scorecardresearch
 

केजरीवाल के सामने पंजाब में राघव चड्ढा एपिसोड के साइड इफेक्ट का खतरा

पंजाब में आम आदमी पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी, और संगठनात्मक खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है. नेतृत्व और विधायकों या कार्यकर्ताओं के बीच संवाद की कमी भारी पड़ रही है. ये सब राघव चड्ढा और संदीप पाठक के AAP छोड़कर बीजेपी में चले जाने के बाद बढ़ गया है.

Advertisement
X
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल. (Photo: PTI)
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल. (Photo: PTI)

अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के विधायकों को याद दिलाया है कि पंजाब विधानसभा चुनाव में महज 10 महीने बचे हैं. मतलब, कम वक्त में ज्यादा काम करना है. मतलब, नई जंग में पूरी तैयारी के साथ कूद पड़ना है. मतलब, बचे हुए वक्त में सारे ही चुनावी वादे पूरे करने की कोशिश है. 

चुनावी वादों के हिसाब से देखें तो दिल्ली में कुछ अधूर वादे रह गए थे. 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले ही अरविंद केजरीवाल ने कई चुनावी वादों पर काम करना शुरू किया था. 2025 के दिल्ली चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल ने यह भी माना था कि दिल्ली में तीन काम उनसे अधूरे रहे गए. एक, यमुना की सफाई. दो, साफ हवा (प्रदूषण नियंत्रण) और तीन, दिल्ली की सभी कॉलोनियों में साफ पानी (पाइपलाइन) पहुंचाना.

असल में राघव चड्ढा एपिसोड और पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजे, अरविंद केजरीवाल को नए सिरे से परेशान करने लगे हैं. दिल्ली की हार के दर्द से अभी पूरी तरह राहत भी नहीं मिली थी कि राघव चड्ढा ने नया दर्द दे दिया, और पश्चिम बंगाल के नतीजे तो लगता है कुछ ज्यादा ही असर डाल रहे हैं. 

Advertisement

पंजाब के AAP विधायकों से मुलाकात में अरविंद केजरीवाल ने टीएमसी नेता ममता बनर्जी और दिल्ली चुनाव में अपनी हार को मिलता जुलता करार दिया है. और, अब पंजाब को लेकर भी केजरीवाल को बंगाल जैसी ही आशंका सता रही है, लिहाजा आम आदमी पार्टी के विधायकों को अभी से अलर्ट मोड में डाल दिया है - विधायकों की मुश्किल यह है कि उनकी कोई सुनने वाला नहीं है, बस जबरन खामोश कर दिया जाता है.  

राघव चड्ढा एपिसोड के आगे क्या है?

राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा सहित 7 सांसदों ने हाल ही में आम आदमी पार्टी से बगावत किया, और भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. बाद में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिले, और बीजेपी में शामिल होने वाले सभी सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की. बीजेपी में शामिल होने वाले 6 राज्यसभा सांसद पंजाब चुने गए थे. 

बात सिर्फ राघव चड्ढा और साथियों के अरविंद केजरीवाल की बनाई लक्ष्मण रेखा लांघने की नहीं है, उसके आगे खतरे और भी हैं जो आम आदमी पार्टी को भारी पड़ सकते हैं. और, जरूरी नहीं कि नुकसान आने वाले पंजाब चुनाव में ही नुकसान हो, पहले भी संभव है. राघव चड्ढा प्रकरण के बाद से ही पंजाब में सरकार गिरने और सूबे के विधायकों की तरफ से वैसे ही कदम उठाए जाने की आशंका जताई जा रही थी. राघव चड्ढा ने भी आम आदमी पार्टी के कई विधायकों के उनके संपर्क में होने का संकेत दिया था. 

Advertisement

इंडियन एक्सप्रेस ने आम आदमी पार्टी के विधायकों से बातचीत के आधार पर एक रिपोर्ट फाइल की है. बातचीत में विधायकों ने आम आदमी पार्टी के अंदर पड़ी दरार और कलह के बारे में विस्तार से बताया है. साथ ही, विधायकों के सामने चुनौतियों और उनकी समस्याओं का भी पता चला है. ध्यान देने वाली बात यह है कि विधायकों के अनुसार ज्यादातर समस्याएं राघव चड्ढा और संदीप पाठक के आम आदमी पार्टी छोड़ देने के बाद पैदा हुई हैं. 

1. आम आदमी पार्टी के एक विधायक ने संवादहीनता की तरफ इशारा किया. विधायक का कहना था, हमारे पास अपनी बात रखने के लिए कोई मंच नहीं है. हमें चुप रहने को कहा जाता है. लीडरशिप को जमीन पर क्या हो रहा है, उसकी पूरी जानकारी नहीं है.

2. कई विधायकों का कहना है कि लीडरशिप तक अपनी बात पहुंचाना मुश्किल है. लीडरशिप तक सीमित पहुंच के कारण, पार्टी वालंटियर्स में असंतोष बढ़ा है. विधायकों की शिकायत है कि आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने के फौरन बाद ही निराशा का दौर शुरू हो गया था, क्योंकि वालंटियर्स को तभी से किनारे कर दिया गया.

3. विधायकों का मानना है कि 7 में से सिर्फ दो सांसद ही संगठन की पृष्ठभूमि के थे, राघव चड्ढा और संदीप पाठक. विधायकों का सवाल है, बाकियों को क्यों चुना गया? और शिकायत है, सरकार बनने के बाद हुए उपचुनावों में भी जमीनी कार्यकर्ताओं के बजाय दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को टिकट दिया गया.

Advertisement

4. विधायकों की मानें तो राज्यसभा सदस्यों के बाद लोकसभा सांसदों पर भी वैसा ही खतरा मंडरा रहा है. आम आदमी पार्टी के लोकसभा में तीन सांसद हैं. मालविंदर सिंह कंग, राज कुमार चब्बेवाल और गुरमीत सिंह मीत.

एक विधायक का कहना है, हमें अपने लोकसभा सांसदों पर नजर बनाए रखनी होगी... उन्हें भी तोड़ने की कोशिश हो सकती है.

विधायकों की बातचीत से मालूम होता है कि ऊपर से जो कुछ लग रहा है, आम आदमी पार्टी पर खतरा कहीं ज्यादा है. क्योंकि, राघव चड्ढा और संदीप पाठक का पंजाब में पूरे संगठन पर अच्छा खासा प्रभाव था. और, यह बात पंजाब में नेताओं को शुरू से ही महसूस होती रही है.

आपको याद होगा, राघव चड्ढा को काफी दिनों तक पंजाब का सुपर सीएम कहा जाता था. हालांकि, दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार के बाद अरविंद केजरीवाल के पंजाब में डेरा जमा देने पर यह तमगा उनको मिल गया है. 

एक विधायक के अनुसार, पंजाब की सत्ता में आने के बाद अटकलें यहां तक थीं कि अरविंद केजरीवाल आगे चलकर राघव चड्ढा को मुख्यमंत्री भी बना सकते हैं. क्योंकि तब विधायक भी फैसलों के लिए, यहां तक कि तबादलों के लिए राघव चड्ढा के पास ही जाते थे. 

Advertisement

2022 के चुनाव से पहले संदीप पाठक प्रभारी के तौर पर संगठन संभाल रहे थे, और रणनीति तैयार करते थे. उम्मीदवार फाइनल करने और टिकट बांटने में राघव चड्ढा की बड़ी भूमिका होती थी. राघव चड्ढा के प्रभाव को एक विधायक ने उदाहरण देकर समझाया, चुनाव से पहले अक्सर ऐसा होता था कि जिस उम्मीदवार के साथ वह दिख जाते थे, उसका टिकट अगले दिन घोषित हो जाता था.

सिसोदिया तो पंजाब संभालने गए थे

मालूम होता है कि पंजाब में असंतोष मनीष सिसोदिया के प्रभारी बन जाने के बाद बढ़ा है. संदीप पाठक के एक सहयोगी का कहना है कि पंजाब प्रभारी के पद से उनको हटाया जाना मुसीबत की जड़ था. सहयोगी ने बताया है कि संदीप पाठक को भरोसे में नहीं लिया गया. दिल्ली में हार के बाद मनीष सिसोदिया को पंजाब लाया गया, और पंजाब में काफी काम कर चुके संदीप पाठक को अचानक हटा दिया गया. 

1. दिल्ली चुनाव के नतीजे आने के कुछ दिन बाद ही अरविंद केजरीवाल विपश्यना के लिए पंजाब गए थे, और वहीं जम गए. असल में, अरविंद केजरीवाल ने तभी से लुधियाना वेस्ट उपचुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी. चुनाव जीतने के लिए अरविंद केजरीवाल को अपने सबसे भरोसेमंद और करीबी मनीष सिसोदिया की भी जरूरत थी. अरविंद केजरीवाल उपचुनाव तो जीत गए, लेकिन बड़ा नुकसान भी कर डाला.

Advertisement

2. अरविंद केजरीवाल ने अपने पुराने सहयोगी बिभव कुमार को पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान का सलाहकार बना दिया था. बिभव कुमार को पंजाब भेजने की एक बड़ी वजह यह भी थी कि राघव चड्ढा काफी दिनों से सीन से गायब चल रहे थे. बल्कि अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के वक्त से ही. बाद के दिनों में भी खामोशी ही अख्तियार किए रहते थे. अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को दिल्ली की विशेष अदालत से डिस्चार्ज किए जाने तक. 

दिल्ली की हार के बाद अरविंद केजरीवाल को पंजाब की चिंता सताने लगी थी, और मनीष सिसोदिया को पंजाब का प्रभारी बनाए जाने की एक वजह यह भी थी. हां, उनको एडजस्ट भी तो करना था. यही बात संदीप पाठक को बुरी लगी, और राघव चड्ढा ने उनके मनमाफिक सपना दिखा दिया. अरविंद केजरीवाल हाथ मलते रह गए.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement