहे. सड़क पर उत्पात तो पुरानी शिवसेना की तरह ही, या थोड़ा आगे बढ़कर जारी रखा, लेकिन चुनावी राजनीति में उनका मन बार बार बदलता रहा.
शिवसेना के विरोध से शुरू हुई राज ठाकरे की राजनीति 2019 में मोदी के मुखर विरोध के रूप में भी देखने को मिली थी. बीएमसी चुनाव के लिए राज ठाकरे ने पहली बार औपचारिक गठबंधन किया था. बरसों पहले अलग हो चुके अपने चचेरे भाई उद्धव ठाकरे के साथ. लेकिन, ये भी बेकार चला गया.
बाल ठाकरे बनने के चक्कर में राज ठाकरे बर्बाद हो चुके उद्धव ठाकरे जैसे भी नहीं रह गए. नगर निगम चुनाव में पूरे महाराष्ट्र के 2869 वार्डों से आए रुझानों में राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस कुल 15 सीटों पर आगे है, जिनमें 8 बीएमसी की हैं. और, 29 में से 24 नगर निगमों में तो खाता भी नहीं खुल सका है. गठबंधन में राज ठाकरे बीएमसी की 52 सीटों पर चुनाव लड़े थे, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना 163 सीटों पर.
लुंगी, पुंगी और रसमलाई...
महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव में अगर किसी एक नेता या पार्टी की सबसे ज्यादा भद पिटी है, तो वो हैं राज ठाकरे. ठाकरे बंधुओं ने मिलकर 'मराठी मानुष' का मुद्दा खूब उछाला. लेकिन, उसको धार देने के चक्कर में राज ठाकरे खूब अंड-बंड भी कह गए. एक बार लगा कि शायद दोनों भाई मिलकर अपनी राजनीति को फिर से चमका पाएंगे, लेकिन वोटर को कुछ और ही मंजूर था. उद्धव ठाकरे की दुर्गति तो हुई ही, राज ठाकरे तो कहीं के नहीं रहे.
मुंबई रैली में ठाकरे बंधु बिल्कुल पुराने अंदाज में गरजते बरसते नजर आए थे. राज ठाकरे भी, और उद्धव ठाकरे भी. दोनों में से कोई किसी से कम नजर नहीं आ रहा था. अंदाज भी मराठी अस्मिता के लिए कुछ भी करेगा टाइप था - नतीजे बता रहे हैं कि लोगों को ठाकरे बंधुओं का ये अंदाज जरा भी पसंद नहीं आया.
राज ठाकरे ने महाराष्ट्र के लोगों पर हिंदी थोपने के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी थी. यूपी और बिहार के लोगों को पहले की ही तरह निशाना बनाया था. शिवसेना का पुराना सियासी रंग 'मद्रासी' विरोध भी महसूस किया गया. तमिलनाडु के BJP नेता के. अन्नामलाई के बहाने बीजेपी को खूब खरी खोटी सुनाई. अन्नामलाई को रसमलाई, और तमिलनाडु को लुंगी-पुंगी बोलकर सरेआम मजाक भी उड़ाया था.
मुंबई रैली में राज ठाकरे पूर्वांचल के लोगों को समझा रहे थे कि हिंदी भाषा से उनको नफरत नहीं है. और कह रहे थे, लेकिन अगर आप इसे थोपने की कोशिश करेंगे, तो मैं आपको सबक सिखाऊंगा. मराठी लोगों के लिए उनका कहना था, महाराष्ट्र में हर तरफ से लोग आ रहे हैं और आपका हिस्सा छीन रहे हैं... अगर जमीन और भाषा दोनों चली गईं, तो आपका अस्तित्व खत्म हो जाएगा.
और आगाह कर रहे थे कि अगर वे मौका चूक गए तो उनका अस्तित्व खत्म हो जाएगा. कह रहे थे, आज ये संकट आपके दरवाजे पर आ गया है... ये मराठी आदमी का आखिरी चुनाव है.
बीजेपी पर हमले के लिए राज ठाकरे ने अन्नामलाई को निशाने पर लिया था. बोले, एक रसमलाई तमिलनाडु से आई थी... आपका यहां से क्या संबंध है? हटाओ लुंगी, बजाओ पुंगी.
बीजेपी नेताओं के लिए तो कुछ कहना मुश्किल हो गया था. लिहाजा चुप्पी साध ली, और एकनाथ शिंदे को आगे किया गया. एकनाथ शिंदे ने भी बस इतना ही कहा कि अन्नामलाई को ऐसा नहीं बोलना चाहिए था.
अन्नामलाई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर कहा, आदित्य ठाकरे और राज ठाकरे मुझे धमकाने वाले कौन होते हैं? मुझे किसान का बेटा होने पर गर्व है... सिर्फ मुझे अपमानित करने के लिए सभाएं आयोजित की हैं... मुझे नहीं पता कि मैं इतना महत्वपूर्ण हो गया हूं या नहीं.
फिर बोले, कुछ लोगों ने लिखा है कि अगर मैं मुंबई आया तो वे मेरे पैर काट देंगे... मैं मुंबई आऊंगा, मेरे पैर काटने की कोशिश करो... अगर मैं ऐसी धमकियों से डरता तो अपने गांव में ही रहता.
बीएमसी और नगर निगम के चुनाव नतीजे तो यही इशारा कर रहे हैं कि महाराष्ट्र के लोगों को राज ठाकरे की राजनीति में अब बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं रही. वे समझने लगे हैं कि बाहरी लोगों के नाम पर उनको बहकाने की कोशिश की जा रही है. राज ठाकरे का बार बार स्टैंड बदलना भी उनकी राजनीति के खिलाफ जा रहा है.
पाला बदलते रहे, और फेल होते गए
राज ठाकरे ने राजनीति का ककहरा शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे से ही सीखा था. जैसे ही उनको भनक लगी कि शिवसेना में भी वारिस तो बेटा ही होगा, अपना अलग रास्ता अख्तियार करने का फैसला कर लिया. उद्धव ठाकरे को शिवसेना की कमान सौंपा जाना वो बर्दाश्त नहीं कर पाए.
27 नवंबर, 2005 को राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ दी, और अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा की. करीब चार महीने बाद 9 मार्च, 2006 को मुंबई में राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नाम से अपना राजनीतिक दल बनाया था - शुरुआत ठीक ठाक ही रही, लेकिन बाद में बार बार स्टैंड बदलने के कारण हालत खराब होती गई.
1. शुरुआत शिवसेना स्टाइल में ही की. उद्धव ठाकरे के हाथ में कमान आने से पहले शिवसेना की जो उत्पाती स्टाइल थी, राज ठाकरे ने भी वही अपनाया. महाराष्ट्र और मराठी मानुष के मुद्दे उठाकर अपनी जमीन मजबूत करने में जुट गए.
2. लोकसभा चुनाव, 2009 में 11 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन हाथ कुछ बी नहीं लगा. विधानसभा चुनाव में 143 सीटों पर चुनाव लड़े, और 13 सीटें जीतने में सफल रहे. ये सीटें मुख्य रूप से मुंबई और पुणे की थीं.
3. लोकसभा और विधानसभा के बाद राज ठाकरे ने बीएमसी चुनाव में भी अपने उम्मीदवार उतारे. 2012 में बीएमसी की 27 और 2017 में 7 सीटें मिल पाई थीं.
4. जब 2009 और 2014 के लोकसभा चुनाव में राज ठाकरे को कुछ हासिल नहीं हुआ, तो 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया. 2009 में राज ठाकरे के 11 और 2014 में 10 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे.
5. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को 2014 और 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में एक-एक सीट जरूर मिली थी - लेकिन 2024 में तो उनके बेटे अमित ठाकरे को भी हार का मुंह देखना पड़ा.
Over the past few years, the Adani Group has expanded at an extraordinary pace—be it the power sector, ports, airports, or almost every major sphere within the state. One by one, critical sectors are being handed over to a single corporate conglomerate.
— Raj Thackeray (@RajThackeray) January 13, 2026
As Maharashtrians, if we… pic.twitter.com/wfZ48ICDKp
2014 के आम चुनाव में राज ठाकरे ने तब के बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का सपोर्ट किया था, लेकिन पांच साल बाद अपने स्टैंड से यू टर्न ले लिया.
2019 के चुनाव में राज ठाकरे ने एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन का सपोर्ट किया, और पूरे चुनाव में उनका जोरदार मोदी विरोध दिखा. जगह जगह बड़े बड़े स्क्रीन लगाकर वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान दिखाते, और फिर जोरदार हमला बोल देते. करीब करीब वैसे ही जैसे मौजूदा बीएमसी चुनावों में वो अडानी के कारोबार के वीडियो दिखा रहे थे.