scorecardresearch
 

बधाई हो, हमारे पास फंक्शनिंग डेमोक्रेसी है!

NEET पेपर लीक के बाद छात्रों का गुस्सा सड़कों पर उतर आया. विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे बड़ा होता गया और इसमें राजनीतिक दलों व दूसरे संगठनों की भी एंट्री हो गई. इस सियासी खींचतान में सबसे ज्यादा नुकसान उन मासूम छात्रों का हुआ, जो अपने भविष्य और न्याय की लड़ाई लड़ रहे थे.

Advertisement
X
NEET पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का आक्रोश सड़कों पर दिख रहा है (Photo- ITG)
NEET पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का आक्रोश सड़कों पर दिख रहा है (Photo- ITG)

लोग अक्सर कहते रहते हैं कि हमारा देश और इसका सिस्टम सड़ चुके हैं, बेकार हो गए हैं. पर मैं इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं हूं, और मेरे पास इसका सबूत भी है. पिछले दो हफ्तों में हमारे लोकतंत्र का हर एक अंग अपनी पूरी ताकत से काम कर रहा था-  कुछ तो 200% की स्पीड से! तो खुश हो जाइए, सिस्टम ने अपना काम एकदम परफेक्ट किया है. बस, बच्चे टूट गए. आप जरा क्रोनोलॉजी समझिए.

शुरुआत वहीं से करते हैं जहां से हमारे देश के सारे सिस्टम शुरू होते हैं-  यानी लीक से. NEET का पेपर एक बार फिर लीक हो गया. लाखों स्टूडेंट, उनके पेरेंट्स, टीचर्स और कोचिंग का पूरा धंधा सब एक साथ बैठे और उन्होंने भारतीय सार्वजनिक जीवन के सबसे दुखद शब्द कहे: "ओह् नो, फिर से वही!"

फिर हमारी सरकार हरकत में आई. CBI ने तुरंत चील की तरह झपट्टा मारा और लीक करने वालों, बेचने वालों, खरीदने वालों और हर तरह के मिडिल मैन को दबोच लिया-  वो मिडिल मैन जो इतने पवित्र प्रक्रिया को मंगल बाजार समझकर बेचते हैं. फिर से एग्ज़ाम कराने का ऑर्डर हुआ. महीने भर के अंदर एग्ज़ाम हो गया और रिज़ल्ट भी आ गया. एकदम साफसुथरा, नीट. लगभग NEET वाला नीट.

इसी महीने के आसपास, कोर्ट रूम से एक शब्द बाहर निकल आया. देश के चीफ जस्टिस साहब एक ऐसे वकील की याचिका सुन रहे थे, जिसके पास कोई काम- धंधा तो था नहीं. वो जनहित याचिकाएं (PIL) ऐसे दायर कर रहा था जैसे कबूतर बीट करते हैं. सुनवाई के दौरान जस्टिस साहब के मुंह से एक कीड़े का नाम निकल गया- 'कॉकरोच'. यह शब्द पूरे देश में बहुत तेज़ी और गलत तरीके से फैला.

Advertisement

बोस्टन में बैठे आम आदमी पार्टी के एक कार्यकर्ता ने हवा में ही इस शब्द को लपक लिया और एक मीम पेज बना डाला- 'कॉकरोच जनता पार्टी'. देखते ही देखते 2.2 करोड़ लोग इस कॉकरोच डांस में शामिल हो गए. उसके सलाहकारों ने- जो सब 30 साल से कम उम्र के 'स्ट्रैटेजिस्ट' थे- उसे वही बात बताई जो हर भारतीय इन्फ्लुएंसर एक न एक दिन सुनता है: "ऑडियंस तो मिल गई है, अब कोई मुद्दा ढूंढो." अभिजीत दीपके निकल पड़े मुद्दे की शॉपिंग पर.

सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ प्रोटेस्ट करना तो लिस्ट से बाहर था, क्योंकि देश में अगर कोई कानून सचमुच पूरी निष्ठा से लागू होता है, तो वो है अवमानना का कानून. इसलिए उन्होंने 'कॉकरोच' शब्द का दायरा बढ़ा दिया. उन्होंने तय किया कि कॉकरोच का मतलब है- बेरोज़गार. लेकिन भारत में बेरोजगारी कोई हॉट टॉपिक नहीं है, गुनगुना भी नहीं. यह तो 1951 से टेबल पर ऐसे ही पड़ा है जैसे किसी बीजेपी नेता के सामने चिकन का पीस.

फिर उन्हें NEET मिला, और NEET को वो मिल गए. पेपर लीक ही हमारे देश का अकेला ऐसा 'नेशनल इंटीग्रेशन प्रोजेक्ट' है जो सच में काम करता है. केंद्र का एग्ज़ाम हो, स्टेट का हो, कॉनस्टेबल की भर्ती हो या पटवारी की वैकेंसी- लीक सब होता है, और इसे रोकने वाला कोई M-Seal दूर- दूर तक नजर नहीं आता.

Advertisement

लाखों बच्चे परेशान थे, और उनके पास अपने इस दर्द को बयां करने की कोई जगह नहीं थी. बिना पते का दर्द सिर्फ शोर बनकर रह जाता है. दीपके ने उस दर्द को एक पता दे दिया: "धर्मेंद्र प्रधान को जाना होगा." एक डिमांड, एक हैशटैग... और बात आग की तरह फैल गई.

वो इस उम्मीद में दिल्ली उतरे कि हाथों में हथकड़ियां लगेंगी, लेकिन स्वागत में मालाएं पहना दी गईं. उन्होंने जंतर-मंतर पर धरना देने की परमिशन ही नहीं मांगी थी, उन्हें लगा था कि मनाही का नोटिस ही उनके आंदोलन का अगला सीन बनेगा. पर परमिशन मिल गई! भारत सरकार प्रेशर कुकर का हिसाब किसी भी आम भारतीय परिवार की तरह बहुत अच्छे से समझती है. सरकार ने सीटी बजने देने का फैसला किया.

आम आदमी पार्टी (AAP), जो खुद एक आंदोलन के पेट से जन्मी है- अपने बंदे को एक नया आंदोलन शुरू करते देख गदगद थी. बीजेपी भी खुश थी. करने दो इन्हें ट्वीट, चिल्लाने दो, थकने दो, जब मानसून आएगा और ये तिरपाल स्विमिंग पूल बन जाएगी, तो खुद ही घर लौट जाएंगे.

क्योंकि नैतिकता के नीचे, सियासत का नक्शा छुपा है.

अगले साल पंजाब में चुनाव हैं. वहां AAP की सरकार है. बीजेपी वहां छोटी प्लेयर है, लेकिन उसका कॉन्फिडेंस 64-बिट वाला है क्योंकि उसने बंगाल जैसी मुश्किल जगह में भी पैर जमाए थे. वो AAP के कई जाने-पहचाने चेहरों को पहले ही तोड़ चुकी है. इसलिए AAP ने दीपके के कंधे पर पूरा ज़ोर लगा दिया, क्योंकि युवाओं का गुस्सा अगर सही तरीके से भड़काया जाए, तो वो भगवंत मान से दूर किसी गुमनाम दिशा में मुड़ जाता है- और यह AAP को सूट करता था.

Advertisement

बीजेपी इस बात से खुश थी कि कांग्रेस इस पूरे फ्रेम से बाहर खड़ी रह गई, क्योंकि पंजाब में बीजेपी नहीं, बल्कि कांग्रेस ही AAP के लिए असली खतरा है. और उधर राहुल गांधी- जो सालों से यूनिवर्सिटी के ऑडिटोरियम में जाकर एक-एक पुश-अप लगाकर यूथ वोट बैंक बना रहे थे- वो इस नए लड़के को अपनी मेहनत की मलाई नहीं खाने देना चाहते थे, उन्हें शक था कि यह लड़का AAP का फ्रंट है.

तभी सोनम वांगचुक की एंट्री हुई. वो अभी- अभी जेल से छूटे थे और उन्हें इस बात का ताज़ा-ताज़ा अहसास हुआ था कि FCRA के सख्त नियमों की वजह से विदेशी फंडिंग वाले NGO अब भूखे मरने वाले हैं. वो मंच पर चढ़े और खाना-पीना छोड़ दिया. वो अपने साथ एक ऐसी चीज़ लाए जो दीपके कभी पैदा नहीं कर सकते थे- एक भारी-भरकम 'बायोग्राफी'. केजरीवाल ने NGO चलाया और नेशनल प्लेयर बन गए. वांगचुक NGO चलाते हैं और अभी भी लोकल नेता हैं, लद्दाख में भी छोटे लेवल के. भूख हड़ताल तो एक ऐसा रेगुलर लोन है जो यह एक्टिविस्ट अपने ही शरीर के खिलाफ उठाता रहता है. यानी अन्ना हजारे का पार्ट-2.

इस बीच सारा ऑर्गनाइज़ेशन का काम किया एल्गोरिदम ने. इंस्टाग्राम- जो किसी 45 साल के चार्टर्ड अकाउंटेंट का ईमान तक डगमगा सकता है- उसे 17 साल के बच्चों पर छोड़ दिया गया. ईको- चेंबर गूंजने लगा.

Advertisement

सरकार को जब हीट महसूस हुई तो उसने वहम का एयर कंडीशनर ऑन कर लिया. सोचा- जमाना बदला है, यह भी एक ट्रेंड है, दो दिन में ठंडा पड़ जाएगा. पर उम्मीद कोई स्ट्रैटेजी नहीं होती. उम्मीद ठंडी पड़ गई, लेकिन आंदोलन नहीं. वांगचुक के नाजुक कंधों पर क्रांति का बोझ था, दीपके की टीम लॉजिस्टिक्स संभाल रही थी और जुनैद खाने-पीने का इंतज़ाम देख रहा था.

मेनस्ट्रीम मीडिया को पहले और दूसरे दिन ही भीड़ ने खदेड़ दिया, उन्हें ट्रोल किया गया, गालियां दी गईं, धक्के मारे गए. इसके बाद दीपके ने मीडिया की गैरमौजूदगी को एक साजिश के सबूत की तरह पेश किया. कमाल की ट्रिक है- पहले लाइटें बंद दो, फिर अंधेरे का रोना रोओ! वैसे भी उन्हें मीडिया की जरूरत कहां थी? उनकी ऑडियंस तो पहले से ही उनकी जेब में (स्मार्टफोन में इंस्टाग्राम पर) थी.

20वें दिन वांगचुक को मंच से उठाकर अस्पताल ले जाया गया और मेडिकल ऑब्जर्वेशन में रख दिया गया. वैसे भी 'विक्टिम बनना' एक कंटेंट फॉर्मेट है, और CJP को यह भाषा बहुत अच्छे से आती है. उन्होंने ऐलान कर दिया कि 20 जुलाई का संसद मार्च होकर रहेगा.

संसद का सेशन चल रहा था, इसलिए एक लिमिट से ज़्यादा भीड़ इकट्ठा होने पर रोक थी. बस फिर क्या था, बैरिकेड्स खड़े कर दिए गए.

Advertisement

अब छात्रों के पीछे-पीछे 'प्रोफेशनल' लोग मैदान में उतरे. समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता और चंद्रशेखर आजाद की आज़ाद समाज पार्टी के लोग पूरे यूपी से आ पहुंचे. ऐसे मर्द जिनकी पीठ पर लाठियों के निशान किसी ज्योतिषी के हाथ की रेखाओं की तरह पड़े हुए थे. पंजाब से बीजेपी का विरोध करने एक्टिविस्ट आ गए. NEET अब इस बहुमंजिला केक की सबसे निचली परत बनकर रह गया था. केक के ऊपर की सजावट के लिए पूर्वी दिल्ली का एक लोकल नेता अपने इलाके के चुनिंदा छोटे-मोटे गुंडों-मवालियों को ले आया. बवाल पक रहा था, बस फटने ही वाला था.

इस सब के बीच फंस गए उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के छोटे-छोटे शहरों से आए हजारों मासूम बच्चे. वे एक-दूसरे को नहीं जानते थे, अपने बगल में खड़े आदमियों को नहीं जानते थे, और उन्हें यह भी नहीं पता था कि किसी भी रैली का एक स्ट्रक्चर होता है, जिसे सर्वाइव करने से पहले समझना ज़रूरी होता है. उन्हें नहीं पता था कि रैली अमूमन लाठीचार्ज पर खत्म होती है, और बात बिगड़े तो पुलिस फायरिंग पर.

उपद्रवियों ने वही किया जिसके लिए उपद्रवियों को लाया गया था. बैरिकेड्स टूटे, गाड़ियां जलीं, पत्थर चले. और पुलिस- जिसकी ट्रेनिंग ही यह मानकर होती है कि हर भीड़ एक काडर की तरह है, और उसने पक्के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के हिसाब से नाप-तौलकर लाठियां भंजानी शुरू कर दीं.

Advertisement

वह लाठी सीधे 17 साल के उन बच्चों के सिर पर जाकर पड़ी, जो हाथ में पानी की बोतल और एक तख्ती लेकर आए थे. जिन्होंने सोमवार की सुबह से पहले लाठी सिर्फ टीवी स्क्रीन पर देखी थी. वे सवाल पूछने और जवाबदेही तय करने में तो बहुत होशियार थे, लेकिन जब लाठियों से जान बचाने की नौबत आई तो वे सन्न रह गए.

सोमवार और मंगलवार कोई राजनीति नहीं थी. सोमवार और मंगलवार सिर्फ अस्पताल का एक कॉरिडोर थे. मैं यहां निष्पक्ष होने का नाटक बिल्कुल नहीं करूंगा. उन बच्चों का गुस्सा सौ फीसदी जायज था. वे यह पूछे बिना आंदोलन में कूद पड़े कि लीडर कौन है, क्योंकि उनका मकसद साफ था. भले ही लीडरशिप ऐसी न रही हो. इस पीढ़ी की कमाल की बात है जो यह देखे बिना सड़कों पर उतर आती है कि पोस्टर पर फोटो किसकी लगी है.

वे नादान थे- हां. उनका इस्तेमाल हुआ- बिल्कुल.

लेकिन धोखाधड़ी उन लोगों ने की जिन्होंने उनका इस्तेमाल किया, दोष उन मासूम लड़कों-लड़कियों का नहीं है जिन्होंने भरोसा किया. और मेरा दिल उसी अस्पताल के कॉरिडोर में अटका है. उस लड़की के साथ, जिसकी कलाई में फ्रैक्चर है और जिसे घर जाकर कोई बहाना बनाना पड़ेगा. उस लड़के के साथ, जिसका चश्मा सड़क पर पीस दिया गया. और उस पुलिस कॉनस्टेबल के साथ भी, जो जुलाई की इस सूखी गर्मी में 11 घंटे से खड़ा था, जिसकी भोंह के ऊपर पत्थर लगने के बाद टांका लगा है, जो किसी का बाप है और किसी का बेटा, और जिसे सिर्फ इसलिए ट्रांसफर कर दिया जाएगा क्योंकि उसने वही किया जो उसे ऑर्डर दिया गया था.

सोमवार को उस सड़क पर खड़ा कोई भी इंसान वहां होना नहीं चाहता था. सोमवार को उस सड़क पर मौजूद हर एक इंसान ने कीमत चुकाई. बाकी का काम एल्गोरिदम ने पूरा कर दिया. जिन्हें चोटें देखनी थीं, उन्हें सिर्फ चोटें दिखाई गईं. जिन्हें साज़िश देखनी थी, उन्हें बाल्टियां भर- भरकर साज़िश दिखाई गई. 48 घंटे के अंदर पूरा पोलराइज़ेशन कम्पलीट! भारत की किसी भी सरकारी सर्विस से तेज़ डिलिवरी!

देश गुस्से में है. पुलिस की इस बर्बरता पर गुस्से में है. सरकार के बहरेपन पर गुस्से में है. और धर्मेंद्र प्रधान अभी भी मंत्री पद पर कायम हैं.

उधर राहुल गांधी ने जब देखा कि बिना किसी काडर वाला एक नया-नवेला लड़का उनके पूरे प्लान पर पानी फेर रहा है, तो उन्होंने अपना अलग प्रोटेस्ट शुरू कर दिया. दिल्ली में तनाव है. नए उपद्रवियों की मांग भेजी गई है, पेमेंट एडवांस में रखवा दी गई है.

लेकिन इस बदसूरत, चमकती और वाहियात ज़िंदगी का पॉज़िटिव साइड देखिए ना! सब कुछ एकदम बढ़िया काम कर रहा था. सरकार मजबूत थी. स्टेट सख्त था. विरोध साफ दिख रहा था. प्रोटेस्ट की परमिशन दी गई थी. मार्च को एक पाइंट तक आगे बढ़ने दिया गया- और ये पाइंट ही तो है, जिससे लोकतंत्र बना होता है.

पुलिस ने अपना काम किया- उसने वायलेंस पर स्टेट की मोनोपॉली को इतने बेहतरीन तरीके से लागू किया कि समाजशास्त्री वेबर खुश हो जाते और उनकी मां डिप्रेशन में चली जातीं.

अपोज़िशन सड़कों पर उतरा, जनता की बात सुने जाने के अधिकार की रक्षा के लिए, जनता के ऊपर ही चिल्ला-चिल्लाकर!

संसद ने स्थगित होकर काम किया. विपक्ष अपनी बात सुनाने के लिए शोर कर रहा था, सत्ता पक्ष अपनी बात सुनाने के लिए चिल्ला रहा थी. सुन कोई किसी की नहीं रहा था. पर सब कुछ इतिहास के पन्नों में दर्ज हो रहा था.

न्यायपालिका ने अपना काम किया- प्रोटेस्ट वाली याचिकाओं को बिल्कुल न सुनकर! जिस चीफ जस्टिस ने 'कीड़े' वाला शब्द दिया था, उन्होंने आगे कुछ नहीं कहा. कोई स्वतः संज्ञान (Suo motu) नहीं लिया, कोई सफाई नहीं दी.

मजबूत सरकार ने अपना काम किया- युवाओं के उन स्वयंभू, बिना चुने हुए नुमाइंदों की ब्लैकमेलिंग के आगे झुकने से इनकार करके... वैसे, यही वो कैटेगरी है जिसने 1974 में हमारी आज की कैबिनेट के ज़्यादातर मंत्रियों को पैदा किया था.

युवाओं ने अपना काम किया- तब तक घर लौटने से मना करके जब तक कि जवाबदेही उसी रूप में सामने न आ जाए जैसी उन्होंने सोची थी. यानी धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा!

वामपंथियों (Left) ने अपना काम किया- क्रांतिकारी गाने गाकर. उग्र-वामपंथियों (Far Left) ने अपना काम किया- कम उम्र के बच्चों को यह समझाकर कि जवानी में मर जाना करियर बनाने जैसा है (यह बताए बिना कि किसका करियर?).

प्रोफेशनल प्रदर्शनकारियों ने अपना काम किया- वे हमेशा की तरह हर उस जगह मौजूद थे जहां किसी मुद्दे के ऊपर तंबू गड़ जाता है. पहले YouTube पर जाकर मीडिया को कोसना, फिर सड़क पार करके उसी मीडिया की ओबी वैन को एक स्वीट सी बाइट दे देना.

रिफॉर्मर और रिपोर्टर- उन्हें प्रदर्शनकारियों ने पीटा क्योंकि वे सरकार-समर्थक लग रहे थे, और उन्हें पुलिस ने भी डंडे मारे क्योंकि वे पत्थरबाज़ों के पास खड़े थे. इसके बावजूद वे अब भी वहीं डटे हैं, अपना काम कर रहे हैं.

हमारे लोकतंत्र का हर एक अंग बिल्कुल वैसा ही काम कर रहा है जैसा उसे डिजाइन किया गया था.

चैन की नींद सोइए, हमवतनों. कुछ भी नहीं टूटा है.

बस... बच्चे टूट गए हैं. एकदम नीट.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement