बिहार में बीजेपी का महाराष्ट्र मॉडल लागू किए जाने की चुनावों के पहले से ही काफी चर्चा थी. चुनाव के ठीक बाद तो नहीं, लेकिन अब तो करीब करीब लागू होने ही वाली है. महाराष्ट्र की तरह बिहार में भी बीजेपी को अपना मुख्यमंत्री लाने में सिर्फ नीतीश कुमार के इस्तीफे का इंतजार है. राज्यसभा तो नीतीश कुमार जा ही चुके थे, विधान परिषद की सदस्यता भी छोड़ दी है.
जैसे जेडीयू बिहार में बीजेपी की गठबंधन पार्टनर है, महाराष्ट्र में अजित पवार की एनसीपी भी महायुति सरकार में वैसी ही हिस्सेदार है. प्लेन क्रैश में अजित पवार की मौत के बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार को महाराष्ट्र का डिप्टी सीएम बना दिया गया, और वैसे ही बिहार में नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को भी डिप्टी सीएम बनाए जाने की बात है.
जेडीयू के अध्यक्ष तो अभी नीतीश कुमार ही हैं, लेकिन एनसीपी की कमान सुनेत्रा पवार पूरी तरह अपने हाथ में ले चुकी हैं. हफ्ता भर पहले नीतीश कुमार निर्विरोध जेडीयू के अध्यक्ष चुन लिए गए थे, और महीना भर पहले सुनेत्रा पवार को भी एनसीपी नेताओं ने वैसे ही कमान सौंप दी थी.
यह संयोग ही है कि जेडीयू और एनसीपी दोनों की कॉमन सहयोगी बीजेपी है, और उससे भी बड़ा संयोग है कि दोनों ही पार्टियों की स्थिति डावांडोल भी एक जैसी ही है. सुनेत्रा पवार अध्यक्ष जरूर बन गई हैं, लेकिन राजनीति में नौसिखिया हैं. बेहद अनुभवी होने के बावजूद नीतीश कुमार की सेहत ठीक नहीं होने, और आने वाले दिनों में बिहार छूट जाने के बाद जेडीयू की स्थिति भी एनसीपी जैसी होने की संभावना जताई जा रही है - बड़ा सवाल यह है कि जेडीयू और एनसीपी दोनों ही दलों में फैसले कौन ले रहा है?
सियासत में सिर्फ चेहरे से काम नहीं चलता
देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में भी एक बार सवाल उठा था कि फैसले कौन ले रहा है? यह तब की बात है, जब कांग्रेस के पास कोई पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं था. 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद राहुल गांधी ने इस्तीफा दे दिया था, और फिर सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनना पड़ा था. मल्लिकार्जुन खड़गे के अध्यक्ष बनने से पहले उठाए गए इस सवाल के जवाब में सोनिया गांधी ने कहा था कि बतौर अध्यक्ष वही सारे फैसले लेती हैं. सोनिया गांधी के बयान देने से पहले चर्चा यही थी कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ही सारे फैसले लेते हैं.
अजित पवार न रहने के बाद एनसीपी के सामने एक चेहरा सामने करने की चुनौती थी. तभी यह पार्टी के दोनों गुटों के एक होने की भी जोरदार चर्चा थी. सुनने में आया तारीख भी तय थी. लेकिन, फिर आनन फानन में सुनेत्रा पवार को डिप्टी सीएम और उसके बाद एनसीपी का अध्यक्ष बना दिया गया - और इस काम में एनसीपी के कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल और महाराष्ट्र अध्यक्ष सुनील तटकरे की प्रमुख भूमिका मानी गई.
जेडीयू में भी निशांत कुमार को पार्टी की सदस्यता दिला दी गई है. ताउम्र परिवारवाद की राजनीति के खिलाफ रहे नीतीश कुमार के बेटे को ही अब जेडीयू का चेहरा बनाने की कोशिश है. बिहार में नई सरकार बनी तो निशांत कुमार भी सुनेत्रा पवार की तरह डिप्टी सीएम बन जाएंगे. लेकिन, दोनों ही नेताओं की भूमिका अपने अपने राजनीतिक दलों के चेहरे से ज्यादा कहां तक मानी जा सकती है. राजनीति की बारीकियां सीखने में वक्त लगता है. जहां तक राजनीतिक अनुभव की बात है, अगर एक जैसा नहीं तो सुनेत्रा पवार और निशांत कुमार दोनों का हाल मिलता जुलता ही है.
निशांत कुमार और सुनेत्रा पवार दोनों जेडीयू और एनसीपी के नए चेहरे के तौर पर स्थापित किए जा रहे हैं, लेकिन सियासत में सिर्फ चेहरे से काम कहां चलता है - चेहरा जरूरी तो होता है, लेकिन सब कुछ नहीं होता.
