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कट्टर हिंदुत्व से दूर हो रही है BJP या केवल दिखावा है, इन 4 संकेतों का अर्थ समझिये

बीजेपी को पता चल गया है कि अगर पार्टी को पैन इंडियन पार्टी बनाना है तो उसे अपने कट्टर हिंदुत्व की छवि से छुटकारा पाना होगा. पश्चिम बंगाल , नॉर्थ ईस्ट और सबसे बढ़कर दक्षिण भारत में विशेषकर केरल और तमिलनाडु में उत्तर भारत की स्टाइल में कट्टरता से चिपके रहकर कभी कामयाबी नहीं हासिल नहीं की जा सकती.

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बीजेपी क्या हिंदुत्व को लेकर सॉफ्ट हो रही है
बीजेपी क्या हिंदुत्व को लेकर सॉफ्ट हो रही है

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास रहा है कि पार्टियां समय - काल और परिस्थितियों के हिसाब से अपने विचार और रणनीति बदलती रही हैं. 2024 लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी के टिकट बंटवारे, चुनावी कैंपेन और बड़े नेताओं की स्पीच को देखें तो ऐसा लग रहा है कि बीजेपी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है. बंगाल विधानसभा चुनाव, दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान जिस तरीके से बीजेपी ने हिंदुत्व का कार्ड खेलकर पोलराइजेशन की कोशिश की थी उस तरह का माहौल शायद इस बार देखने को न मिले. क्योंकि इन दोनों विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद मध्य प्रदेश-राजस्थान और छत्तीसगढ़ चुनावों में मिली जीत से शायद बीजेपी को लग रहा है कि कट्टरता की बजाय मध्यमार्गी होने में ज्यादा फायदा है.आइये पिछले 2 हफ्ते की घटनाओं का विश्वेषण करते हैं कि किस तरह बीजेपी अपने को सॉफ्ट दिखाने की कोशिश कर रही है.या बीजेपी का यह केवल दिखावा है?

1-तीन मजबूत उम्मीदवारों प्रवेश वर्मा, विधूड़ी और प्रज्ञा सिंह का टिकट काटना

इन तीनों नेताओं पर मुस्लिम समाज को लेकर ऐसा बयान देने के आरोप रहा है जिससे कि पीएम मोदी के नारे सबका साथ सबका विकास पर बट्टा लगता रहा है. शायद यही वजह है कि बीजेपी ने इस बार इनका पत्ता साफ कर एक कड़ा संदेश दिया है. बीजेपी ने भोपाल से साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का टिकट काटकर आलोक शर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया है. 2008 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में आरोपी रहीं ठाकुर को लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाने मात्र पर बवाल हो गया था. यही नहीं सांसद बन जाने के बाद भी उनके बड़बोलेपन के चलते कई बार पीएम और बीजेपी को शर्मिंदा होना पड़ा था.सबसे ज्यादा विवाद तब पैदा हुआ जब उन्होंने नाथूराम गोडसे को लेकर विवादित बयान दे दिया था.

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स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था कि गांधीजी या नाथूराम गोडसे के बारे में की गई टिप्पणी बहुत खराब है. मैं उन्हें कभी मन से माफ नहीं करूंगा. प्रवेश वर्मा भी अपने भड़काऊ भाषण के कारण चर्चा में रहे है. प्रवेश वर्मा ने 2020 के दिल्ली चुनावों से पहले दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में हो रहे विरोध के विरोध में कहा था कि अगर बीजेपी की दिल्ली में सरकार बन गई तो प्रदर्शनकारियों को एक घंटे में साफ कर दिया जाएगा. 2022 में एक बार फिर प्रवेश वर्मा ने अपने भाषण के दौरान कहा था कि आप उन्हें जहां भी देखें, यदि आप उनका दिमाग ठीक करना चाहते हैं, यदि आप उन्हें सीधा करना चाहते हैं, तो एकमात्र इलाज उनका पूर्ण बहिष्कार है. यदि आप सहमत हैं तो अपना हाथ उठाएं.

तीसरे सांसद हैं रमेश बिधूड़ी ने लोकसभा में एक चर्चा के दौरान अमरोहा के बीएसपी सांसद दानिश अली के लिए बहुत खराब शब्दों का इस्तेमाल किया था. बाद में बिधूड़ी ने इसके लिए ऑन रिकॉर्ड माफी मांगी. लेकिन बीजेपी की पहली सूची में जगह नहीं मिलने से साफ पता चलता है कि पार्टी को लगता है कि इन मजबूत प्रत्याशियों को टिकट देने से भी अधिक जरूरी अपनी छवि सुधारना है. ताकि जनता के बीच संदेश जाए कि पार्टी सबके बारे में सोचती है , पार्टी का उद्देश्य येन केन प्रकाणेन केवल चुनाव जीतना नहीं है.

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2- क्यों ऐसा कर रही है बीजेपी

बीजेपी को पता चल गया है कि अगर पार्टी को पैन इंडियन पार्टी बनाना है तो उसे अपने कट्टर हिंदुत्व की छवि से छुटकारा पाना होगा. पश्चिमी उत्तर प्रदेश , पश्चिम बंगाल , नॉर्थ ईस्ट और सबसे बढ़कर दक्षिण भारत में विशेषकर केरल और तमिलनाडु में उत्तर भारत की स्टाइल में कट्टरता से चिपके रहकर कभी फतह नहीं किया जा सकता.देश में इसके पहले अगर तिलक-तराजू और तलवार इनको मारो जूते चोर कहने वाली बहुजन समाज पार्टी ने अपनी नीतियों को बदलकर ब्राह्णणों का हाथ पकड़कर लिया और 2007 में उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बना ली थी. जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है. शायद यही सोचकर बीजेपी अपनी रणनीति बदल रही है. पीएम नरेंद्र मोदी लगातार पसमांदा मुसलमानों को साथ जोड़ने और उनके उत्थान की बात करते रहै हैं.पिछले दिनों संभवतया केरल फतह को ही ध्यान में रखते हुए मोदी लगातार चर्च और पादरियों से मुलाकात करते रहे है. त्रिपुरा की विजय के बाद पार्टी को ऐसा लगता है कि कट्टर हिंदुत्व का टोन कुछ डाउन करने पर केरल विजय का रास्ता हो सकता है.

3-पिछले कुछ चुनावों की तरह इस बार वोटरों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश नहीं

बीजेपी पिछले 2 विधानसभाओं में वोटर्स के ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर के देख चुकी है. पश्चिम बंगाल और दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान जिस तरह हिंदू वोटों के पोलराइजेशन का प्रयास किया गया था उसकी बहुत आलोचना हुई थी. फिर बाद में इन दोंनों राज्यों में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी. दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों का खुलकर समर्थन कर रही कांग्रेस के चलते जबरदस्त पोलराइजेशन हुआ. हिंदू वोटर्स बीजेपी की ओर मुस्लिम वोटर्स बंट गए थे. पहले मुस्लिम वोटर्स कांग्रेस को वोट देने का मन बना चुके थे पर बीजेपी और आप के बीच तीखी बयानबाजी से माहौल ऐसा बना कि आम आदमी पार्टी का फायदा हो गया.यही हाल पश्चिम बंगाल में हुआ बीजेपी ने सीएए से लेकर तमाम हिंदुओं के मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनाया पर जनता ने टीएमसी को विजयी बना दिया. पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं कि बीजेपी को अगर पूरे देश की पार्टी बनना है तो मुस्लिम समुदाय को अनावश्यक टार्गेट करने वालों के खिलाफ कड़े संदेश देने ही होंगे.शायद यही कारण है कि संदेशखाली जैसे मुद्दे को भी बीजेपी ने सांप्रादायिक रूप नहीं दिया है.

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4-यूसीसी और सीएए पर भी शांति

पिछले कुछ  महीनों से ऐसा लग रहा था कि बस बहुत जल्दी ही यूसीसी और सीएए  को कानून का दर्जा दिया जाएगा.उत्तराखंड सरकार ने अभी हाल ही में यूसीसी पर एक कानून बनाने के लिए दिन रात एक कर दिया था. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी की सरकार ने जिस तेजी को देखकर लग रहा था कि बस अब बहुत जल्दी केंद्र सरकार भी संसद में पेश कर सकती है. सीएए को लेकर भी पश्चिम बंगाल में गृहमंत्री अमिश शाह के बयान के बाद ऐसा वग रहा था कि सीएएस बहुत जल्दी लागू कर दिया जाएगा.पर अब लगता है कि सरकार ने अपने इन दोनों कानूनों से अपना कुछ दिनों के लिए पल्ला झाड़ लिया है.
 

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