जब हम न्याय के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में तुरंत आपराधिक मुकदमे, संवैधानिक चुनौतियां, ऐतिहासिक फ़ैसले और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामले आते हैं. क़ानून पर होने वाली सार्वजनिक चर्चाओं में भी प्रमुख तौर पर ऐसे ही विषय छाए रहते हैं. न्याय को अक्सर अदालतों से मिलने वाली और वहां होने वाली ऐसी प्रक्रिया समझा जाता है, जिसमें गंभीर अपराध, राज्य की शक्तियां और चर्चित क़ानूनी लड़ाइयां शामिल होती हैं, लेकिन इस बीच आम लोगों के साथ कहीं अधिक ख़ामोशी और सामान्य तरीक़े से अन्याय की घटनाएं होती रहती हैं. ऐसा तब होता है, जब कोई परिवार अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी घर ख़रीदने में लगाता है, लेकिन उसे घर नहीं मिलता. जब कोई बीमा कंपनी सही दावे को भी अस्वीकार कर देती है. जब कोई बैंक ग़ैरक़ानूनी शुल्क वसूलता है. जब कोई ख़राब उत्पाद, किए गए वादे के अनुसार काम नहीं करता. या जब कोई सेवा प्रदाता अपनी ज़िम्मेदारी पूरी नहीं करता तो ऐसी घटनाएं आमतौर पर सुर्ख़ियां नहीं बनतीं. ये घटनाएं करोड़ों लोगों के रोज़मर्रा के जीवन को प्रभावित करती हैं. इन्हीं घटनाओं के आधार पर लोग ये मन बनाते हैं कि वे बाज़ार, संस्थाओं और अपने अधिकारों की रक्षा करने वाली क़ानूनी व्यवस्था पर कितना भरोसा कर सकते हैं.
‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट’ की ओर से प्रकाशित ‘कंज़्यूमर जस्टिस रिपोर्ट 2026’ इन रोज़मर्रा के उल्लंघनों को गंभीरता से लेने की बात करती है. ये याद दिलाती है कि न्याय केवल आपराधिक क़ानून या संवैधानिक अधिकारों तक सीमित नहीं है. यह उन सामान्य लेन-देन में भी मौजूद है जो हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा हैं. इसलिए उपभोक्ताओं के सामूहिक हितों की रक्षा के लिए 24 जुलाई 2020 को ‘केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण’ (CCPA) की स्थापना की गई थी. यह नियामक एजेंसी अनुचित व्यापारिक गतिविधियों और भ्रामक विज्ञापनों की जांच कर सकती है. दोषी पाए जाने पर जुर्माना लगाने के अलावा ख़राब उत्पादों को वापस लेने का आदेश भी दे सकती है. लेकिन ‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट’ को सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी बताती है कि प्राधिकरण ने अपने अधिकारों का पूरा इस्तेमाल नहीं किया है.
अपने गठन के 6 वर्षों में सीसीपीए ने कुल 192 आदेश जारी किए. (Photo- ITG)
अपने गठन के 6 वर्षों में सीसीपीए ने कुल 192 आदेश जारी किए. यानी औसतन हर महीने तीन से भी कम आदेश. इसकी एक वजह मानव संसाधनों की कमी भी हो सकती है. उपभोक्ता मामलों के विभाग के सचिव ही सीसीपीए के मुख्य आयुक्त की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी निभाते हैं. मुख्य आयुक्त के अलावा CCPA में एक और आयुक्त और मात्र 18 स्वीकृत कर्मचारी पद हैं. अगर प्राधिकरण अपने अधिकार क्षेत्र का समुचित उपयोग करे तो उपभोक्ताओं को व्यापक स्तर पर राहत मिल सकती है और समूची विवाद निवारण प्रणाली को सकारात्मक संदेश जा सकता है.
‘कंज़्यूमर जस्टिस रिपोर्ट’ भारत की उपभोक्ता विवाद निवारण की व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर प्रकाश डालती है. साथ ही यह भी दिखाती है कि संस्थागत कमियां किस तरह उपभोक्ताओं को समय पर और प्रभावी राहत मिलने से रोक रही हैं.
रिपोर्ट में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त जवाबों से संस्थानों की क्षमता और बजट से जुड़े आंकड़ों और वर्ष 2010 से 2024 के बीच दर्ज 28.5 लाख उपभोक्ता विवादों का विश्लेषण किया गया है. इसके आधार पर ये भारत में उपभोक्ता न्याय व्यवस्था का अब तक का सबसे व्यापक आकलन प्रस्तुत करने का प्रयास करती है. रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण और चिंताजनक बातें राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों (SCDRC) और जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों (DCDRC) के अध्ययन से सामने आती हैं. विशेष रूप से राजधानी वाले शहरों के आयोगों का विश्लेषण पूरी उपभोक्ता न्याय व्यवस्था की स्थिति का महत्वपूर्ण संकेत देता है.
राष्ट्रीय स्तर पर उपभोक्ता आयोगों की स्थिति भी न्यायपालिका जैसी ही है. यहां मामलों के निपटारे में लगातार देरी हो रही है और लंबित मामलों का बोझ बढ़ता जा रहा है. वर्ष 2024 के अंत तक देशभर में 5 लाख से अधिक उपभोक्ता मामले लंबित थे. लंबित मामलों में कमी आने के बजाय उनकी संख्या लगातार बढ़ी है. वर्ष 2020 से 2024 के बीच इनमें लगभग 21 प्रतिशत की वृद्धि हुई. जिन संस्थानों का उद्देश्य लोगों को जल्दी और कम ख़र्च में न्याय दिलाना था, वे अब बढ़ती मांग के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं.
ऐसी स्थिति इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि उपभोक्ता अदालतों की स्थापना पारंपरिक मुक़दमेबाजी की लंबी और महंगी प्रक्रिया के विकल्प के रूप में की गई थी. ‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम’ ऐसी व्यवस्था की कल्पना करता है, जो सभी के लिए सुलभ, प्रभावी और उपभोक्ता हितैषी हो. क़ानून के अनुसार मामलों का निपटारा कुछ महीनों के भीतर हो जाना चाहिए, ताकि लोगों को अपने बुनियादी अधिकारों के लिए वर्षों तक अदालतों के चक्कर न लगाने पड़ें. लेकिन वास्तविक स्थिति इस उद्देश्य से काफी अलग है.
यह रिपोर्ट भारत के उपभोक्ता न्याय संस्थानों की चिंताजनक तस्वीर पेश करती है. इन अदालतों की स्थापना वस्तुओं और सेवाओं से जुड़े विवादों का सरल और अपेक्षाकृत तेज़ समाधान देने के लिए हुई थी, लेकिन पूरी व्यवस्था अब देरी से जूझ रही है. रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष ये है कि राज्य उपभोक्ता आयोगों में लंबित लगभग हर तीन मामलों में से एक मामला तीन वर्ष से अधिक समय से लंबित है. इससे यह सवाल उठता है कि क्या ये संस्थान उपभोक्ताओं को समय पर न्याय देने में सक्षम हैं.
रिपोर्ट में उपभोक्ता न्याय संस्थानों में मानव संसाधनों की भारी कमी का भी उल्लेख किया गया है. जनवरी 2025 तक राज्य उपभोक्ता आयोगों में स्वीकृत सदस्य पदों में लगभग 40 प्रतिशत पद ख़ाली थे. कई राज्यों में अध्यक्ष और सहायक कर्मचारियों के पद भी रिक्त पाए गए. कई आयोग लंबे समय तक पूर्ण नेतृत्व और पर्याप्त कर्मचारियों के बिना काम करते रहे. साथ ही इसमें कार्यभार, मामलों के निपटारे की दर और लंबित मामलों से जुड़े आंकड़े भी दिए गए हैं. ये सभी तथ्य बताते हैं कि उपभोक्ता विवादों के समाधान के ज़िम्मेदार संस्थानों की क्षमता में लगातार कमी बनी हुई है.
राजधानी वाले शहरों में स्थित ज़िला उपभोक्ता आयोग इन चुनौतियों को समझने का अच्छा माध्यम हैं. राज्यों की राजधानियां व्यापार, आवास, वित्त और सेवाओं का प्रमुख केंद्र होती हैं. यहां उपभोक्ताओं के लेन-देन और विवाद दोनों की संख्या अधिक रहती है. इसलिए इन आयोगों के कामकाज से पता चलता है कि अधिक दबाव के बीच उपभोक्ता न्याय संस्थान किस हद तक काम करने में सक्षम हैं. वैसे हमारे देश में उपभोक्ता न्याय का ढांचा भी समान रूप से विकसित नहीं हो सका है. हमारे मूल्यांकन के समय भारत में 775 ज़िले थे, लेकिन उनमें केवल 685 ज़िला उपभोक्ता आयोग ही कार्यरत थे. इसका अर्थ है कि कई ज़िलों में आज भी अलग उपभोक्ता मंच उपलब्ध नहीं हैं. यह संस्थागत व्यवस्था में बड़ी कमी दर्शाता है.
राजधानी वाले शहरों के आयोगों के अध्ययन में रिक्त पदों, कर्मचारियों की संख्या, लंबित मामलों, बजट और विवादों के निपटारे की दर जैसे मानकों पर काफ़ी अंतर दिखाई दिया. एक ओर, जहां दिल्ली के ज़िला आयोगों का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा. यहां कई आयोगों में मामलों के निपटारे की औसत दर 95 प्रतिशत तक रही. इसके विपरीत, कोलकाता में काफ़ी समय से लंबित मामलों की संख्या अधिक थी. कुछ आयोगों में एक-तिहाई से अधिक मामले तीन वर्ष से ज्यादा समय तक लंबित रहे. कर्मचारियों की उपलब्धता में भी अंतर देखा गया. कई आयोगों में अध्यक्ष, सदस्य या अन्य कर्मचारियों के पद ख़ाली थे. चेन्नई और बेंगलुरु में भी संस्थागत क्षमता और कार्यभार प्रबंधन में अंतर दिखाई दिया. कुछ आयोगों ने मामलों के निपटारे में अच्छा प्रदर्शन किया, जबकि कई आयोगों में सदस्य और प्रशासनिक कर्मचारियों के पद लंबे समय तक ख़ाली रहे. अन्य राजधानी वाले शहरों, जैसे अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, विजयवाड़ा, कामरूप, पटना, दुर्ग, उत्तरी गोवा, गांधीनगर और गुरुग्राम के आयोगों का प्रदर्शन भी एक जैसा नहीं था. इनमें केवल एक-तिहाई आयोग ही 100 प्रतिशत या उससे अधिक मामलों के निपटारे की दर हासिल कर सके. कई आयोगों में कर्मचारियों की भारी कमी बनी रही.
इन आयोगों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी काफ़ी सीमित रहा. वर्ष 2020 के नियमों के अनुसार, प्रत्येक आयोग में अध्यक्ष हो या सदस्य कम से कम एक महिला का होना अनिवार्य है. अधिकांश आयोगों ने इस न्यूनतम नियम का पालन किया, लेकिन महिलाओं की भागीदारी इससे ज़्यादा आगे नहीं बढ़ सकी. पूरे देश में केवल दो महिला अध्यक्ष थीं. चार राज्य उपभोक्ता आयोगों में महिलाओं की हिस्सेदारी एक-तिहाई से भी कम थी. राजस्थान में यह अनुपात सबसे कम पाया गया.
वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच आरटीआई का जवाब देने वाले 21 राज्य आयोगों के बजट में 52 प्रतिशत की वृद्धि हुई. हालांकि वर्ष 2024-25 में केवल 85 प्रतिशत राशि ही ख़र्च की गई. कुछ राज्यों ने बढ़ते मामलों और अधिक रिक्तियों के बावजूद अपने बजट में कटौती की. ज़िला स्तर पर 14 राजधानी वाले शहरों के आयोगों के बजट के आंकड़े उपलब्ध थे. इन आयोगों को वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच कुल 45 करोड़ रुपए का आवंटन मिला और इनमें से लगभग 44 करोड़ रुपए ख़र्च किए गए. विभिन्न आयोगों के बीच संसाधनों का अंतर काफी बड़ा था. भोपाल को चार वर्षों में सबसे अधिक 7.3 करोड़ रुपए मिले, जबकि विजयवाड़ा को इसी अवधि में केवल 9.3 लाख रुपए मिले. इनके ख़र्च का स्वरूप भी अलग-अलग रहा. ये आंकड़े बताते हैं कि एक ही क़ानून के तहत काम करने के बावजूद उपभोक्ता न्याय संस्थानों को मिलने वाले संसाधनों में बड़ा अंतर है.
रिपोर्ट के निष्कर्ष, न्याय तक पहुंच की हमारी समझ को और व्यापक बनाते हैं. उपभोक्ता अदालतों को अक्सर क़ानूनी व्यवस्था का एक विशेष या सीमित हिस्सा माना जाता है. लेकिन आम नागरिक अपने दैनिक जीवन में होने वाले नुक़सान के लिए सबसे अधिक इन्हीं संस्थानों का दरवाज़ा खटखटाते हैं. इसलिए उपभोक्ता न्याय संस्थानों का कामकाज़ यह बताने का महत्वपूर्ण आधार है कि क़ानूनी अधिकार व्यवहार में कितने प्रभावी हैं. रिक्त पद, बुनियादी ढांचे की कमी, बजट, कर्मचारियों की उपलब्धता, लंबित मामले और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे केवल प्रशासनिक आंकड़े नहीं हैं. यही तय करते हैं कि संस्थान विवादों को कितनी प्रभावी ढंग से स्वीकार कर, सुन और निपटा सकते हैं. ‘कंज्यूमर जस्टिस रिपोर्ट 2026’ इन अनुभवों को चर्चा के केंद्र में लाती है. यह उन व्यवस्थाओं, संसाधनों और संस्थानों की ओर ध्यान आकर्षित करती है, जिन पर देश के करोड़ों नागरिकों की न्याय तक पहुंच निर्भर करती है.
(लेखक इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के सह-संस्थापक और प्रमुख हैं. यह उनके निजी विचार हैं)