पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती. गद्दारी और लालच की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती. बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है. सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है. पर ये भी सबसे ख़तरनाक नहीं होता. सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना. सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना.
दिल्ली का जन्तर-मंतर यानी वह दहलीज़ जहां से देश का ग़ुस्सा अपने हुक्मरानों से फरियाद करता है. ये फरियादें दरबार के किस हिस्से तक पहुंचने में कामयाब होती हैं, इसी बात से फरियाद के क़द और उसकी हैसियत का अंदाज़ा लगाया जाता है. लेकिन इस बार चोट थोड़ी गहरी है. इस बार जंतर-मंतर पर गम और गुस्से का अजीब संगम है. किसी को छात्रों और आम लोगों का त्यौहार देखना हो तो उसे जंतर-मंतर का नज़ारा ज़रूर देखना चाहिए.
हर तरफ बस एक ही शोर है कि शायद इस बार कुछ ऐसा हो जाए कि फिर किसी बच्चे के सपने को एग्ज़ाम के नाम पर कोई चुराने की हिम्मत ना कर पाए. मां-बाप और उनके बच्चों के सपनों के हक में एक ऐसा कानून बन सके जिसके बाद हर बच्चे का मुस्तकबिल महफूज हाथों में हो.
नाइंसाफ़ी, बेईमानी और भ्रष्टाचार का सैकड़ों साल पुराना किस्सा नई पोशाक पहनकर एकबार फिर हमारे दिलों पर दस्तक दे रहा है. रगों में लहू बन कर उतर चुका इम्तेहान चोरों का कैंसर आखिरी ऑपरेशन की मांग कर रहा है. अवाम सियासत के बीज बोकर हुकूमत की रोटियां सेंकने वाले नेताओं के भविष्य का फैसला करना चाहती है. ये गुस्सा एक मिसाल है कि हजारों छात्र जब एक मकसद के लिए एक साथ स्कूल-कालेज से निकल कर गांधी के बताए आंदोलन का हिस्सा बन जाते हैं तो हिंदुस्तान का हिंदुस्तानियत पर यकीन और बढ़ जाता है.
मंहगाई, गरीबी और भूख.. और बेरोज़गारी जैसे अहम मुद्दों से रोज़ाना और लगातार जूझती देश की अवाम के सामने भ्रष्टाचार इस वक्त सबसे बड़ा मुद्दा और सबसे खतरनाक बीमारी है. अगर इस बीमारी से हम पार पा गए तो यकीन मानिए सोने की चिड़िया वाला वही सुनहरा हिंदुस्तान एक बार फिर हम सबकी नजरों के सामने होगा. पर क्या ऐसा हो पाएगा? क्या आप ऐसा कर पाएंगे? जी हां. हम आप से पूछ रहे हैं.
क्योंकि सिर्फ क्रांति की मशालें जला कर, नारे लगा कर, आमरण अनशन पर बैठ कर या सरकार को झुका कर आप छात्रों की ये जंग नहीं जीत सकते. इस जंग को जीतने के लिए खुद आपका बदलना जरूरी है. क्योंकि भ्र्ष्टाचार और बेईमानी को बढ़ावा देने में आप भी कम गुनहगार नहीं हैं. नीट एग्जाम पेपर लीक सिर्फ एक लीकेज नहीं बईमानी और भ्रष्टाचार का पूरा एक गटर है. दिल्ली के दिल जंतर मंतर से शुरू हुआ इंकलाब उम्मीद की किरण जगाता है कि अपने देश को ईमानदार और भ्रष्टाचार मुक्त बना कर हमारे भविष्य यानी नौजवानों का भविष्य बेहतर बनाने का हमारा सपना अभी मरा नहीं है.
ये अलग बात है कि हक और ईमानदारी की बात करते हुए हम अपनी जिम्मेदारियों की चर्चा तक नहीं करना चाहते. और दूसरों से ईमानदारी से नीट या उस जैसे दूसरे इम्तिहान को कराने की उम्मीद रखते हैं. बहुत से लोग ये कह सकते हैं जंतर-मंतर पर मौजूद छात्र निरंकुश थे, या सियासी लोग उन्हें इस्तेमाल कर रहे थे. ऐसे लोगों को जंतर-मंतर के इस गम और ग़ुस्से को करीब से महसूस करना चाहिए. ये भीड़ किसी वोट बैंक का हिस्सा नहीं बल्कि उनकी है जो पूरे साल की पढ़ाई की मेहनत और अपने मां-बाप के सपनों के बार-बार टूटने से तंग आ चुके हैं. अगर हम तंग आ चुके इन हज़ारों लोगों को किसी एक नाम से पुकारेंगे तो यक़ीनन वह नाम आंदोलन ही होगा. बाकी सब आजा़द हैं अपने-अपने हिसाब से इसे कोई और नाम देने के लिए.
जंतर मंतर यानि मशीन और मंतर मंत्र के मतलब की गिनती. यानी जंतर-मंतर का मतलब हुआ वक्त और ग्रहों की गिनती करने वाली मशीन. क्या इत्तेफाक है ना कि आज जो जंतर मंतर धरने प्रदर्शन और आंदोलन का पहचान बन चुका है, गुजरे वक्त में वो देश की महान वैज्ञानिक तरक्की का सबूत हुआ करता था. और ये भी क्या इत्तेफाक है कि 33 साल पहले 1993 में डूसू यानि दिल्ली यूनिर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन ने पहली बार जंतर मंतर पर कोई बड़ा प्रदर्शन किया था. उसके बाद से जंतर मंतर वो जगह बन गई जो सबको जगह देती है. जहां लोकतंत्र सचमुच ज़िंदा नज़र आता है. वही इस बार भी हो रहा है. इसी जंतर मंतर पर. पर क्यों? तो असल में इसकी शुरुआत इसी साल मई में हुई थी.
पूरे साल कड़ी मेहनत और सपनों पर नज़रे गड़ाए 22 लाख बच्चे डॉक्टर बनने के लिए नीट के इम्तेहान में बैठते हैं. उस इम्तेहान में जिसे चोरों ने पहले ही चुरा लिया था. पेपर लीक हो चुका था. एग्जाम कैंसिल. अब सोचिए सिर्फ उन बच्चों के बारे में नहीं. उनके मां-बाप के बारे में. जिन्होंने अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने की हसरत में अपनी सारी पूंजी लगा दी. कुछ की पूंजी कम पड़ी तो बच्चों की खातिर घरबार बेच दिया. पर उन्हें मिला क्या- धोखा. अब अगर एक देश एक इम्तिहान तक को चोरों से ना बचा पाए तो भारत का भविष्य गुस्सा तो होगा. उदास और मायूस भी.
बहुत से तो ऐसे बच्चे थे, जिन्हें एग्जाम के बाद लगा था कि उनकी मंजिल बस अब दरवाजे पर खड़ी है. इम्तिहान ही इतना अच्छा दिया था. लेकिन जब नीट चोरों के चोरी की दास्तान सामने आई तो ऐसे बहुत सारे बच्चे टूट गए. देशभर में 20 से ज्यादा बच्चों ने अपनी जान दे दी. सोचिए, सोच कर ही अजीब लगता है जिंदगी का इम्तिहान तो समझ आता है पर बच्चों का इम्तिहान भी जान लेता है.
नीट के उन बच्चों ने यूं ही जान नहीं दे दी थी. बल्कि उसके पीछे भी एक कड़वे सच की दास्तान थी. हमारा देश दुनिया के गिने चुने उन सबसे बड़े देशों में से एक है, जहां सबसे बड़ा स्कूली सिस्टम है. देश भर में मौजूद 14 लाख 71 हजार स्कूल हैं, जिनमें लगभग 24 करोड़ 70 लाख बच्चे पढ़ते हैं. भारत चीन के बाद दूसरा ऐसा देश है, जहां सबसे ज्यादा ग्रेजुएट पैदा होते हैं. हर साल देश के अलग अलग कॉलेजों से करीब 50 लाख बच्चे ग्रेजुएट होते हैं.
लेकिन जानते हैं हर साल इन 50 लाख ग्रेजुएट होने वाले इन बच्चों में से नौकरी कितनों के हिस्से में आती है, सिर्फ़ 28 लाख. यानि हर साल औसतन 22 लाख बच्चे ग्रेजुएट होने के बावजूद बेरोजगारों की गिनती बढ़ाते जाते हैं. अब ऐसी सूरत में अगर पूरे साल की मेहनत के बाद एक पूरा एग्जाम ही चोर चुरा ले जाए तो उन बच्चों पर क्या बीतती होगी. उनके मां-बाप का क्या हाल होता होगा और यहीं से ये सवाल और गुस्सा दोनों एक साथ आया कि जिस देश का डंका पूरी दुनिया में बजने के दावे किये जा रहे हैं, वो देश बच्चों का एक छोटा सा एग्जाम भी चोरों और भ्रष्टाचारियों से नहीं बचा सकता.
मई में पेपर लीक के बाद बच्चे नाराज थे, उदास थे, गुस्सा थे. छोटे छोटे मंचों से अपनी आवाज़ उठाने की कोशिश कर रहे थे. पर तभी एक अजीब वाक्या हुआ. देश की सबसे बड़ी अदालत की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठे भारत के चीफ जस्टिस के मुंह से एक शब्द निकल पड़ा- कॉकरोच. दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट से निकले इस एक शब्द को अमेरिका के बॉस्टन शहर में एक भारतीय ने मजाक मजाक में लपक लिया. और उसी मजाक-मज़ाक में सोशल मीडिया पर अचानक कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म हुआ. शुरुआत में सोशल मीडिया पर ये मजाक ही बना हुआ था. इस पर मीम्स बन रहे थे. सब इसे मजाक में ही ले रहे थे. लेकिन असल में चुपचाप खामोशी के साथ यही कॉकरोच नीट के मारे बच्चों का साथी बन बैठा.
उधर, हुक्मरानों को लगा कि कोई नहीं दोबारा नीट का एग्जाम करा देंगे. गरज तो बच्चों को है. डॉक्टर बनना है तो वो इम्तिहान में बैठेंगे ही. लंबे चौड़े दावों के बीच पहली बार दुश्मन देशों की सरहदों के अंदर जाने वाले वायु सेना के जहाजों को डॉक्टरी के सवाल जवाब वाली पर्चियों यानि पेपर एग्जाम सेंटर तक भेजना पड़ा. तब कहीं जाकर बच्चों के इम्तिहान पूरे हुए और रिजल्ट भी आ गए, तो फिर सवाल है कि जंतर मंतर पर बच्चों का ये हुंकार क्यों.
लोगों के लिए मज़ाक में पैदा हुआ कॉकरोच अब जंतर-मंतर पहुंच चुका था. मुद्दा और मांग बड़े सीधे सादे थे. पढ़ाई के इंतज़ाम और तरीके अच्छे हों और पढ़ाई की फील्ड के देश के सबसे बड़े उस्ताद यानि शिक्षा मंत्री नीट एग्जाम में फेल होने के बाद स्कूल से नकिल जाएं यानि अपनी कुर्सी छोड़ दे. मांग सीधे बच्चों से जुड़ी थी. कॉकरोच नया-नया. और नई चीज़ हमेशा अपने साथ नई उम्मीदें लाती हैं. लिहाजा, देखते ही देखते अब सोशल मीडिया के पर्दे के बाहर हकीकत की जमीन पर भी बच्चे कॉकरोच से जुड़ते चले गए. अब भी सब कुछ शांत और ठीक-ठाक चल रहा था.
फिर तभी लद्दाख के समाजसेवी सोनम वांगचुक की जंतर मंतर में एंट्री होती है. फिर वो अचानक आमरण अनशन का एलान कर देते हैं. भूख हड़ताल शुरु हो जाती है. कई दिन बीत जाते हैं पर होता कुछ नहीं. लोग जंतर मंतर पर आते हैं और वीकेंड की छुट्टियां जैसी छुट्टियां मनाकर चले जाते. पर जैसे जैसे भूख हड़ताल के दिन बढ़ते गए अचानक लोगों को 15 साल पुराना जंतर मंतर याद आने लगा. 2011 का अन्ना हजारे का आंदोलन. वो आंदोलन जिसमें पहली बार नई नस्ल ने अन्ना हजारे में गांधी को देखना शुरु कर दिया था.
बीतते दिनों के साथ सोनम वांगचुक की तबीयत भी बिगड़ने लगी थी. वजन तेजी से गिर रहा था. ऐसे में कोई दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गया. इस फरियाद के साथ कि सोनम वांगचुक की जान बचाई जाए. यानि उनका आमरण अनशन खत्म करवाया जाए. दिल्ली हाईकोर्ट ने तुरंत एक फैसला सुनाया. कहा सोनम वांगचुक की जिंदगी कीमती है. उनकी सेहत का ख्याल रखा जाए. बस हाईकोर्ट का इतना भर ही दिल्ली पुलिस को एक हथियार दे गया.
20 जुलाई से संसद का मानसून सत्र शुरु होने वाला था. सोनम वांगचुक ने पहले ही ऐलान कर रखा था कि उस दिन सभी छात्र संसद तक मार्च करेंगे. लेकिन उससे पहले अचानक दिल्ली में हलचल तेज होती है. 17 जुलाई की सुबह अचानक दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को बदल दिया जाता है. नए कमिश्नर की पहली मीटिंग ही जंतर मंतर को लेकर होती है. पूरी शाम और रात तैयारी होती है. और फिर 18 जुलाई की सुबह सोनम वांगचुक के आमरण अनशन के ठीक 20वें दिन डॉक्टरों का भेष बनाकर दिल्ली पुलिस उन्हें जबरन मंच से उठाकर सफदरजंग अस्पताल पहुंचा देती है.
लगा अब 20 जुलाई का संसद मार्च मुमकिन नहीं. क्योंकि दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक को हटाने के साथ साथ जंतर मंतर को भी खाली करने का फरमान जारी कर दिया. लेकिन शायद दिल्ली पुलिस उस जंतर मंतर का मतलब भूल बैठी थी, जिसका जन्म ही समय और ग्रहों की गिनती करने के लिए हुआ था. 20 मार्च को हजारों बच्चे अपने समय और ग्रहों को बेहतर बनाने एक बार फिर उसी जंतर मंतर पर पहुंच चुके थे.
उधर. पुलिस भी तैयार थी बच्चों को रोकने के लिए और इधर बच्चे भी तैयार थे अपनी आवाज़ हुक्मरानों के कानों तक पहुंचाने के लिए. लाठियां चली, रोते हुए बच्चों के आंसुओं को आंसु गैसे के गोले से और ज्यादा भिगोया गया. कुछ को गिराया गया, कुछ को उठाया गया. कुछ थाने पहुंचे कुछ अस्पताल और कुछ जो वापस घर लौटे तो ये सोच कर लौटे कि अपने सपनों में रंग भरने के लिए वो वापस फिर लौटेंगे. इसी जंतर-मंतर पर. क्योंकि ये एक ऐसा आंदोलन है जिसकी आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना. तड़प का ना होना सब कुछ सहन कर जाना. घर से निकलना काम पर और काम से लौटकर घर आना. सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना. सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना.