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मुकुल रॉय को बंगाल में टीएमसी ही नहीं, बीजेपी भी हमेशा याद रखेगी

टीएमसी जितना तो नहीं, लेकिन बंगाल में बीजेपी के पांव जमाने में मुकुल रॉय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, क्रेडिट भले ही कम मिला हो. ममता बनर्जी के साथ संगठन संभालने, दिल्ली की राजनीति में खास रोल निभाने, केंद्र सरकार में मंत्री बनने और भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते विवादों में रहे मुकुल रॉय हमेशा ही सुर्खियों में रहे.

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ममता बनर्जी बनर्जी के साथ मुकुल रॉय. (Photo: File/ITG)
ममता बनर्जी बनर्जी के साथ मुकुल रॉय. (Photo: File/ITG)

मुकुल रॉय को बंगाल की राजनीति में चाणक्य की संज्ञा वैसे ही दी जाती थी, जैसे बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और देश की मौजूदा राजनीति में बीजेपी नेता अमित शाह को मिली हुई है. तृणमूल कांग्रेस की स्थापना से लेकर, बंगाल में बीजेपी की जड़ें जमाने तक - मुकुल रॉय ने शिद्दत से मेहनत की, और नतीजे भी दिए. 

वाम मोर्चा को पश्चिम बंगाल की सत्ता से बेदखल करने में मुकुल रॉय ने अगर ममता बनर्जी का कदम कदम पर साथ दिया और तृणमूल कांग्रेस को खड़ा किया, तो बंगाल में बीजेपी के लिए मजबूत ग्राउंड भी तैयार किया, जिसका नतीजा 2019 के आम चुनाव में बीजेपी को मिली 18 लोकसभा सीटों के रूप में सामने आया था. 

महत्वपूर्ण बात यह रही कि मुकुल रॉय शुरू से आखिर तक ममता बनर्जी के साथ बने रहे. बस, बीच में कुछ दिनों के लिए भटक गए थे, जब उनका नाम शारदा और नारदा घोटाले में आया था - 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले शुभेंदु अधिकारी के बीजेपी में शामिल होने के बाद मुकुल रॉय का महत्व कम हो गया था, फिर तृणमूल कांग्रेस में लौट जाने का फैसला किया - और अच्छी बात यह रही कि ममता बनर्जी ने भी मुकुल रॉय को हाथों हाथ लिया. 71 साल की उम्र में मुकुल रॉय का कोलकाता में निधन हो गया. मुकुल रॉय के बेटे शुभ्रांशु रॉय टीएमसी के विधायक हैं.  

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बंगाल की राजनीति में मुकुल रॉय का रोल

1998 में तृणमूल कांग्रेस का गठन हुआ था. और, मुकुल रॉय ने भी ममता बनर्जी के बराबर ही भूमिका निभाई थी. कहते हैं, ममता बनर्जी अगर तृणमूल कांग्रेस का चेहरा बनीं, तो मुकुल रॉय पर्दे के पीछे ऐसे ऑलराउंडर थे जो संगठन को संभालने से लेकर मौका आने पर संकटमोचक के रोल में भी आ जाते थे. कोलकाता से दिल्ली तक - लेकिन ये सब मुकुल रॉय के बीजेपी में शामिल होने से पहले की बातें हैं.  

बीजेपी ने भी मुकुल रॉय को उनकी संगठन क्षमता में महारत के कारण ही साथ लिया था. कहते हैं वो हर ब्लॉक में कार्यकर्ताओं को जानते थे. 2011 में 34 साल के लेफ्ट शासन को खत्म कर ममता बनर्जी के सरकार बनाने में मुकुल रॉय की सबसे बड़ी भूमिका थी. और, बाद में भी वह टीएमसी को लगातार मजबूत करते रहे. मुकुल रॉय ने बड़ी संख्या में लेफ्ट और कांग्रेस नेताओं को तृणमूल कांग्रेस में शामिल कराया था. 

तृणमूल कांग्रेस छोड़ने से पहले हमेशा ही ममता बनर्जी के बाद नंबर 2 नेता माने जाने वाले मुकुल रॉय 2006 में राज्यसभा पहुंचे और धीरे धीरे दिल्ली में टीएमसी के मजबूत चेहरे के रूप में उभरे. 2009 से 2012 तक राज्यसभा में टीएमसी के नेता रहे, और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए-2 सरकार में मंत्री बन गए थे - मुकुल रॉय के राजनीतिक किस्सों में रेल मंत्रालय में उनका कार्यकाल खासतौर पर चर्चित रहा. 

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रेल मंत्रालय में मुकुल रॉय का कार्यकाल

यूपीए 2 सरकार में मुकुल रॉय को जहाजरानी राज्य मंत्री बनाया गया था, लेकिन पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बन जाने के बाद जब ममता बनर्जी ने रेल मंत्रालय छोड़ दिया, तो राज्य मंत्री के रूप में मुकुल रॉय को एंट्री मिली. ममता बनर्जी के बाद रेल मंत्रालय कुछ दिनों तक प्रधानमंत्री के पास था. 

11 जुलाई, 2011 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुकुल रॉय को असम में गुवाहाटी-पुरी एक्सप्रेस के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद घटनास्थल पर जाने का आदेश दिया, लेकिन मुकुल रॉय नहीं गए. कोलकाता में मीडिया के सवाल पर मुकुल रॉय का कहना था, ‘मैं तो बस तीन राज्यमंत्रियों में से एक हूं. प्रधानमंत्री ही रेल मंत्री भी हैं.’ मुकुल रॉय ने बताया कि वह हादसे में घायल यात्रियों और उनके परिजनों से मिल रहे हैं, जो हावड़ा पहुंच रहे हैं.

मुकुल रॉय के व्यवहार पर काफी विवाद हुआ, और अगले मंत्रिमंडल फेरबदल में उनको रेल मंत्रालय से हटा दिया गया. ममता बनर्जी के बाद उन दिनों मुकुल रॉय को ही रेल मंत्री बनाए जाने की चर्चा थी, लेकिन प्रधानमंत्री के हुक्म की तामील न होने के कारण टीएमसी कोटे से दिनेश त्रिवेदी को रेल मंत्री बनाया गया. 

2012 के रेल बजट में किराया बढ़ाए जाने से दिनेश त्रिवेदी से ममता बनर्जी खफा हो गईं, और मंत्री पद से उनका इस्तीफा ले लिया. तत्काल प्रभाव से मुकुल रॉय को दिनेश त्रिवेदी की जगह रेल मंत्री बनाया गया, और मुकुल रॉय ने वही किया जो ममता बनर्जी चाहती थीं. बढ़ा हुआ किराया वापस ले लिया. बवाल तो मचा लेकिन हुआ कुछ नहीं, गठबंधन की सरकार जो थी. बाद में ममता बनर्जी के सरकार से सपोर्ट वापस लेने के साथ ही, मुकुल रॉय की भी सितंबर, 2012 में मंत्रालय से विदाई हो गई. 

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बतौर बीजेपी नेता मुकुल रॉय

नवंबर, 2017 में टीएमसी छोड़कर मुकुल रॉय भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे, लेकिन 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद शुभेंदु अधिकारी के बढ़ते प्रभाव के चलते नाउम्मीद होकर घर वापसी भी कर ली थी. मतलब, मुकुल रॉय शुरू से आखिर तक तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी के साथ बने रहे.

अपना नाम शारदा चिटफंड घोटाले और नारदा स्टिंग ऑपरेशन से जुड़ जाने के बाद मुकुल रॉय विवादों में, और बीजेपी में शामिल होने के बाद बोले, 'कानून अपना काम करेगा'. तब शारदा चिट फंड घोटाले में सीबीआई ने उनसे पूछताछ भी की थी, और नारदा स्टिंग कांड में उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई है. स्टिंग ऑपरेशन में तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसदों को कैमरे पर कैश लेते दिखाया गया था.

बीजेपी ने मुकुल रॉय को शामिल तो किया, लेकिन एक निश्चित दूरी बनाते हुए. बीजेपी के तत्कालीन पश्चिम बंगाल प्रभारी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने रवि शंकर प्रसाद स्वपन दासगुप्ता की मौजूदगी में मुकुल रॉय को बीजेपी में शामिल कराया था, अमित शाह ने मंच शेयर नहीं किया. 

2019 के आम चुनाव से पहले मुकुल रॉय ने कैलाश विजयवर्गीय के साथ मिलकर जमीनी स्तर पर खूब मेहनत की, अपनी संगठन क्षमता और मजबूत नेटवर्क का पूरा इस्तेमाल किया - और ममता बनर्जी से छीनकर 40 में से 18 लोकसभा सीटें बीजेपी की झोली में भी डाल दी. 

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बताते हैं, कैलाश विजयवर्गीय ने आलाकमान से मुकुल रॉय को रिवॉर्ड के रूप में बीजेपी में कोई बड़ा पद देने की सिफारिश भी की थी. मुकुल रॉय केंद्र सरकार में शामिल होना चाहते थे, अपने मन की बात जाहिर भी की थी. लेकिन, बताते हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुकुल रॉय पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से ऐसी चीजों को मंजूरी नहीं दी. सितंबर, 2020 में अध्यक्ष बनने पर जब जेपी नड्डा ने अपनी टीम बनाई, तो मुकुल रॉय को बीजेपी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जरूर बनाया था. 

मुकुल रॉय की घर वापसी

2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले मुकुल रॉय की ही तरह ममता बनर्जी के एक और करीबी और भरोसेमंद नेता रहे शुभेंदु अधिकारी भी बीजेपी में शामिल हो गए. शुभेंदु अधिकारी बीजेपी को बंगाल में सत्ता तो नहीं दिला पाए, लेकिन ललकाते हुए नंदीग्राम से चुनाव लड़ने को मजबूर कर दिया, और शिकस्त भी दे डाली. 

अपना विधानसभा चुनाव तो मुकुल रॉय भी जीते थे, लेकिन शुभेंदु अधिकारी को बीजेपी में ज्यादा महत्व मिलने लगा. रॉय परिवार के मुश्किल दिनों में ममता बनर्जी ने कभी हाथ नहीं खींचा. संपर्क और संवाद बढ़ने के साथ ही घर वापसी पर भी चर्चा बढ़ी, और ममता बनर्जी ने भी मुकुल रॉय को निराश नहीं किया. 

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नवंबर, 2025 में, कलकत्ता हाई कोर्ट ने मुकुल रॉय को एंटी-डिफेक्शन लॉ के तहत मुकुल रॉय को विधानसभा की सदस्यता के अयोग्य करार दिया. मुकुल रॉय बीजेपी छोड़कर तृणमूल कांग्रेस के तो हो गए, लेकिन विधानसभा की सदस्यता जाती रही.

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