सुनेत्रा पवार और निशांत कुमार को एनसीपी और जेडीयू के नए चेहरे के तौर पर देखा भी जाने लगा है, लेकिन दोनों तरफ से सीनियर नेताओं का ग्रुप उनका इस्तेमाल तो मास्क जैसा ही करते लग रहे हैं. जेडीयू और एनसीपी, दोनों दलों में ऐसे नेता हैं जिनके सामने अपने अस्तित्व का सवाल पैदा हो गया है, और वे अपनी जरूरत और बीजेपी से मिली मंजूरी के हिसाब से हर काम को अंजाम दे रहे हैं.
जेडीयू का ट्रांसफॉर्मेशन
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले पर उनके बेटे निशांत कुमार की जो प्रतिक्रिया थी, उनके विधान परिषद से इस्तीफे पर भी करीब करीब वही है. जेडीयू नेता निशांत कुमार ने कहा, यह पिताजी का फैसला है, और वह इसका स्वागत करते हैं… जनता का स्नेह जिस तरह अब तक पिताजी पर बना रहा, वैसा ही आगे भी उन पर और उनकी पार्टी पर बना रहे, बस यही उनकी कामना है.
1. खबर आई थी कि करीब एक साल से निशांत कुमार की ट्रेनिंग चल रही है. बिहार की राजनीति के लिए निशांत कुमार के लिए सलाहकारों और सहयोगियों की एक टीम बनाई गई है, जिसमें ज्यादातर निशांत के करीबी और नीतीश कुमार के भरोसेमंद लोग शामिल हैं.
2. जेडीयू की कमान तो नीतीश कुमार ने अपने हाथ में ही रखी है. लेकिन जेडीयू का सारा कामकाज संजय झा, ललन सिंह और विजय चौधरी जैसे नेता देख रहे हैं. ललन सिंह और संजय झा को जेडीयू से ज्यादा बीजेपी का करीबी माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे एक जमाने में सुशील मोदी को बीजेपी से ज्यादा नीतीश कुमार के साथी के तौर पर देखा जाता था.
3. केंद्रीय मंत्री ललन सिंह तो मोदी-शाह के कैबिनेट सहयोगी ही हैं, संजय झा भी बीजेपी में रह चुके हैं. ऐसे में विजय चौधरी ही नीतीश कुमार के एकमात्र भरोसेमंद नेता बचते हैं. अब उनकी सूझ बूझ और काबिलियत पर निर्भर करता है कि वह जेडीयू को बीजेपी के प्रभाव से बचाकर नीतीश कुमार की तरह कहां तक अलग रख पाते हैं.
निशांत कुमार को राजनीति में लाए जाने की बात हो, या बिहार सरकार में कुछ नियुक्तियों की बात हो. और तो और जेडीयू नेताओं को भी नहीं लग रहा है कि ये सब नीतीश कुमार के लिए हुए फैसले हैं. बिहार के आयोगों में भरे गए पदों को लेकर जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने हैरानी जाहिर की थी. मीडिया से बातचीत में नीरज कुमार ने कहा था, आयोग में जिन चेहरों को लाया गया है, मुझे नहीं लगता कि ये मुख्यमंत्री की पसंद होगी.
पूरी तरह यकीन तो लोगों को राज्यसभा के लिए नामांकन से पहले सोशल मीडिया पर आई पोस्ट पर भी नहीं हो रहा था. ड्राफ्ट की भाषा भी नीतीश कुमार के मिजाज से मेल नहीं खा रही थी. विधान परिषद से नीतीश कुमार के इस्तीफे की भाषा तो और भी अजीब लगती है.
विधान परिषद की सदस्यता से अपने त्यागपत्र में नीतीश कुमार ने लिखा है, 'मैं इसके द्वारा 30 मार्च 2026 से सदन से अपने स्थान का त्यागपत्र देता हूं.'
नीतीश कुमार ने अभी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया है. माना जा रहा है कि अभी उसमें 10 दिन का वक्त लग सकता है - देखना है, उस इस्तीफे का मजमून क्या होता है?
NCP का हाल बता रहा है सुनेत्रा का पत्र
कमान जरूर बदल गई है, और औपचारिक रूप भी ले चुकी है. लेकिन एनसीपी में चल क्या रहा है, सुनेत्रा पवार के एक पत्र से साफ मालूम होता है. चुनाव आयोग को लिखा सुनेत्रा पवार का एक पत्र बता रहा है कि अजित पवार के जाने के बाद एनसीपी में जिस तरह से कुछ सीनियर नेता एक्टिव हुए हैं, उनको ठीक नहीं लगा है.
1. 27 मार्च को रायगड़ में जिला परिषद और पंचायत समिति के नए सदस्यों के सम्मान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था. कार्यक्रम के मंच पर जो बैनर लगा था उसमें सुनील तटकरे, अदिति तटकरे और उनके भाई अनिकेत तटकरे की तो तस्वीर लगी थी, लेकिन सुनेत्रा पवार और अजित पवार दोनों में से किसी की फोटो नदारद थी.
अदिति तटकरे महाराष्ट्र सरकार में मंत्री हैं, और NCP के महाराष्ट्र अध्यक्ष सुनील तटकरे उनके पिता है. बवाल बढ़ने पर अदिति तटकरे ने बयान जारी कर अजित पवार और सुनेत्रा पवार की तस्वीर बैनर में नहीं होने के लिए माफी मांगी. अदिति तटकरे ने कहा, दोनों उनके दिल में हमेशा खास जगह रखते हैं.
2. अजित पवार की प्लेन क्रैश में मौत के बाद पवार परिवार साथ देखा गया. ऐसा लगा कि अजित पवार की इच्छा के मुताबिक एनसीपी के दोनों गुटों का विलय भी हो जाएगा. शरद पवार ने एक मीटिंग भी बुलाई थी, लेकिन उसमें सुनेत्रा पवार या उनके बेटे पार्थ कोई भी शामिल नहीं हुआ. बल्कि, सुनेत्रा पवार बारामती से सीधे मुंबई चली गई थीं, और उनके डिप्टी सीएम पद की शपथ लेने की खबर आई थी.
मौके की नजाकत को भांपते हुए शरद पवार ने प्रेस कांफ्रेंस बुलाई और कहा था, 'मुझे कोई जानकारी नहीं है. ये फैसला उनकी पार्टी ने ही लिया होगा, क्योंकि कुछ नाम सामने आ रहे हैं... जैसे प्रफुल पटेल और सुनील तटकरे, संभव है इन्हीं लोगों ने ये तय किया हो. पार्टी के स्तर पर कोई आंतरिक निर्णय लिया गया होगा.'
उसी दौरान एनसीपी नेताओं के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात की भी खबरें आई थीं. शरद पवार ने तो नाम लेकर ही अपनी तरफ से समझा दिया कि एनसीपी में फैसले कौन ले रहा है - और अब तो चुनाव आयोग को लिखा सुनेत्रा पवार का पत्र भी बहुत कुछ इशारे कर रहा है.
3. एनसीपी अध्यक्ष और महाराष्ट्र की डिप्टी सीएम सुनेत्रा पवार ने चुनाव आयोग को एक पत्र लिखकर 28 जनवरी के बाद के सभी पत्राचार को अमान्य मानने को कहा है. ध्यान रहे, 28 जनवरी को ही महाराष्ट्र के बारामती में प्लेन क्रैश हुआ था, जिसमें अजित पवार की मौत हो गई थी.
असल में, सुनेत्रा पवार ने चुनाव आयोग को एनसीपी की 26 फरवरी की उस बैठक की औपचारिक सूचना दी है, जिसमें उनको पार्टी का अध्यक्ष घोषित किया गया था. और उसी पत्र के आखिर में लिखती हैं, 'यह भी अनुरोध किया जाता है कि 28 जनवरी, 2026 से लेकर इस पत्र के जारी होने की तिथि से पहले तक किसी भी व्यक्ति द्वारा पार्टी की ओर से की गई किसी भी तरह का पत्राचार को अमान्य मानते हुए सभी आधिकारिक उद्देश्यों के लिए उसे नजरअंदाज किया जाए.' सुनेत्रा पवार के इस पत्र पर तारीख लिखी है, 10 मार्च, 2026.
सुनेत्रा पवार का पत्र तो यही बता रहा है कि शरद पवार ने प्रेस कांफ्रेंस में जो इशारा किया था, सही था. और, अब सुनेत्रा पवार भी अपने ही नेताओं की सक्रियता से खुश नहीं हैं. सुनेत्रा पवार पत्र में उसी अवधि की बात कर रही हैं, जब प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे हद से ज्यादा सक्रिय थे, और फैसले भी ले रहे थे.
सवाल तो सुनेत्रा पवार के मन में भी होगा, एनसीपी के सीनियर नेता जो फैसले ले रहे थे, वे निजी स्तर पर थे, आम सहमति थी या फिर किसी बाहरी दबाव में - मुद्दे की यह बात है कि जेडीयू का भी अभी करीब करीब वैसा ही लगता है.