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FCRA 2.0... विदेशी फंडिंग पर शिकंजा, 'विषैले’ NGOs पर सर्जिकल स्ट्राइक

भारत में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और उनके पास आने वाली विदेशी फंडिंग को लेकर मोदी सरकार साल दर साल सख्त होती गई है. केंद्र सरकार ने फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट यानी FCRA के रूल्स बहुत सख्त कर दिए हैं, जिसे अब 'FCRA 2.0' कहा जा रहा है.

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मोदी सरकार देश में NGOs को मिलने वाले फॉरेन फंड का दुरुपयोग करने के लिए जरूरी कानूनी संशोधन ला रही है.
मोदी सरकार देश में NGOs को मिलने वाले फॉरेन फंड का दुरुपयोग करने के लिए जरूरी कानूनी संशोधन ला रही है.

सवाल उठ सकता है कि समाजसेवा, पढ़ाई और भलाई का काम करने का दावा करने वाले संगठनों और NGOs पर सरकार इतनी सख्त क्यों हो गई है? इंटेलिजेंस एजेंसियों के इनपुट, सरकारी आंकड़ों और दुनिया भर के हालात को देखें, तो साफ होता है कि फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट यानी FCRA में किए गए बदलाव सिर्फ कागजी कार्रवाई नहीं है, बल्कि देश की सिक्योरिटी, इकोनॉमी और सुरक्षा को मजबूत करने के लिए उठाया गया बड़ा फैसला है. जो संसद के मानसून सत्र में संबंधित विधेयक पास होने के बाद लागू हो जाएगा.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2012 में जब सरकार ने फॉरेन फंडिंग का लेखा जोखा रखना शुरू किया, 52,159 संस्थाओं ने रजिस्ट्रेशन करवाया. लेकिन, आज इनमें से सिर्फ 14,455 के पास ही एक्टिव FCRA लाइसेंस है. इन्हें हर साल लगभग ₹22,000 करोड़ का विदेशी फंड मिलता है. अकेले 2019-20 से 2021-22 के बीच 13,500 से ज्यादा संस्थाओं को ₹55,700 करोड़ से अधिक की फॉरेन फंडिंग मिली.

इस बड़े फंड का इस्तेमाल सिर्फ पढ़ाई, इलाज और मदद के लिए ही नहीं हुआ, बल्कि पर्यावरण के नाम पर प्रोटेस्ट करने, मीडिया नैरेटिव सेट करने, पॉलिसी रिसर्च और आंदोलनों का बखेड़ा खड़ा करने में भी किया गया. जब किसी देश में हजारों करोड़ रुपये का विदेशी पैसा आ रहा हो, तो कोई भी देश इसे बिना जांच-पड़ताल के नहीं छोड़ सकता.

FCRA पर सख्त एक्शन के 4 बड़े कारणः

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1. इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में रुकावटः

इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) जैसी सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में बार-बार बताया कि भारत के कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को रोकने के लिए विदेशी पैसे का इस्तेमाल किया गया. तमिलनाडु के कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट से लेकर कई पावर प्रोजेक्ट्स के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों में विदेशी फंडिंग के सबूत मिले. तमिलनाडु के थूथुकुडी (स्टेरलाइट) कॉपर प्रोजेक्ट को बंद कराने और माइनिंग इलाकों में लोगों को भड़काने के पीछे कुछ फॉरेन-फंडेड NGOs का हाथ पाया गया. डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स को कोर्ट-कचहरी और प्रोटेस्ट में फंसाने से भारत की जीडीपी (GDP) ग्रोथ को हर साल 2 से 3 परसेंट का सीधा नुकसान हो रहा था.

2. 'ग्रांट' बना 21वीं सदी का नया हथियारः

आजकल की जंग सिर्फ टैंकों, मिसाइलों या फाइटर जेट्स से नहीं लड़ी जाती. आज की लड़ाई यूनिवर्सिटी, मीडिया, थिंक टैंक, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, एनवायरनमेंट कैंपेन और सोशल मूवमेंट्स के जरिए लड़ी जाती है. इस खेल में बंदूक की गोली की जगह 'विदेशी ग्रांट' को हथियार बनाया जाता है, ताकि देश के अंदर ही अशांति फैलाई जा सके.

3. फॉरेन फंडिंग से धर्मांतरण का खेलः

गृह मंत्रालय को मिले इनपुट्स के मुताबिक, देश के दूर-दराज और पिछड़े इलाकों में कई संस्थाएं 'राहत और सोशल वर्क' के नाम पर फॉरेन फंड ला रही थीं. जांच में सामने आया कि इस पैसे का बड़ा हिस्सा जबरन धर्मांतरण कराने और पर्सनल फायदे के लिए इस्तेमाल हो रहा था.

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4. विदेशों में भारत की इमेज बिगाड़नाः

विदेशों से मिलने वाले पैसे के दम पर कुछ संस्थाएं भारत के अंदरूनी मामलों को ग्लोबल लेवल पर गलत तरीके से पेश कर रही थीं. भारत में मानवाधिकार (ह्यूमन राइट्स), लोकतंत्र या एनवायरनमेंट क्राइसिस का झूठा नैरेटिव बनाकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की इमेज को खराब करने की कोशिशें की जा रही थीं. इनमें एम्नेस्टी इंटरनेशनल इंडिया और CPR (सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च) जैसी संस्थाओं का नाम सामने आया.

दुनिया भर के देश क्यों रखते हैं फॉरेन फंडिंग पर कड़ी नजर?

अमेरिका में 'फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट' (FARA) के तहत विदेशी पैसे और प्रभाव पर बहुत सख्त नजर रखी जाती है. ऑस्ट्रेलिया ने 2018 में 'फॉरेन इन्फ्लुएंस ट्रांसपेरेंसी स्कीम एक्ट' लागू किया. चीन में विदेशी NGOs के लिए दुनिया के सबसे कड़े नियम हैं, जबकि यूरोपीय देश भी विदेशी पैसों से चलने वाले सोशल और पॉलिटिकल नेटवर्क्स पर लगातार नकेल कस रहे हैं.

NGOs के काम में ट्रांसपेरेंसी लाने और पैसों की हेराफेरी रोकने के लिए सरकार ने ये बड़े बदलाव किए हैं:

1. रजिस्ट्रेशन रिन्यू नहीं होने पर भी प्रॉपर्टी होगी जब्त:

पुराने कानून में प्रॉपर्टी तभी जब्त होती थी जब रजिस्ट्रेशन कैंसिल होता था या खुद सरेंडर किया जाता था. नए बिल का सबसे अहम नियम यह है कि अगर किसी NGO का FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द होता है, एक्सपायर होता है, या वे खुद इसे रिन्यू नहीं कराते हैं, तो विदेशी पैसे से बनाई गई उनकी प्रॉपर्टीज (जैसे स्कूल, हॉस्पिटल, जमीन, दफ्तर आदि) का कंट्रोल सरकार द्वारा बनाई गई 'डेजिग्नेटेड अथॉरिटी' (Designated Authority) के पास चला जाएगा. सरकार उन प्रॉपर्टीज को सेंट्रल या स्टेट गवर्नमेंट के विभागों को सौंप सकती है या नीलाम कर सकती है. नीलामी का सारा पैसा देश के खजाने में जमा होगा.

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2. मिक्स-फंड वाली प्रॉपर्टीज पर भी असर:

अगर किसी प्रॉपर्टी को बनाने में विदेशी और भारतीय (डोमेस्टिक) दोनों फंड्स का इस्तेमाल हुआ है, तब भी पूरी प्रॉपर्टी अथॉरिटी के पास ही जाएगी. भारतीय पैसे वाले हिस्से का दावा संगठन को अलग से साबित करना होगा.

3. अकाउंट और फंड मैनेजमेंट के नियम सख्तः

सिर्फ SBI के प्राइमरी खाते से ही लेन-देन होगा. पहले के नियमों में एक बड़ा NGO विदेशी पैसा लेकर उसे छोटे-छोटे लोकल NGOs को ट्रांसफर (Sub-grant) कर देता था. इससे पैसे का असली सोर्स और उसका इस्तेमाल कहां हो रहा है, यह पता लगाना मुश्किल हो जाता था. अब नए नियमों के तहत FCRA फंड को किसी दूसरे NGO या व्यक्ति को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता.

4. खर्चों पर भी सख्तीः

पहले NGOs विदेशी फंड का 50% तक हिस्सा अपने ऑफिस के खर्च, अफसरों की सैलरी और ट्रैवलिंग (Administrative Expenses) पर उड़ा देते थे. या फिर कागजों में प्रशासनिक खर्च दिखाकर उसका दुरुपयोग करते थे. सरकार ने इसे घटाकर अधिकतम 20% कर दिया है, ताकि कम से कम 80% पैसा सीधे उस काम पर लगे जिसके लिए फंड आया है.

5. मुख्य अधिकारियों की जिम्मेदारी तय:

NGO चलाने वाले सभी मेन मेंबर्स, डायरेक्टर्स और ट्रस्टियों के लिए आधार की डिटेल्स देना अनिवार्य कर दिया गया है (विदेशी नागरिकों के लिए पासपोर्ट या OCI कार्ड आवश्यक है). इनके लिए यह भी जरूरी रहेगा कि अगर NGO बंद होता है, तो इसकी सूचना सरकार को दें. ऐसा न करने पर फॉरेन-फंडेड एसेट्स को हमेशा के लिए जब्त कर लिया जाएगा.

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6. सजा के नियम में बदलाव:

नियमों के उल्लंघन की जांच शुरू करने से पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय की इजाजत जरूरी होगी. हालांकि, जेल की अधिकतम सजा को 5 साल से घटाकर 1 साल किया गया है, लेकिन जुर्माना बरकरार रहेगा.

नए बदलाव से NGOs को क्यों आ रहा है पसीना?

1. फंडिंग बंद करने के बाद भी एसेट खोने का डर: अगर किसी NGO ने सालों पहले फॉरेन फंड से कोई हॉस्पिटल बनाया था और अब वह सिर्फ भारतीय चंदे पर चल रहा है, तो भी FCRA लाइसेंस रिन्यू न कराने पर उसका हॉस्पिटल जब्त हो सकता है.

2. निकलने (Exit) का रास्ता नहीं: NGOs के पास FCRA सिस्टम से बाहर निकलने का प्रैक्टिकल ऑप्शन नहीं बचा है, क्योंकि बाहर निकलते ही उन्हें अपनी पुरानी प्रॉपर्टीज से हाथ धोना पड़ सकता है.

3. अपील का मौका नहीं: बिल में रजिस्ट्रेशन रिन्यू न होने या रिजेक्ट होने के खिलाफ कोर्ट में जाने का कोई अलग से अपीलीय तंत्र नहीं रखा गया है, जिससे NGOs चिंतित हैं.

FCRA में हुए इन बदलावों से एक बात साफ है कि सरकार ईमानदारी से काम करने वाले और समाज की भलाई में लगे NGOs के खिलाफ नहीं है. लेकिन 'सोशल वर्क' के नाम पर देश के डेवलपमेंट को रोकने, अशांति फैलाने या नेशनल सिक्योरिटी से खिलवाड़ करने वाले फॉरेन नेटवर्क्स के लिए अब भारत में सारे रास्ते बंद हो चुके हैं.

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भारत ने दुनिया को साफ मैसेज दे दिया है कि वह ट्रेड, फ्रेंडशिप और चैरिटी के लिए पूरी तरह खुला है, लेकिन देश की सिक्योरिटी और आजादी के साथ कोई समझौता नहीं होगा.

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