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'डीजे और लाउड म्यूजिक की जरूरत...', कांवड़ यात्रा पर क्या बोले कथावाचक प्रदीप मिश्रा

उज्जैन में आयोजित 'आजतक धर्म संसद' के विशेष सत्र में कथावाचक प्रदीप मिश्रा ने कांवड़ यात्रा की सच्ची भावना पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा का मूल भगवान शिव की भक्ति और श्रद्धा है, न कि डीजे या दिखावा.

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आजतक धर्म संसद के मंच पर पहुंचे कथावाचक प्रदीप मिश्रा
आजतक धर्म संसद के मंच पर पहुंचे कथावाचक प्रदीप मिश्रा

महाकाल की नगरी उज्जैन में आयोजित 'आजतक धर्म संसद' के विशेष सत्र 'सत्यम शिवम सुंदरम्' में प्रसिद्ध कथावाचक प्रदीप मिश्रा ने हिस्सा लिया. शुक्रवार को इस आयोजन के मंच पर उन्होंने कांवड़ यात्रा, शिव भक्ति और आस्था के बदलते स्वरूप पर अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा का मूल भाव भगवान शिव का स्मरण और श्रद्धा है, न कि डीजे, शोर-शराबा या दिखावा. उन्होंने जोर देकर कहा कि सच्चा कांवड़िया केवल गंगाजल नहीं, बल्कि अपने जीवन का बेहतर कल लेकर चलता है. साथ ही उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा में आडंबर की नहीं, बल्कि भक्ति, अनुशासन और भाव की जरूरत है.

डीजे की कोई जरूरत ही नहीं- कथावाचक प्रदीप मिश्रा

कथावाचक प्रदीप मिश्रा ने कांवड़ यात्रा में डीजे और तेज आवाज वाले म्यूजिक को लेकर कहा कि, जब कांवड़ यात्री चलता है तो उसे डीजे या बहुत तेज़ ध्वनि की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि उसके भीतर की ध्वनि ही इतनी प्रबल होती है. लेकिन आज के समय में एक फैशन बन गया है कि बहुत तेज़ आवाज़ में डीजे बजाना है. यह बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है. उन्होंने कहा कि, हमारे सीहोर में कांवड़ यात्रा निकल रही है. प्रशासन ने अनुमति देते समय स्पष्ट कहा कि कांवड़ यात्रा में डीजे नहीं निकलेगा. हमारी समिति ने भी निर्णय लिया कि डीजे नहीं होगा. यात्रा भजनों के साथ निकलेगी, भगवान के स्मरण के साथ निकलेगी.

दिखावा बन गई है कांवड यात्रा

आज लोगों ने कांवड़ यात्रा को भी दिखावे का माध्यम बना दिया है. कहते हैं कि कांवड़ भरने के लिए अलग कपड़े सिलवाने पड़ेंगे, अलग टी-शर्ट बनवानी पड़ेगी, इसके लिए इतना पैसा जमा करना पड़ेगा, फिर पूरी व्यवस्था करनी पड़ेगी. उन्होंने कहा - अरे भाई! 'बोल बम" बोलो और महाकाल के हो लो. जब समय मिले, धीरे-धीरे बाबा का नाम लेते हुए चलते जाओ. यह ज़रूरी नहीं कि इतने आडंबर करके ही कांवड़ यात्रा की जाए.'

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कांवड़ यात्रा और आम जनता की परेशानी से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि, 'मूल रूप से कांवड़ यात्रियों के लिए हर राज्य के प्रशासन ने अलग मार्ग बनाए हैं. चाहे मध्य प्रदेश सरकार हो, उत्तर प्रदेश सरकार, झारखंड सरकार या बिहार सरकार—सभी ने कांवड़ यात्रियों के लिए अलग रास्ते निर्धारित किए हैं. हमारे सीहोर में भी अलग कांवड़ मार्ग बनाया गया है. हम तो यही कहेंगे कि जैसे उज्जैन के रहने वाले प्रतिदिन महाकाल के दर्शन कर सकते हैं, उन्हें कोई रोकता नहीं. लेकिन जो भक्त बहुत दूर से पैदल चलकर आ रहा है, उसे रास्ता देना चाहिए, उसका सम्मान करना चाहिए.'

जहां तक लोगों की टिप्पणियों का सवाल है, यह तो दुनिया की रीति है. फिर उन्होंने एक कथा सुनाई- बोले- भोले बाबा जब नंदी पर माता पार्वती को बैठाकर जा रहे थे, तब भी लोगों ने टिप्पणी कर दी कि देखो, बेचारे नंदी पर दोनों भारी-भरकम बैठे हैं. तब शिवजी ने कहा, 'एक काम करते हैं, पार्वती तुम बैठो, मैं नीचे उतर जाता हूं.' शिवजी पैदल चलने लगे तो लोगों ने कहा, 'देखो, कैसा जोरू का गुलाम है, पत्नी को बैठाकर खुद पैदल चल रहा है.'

फिर शिवजी बैठ गए और माता पार्वती पैदल चलने लगीं. लोगों ने कहा, 'देखो, कितनी कोमल नारी को पैदल चला रहे हैं और खुद ऊपर बैठे हैं.' आखिर में दोनों ही नीचे उतर गए और नंदी अकेला चलने लगा. तब भी लोगों ने कहा, 'इतना अच्छा नंदी है, दोनों बैठकर क्यों नहीं चले जाते?' यानी दुनिया तो कुछ न कुछ कहती ही रहेगी. लोगों को कब तक समझाएंगे कि कांवड़ का महत्व क्या है, कांवड़ क्यों भरी जाती है और उसका वास्तविक अर्थ क्या है?

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'कांवड़िया जल नहीं आने वाला कल लेकर जा रहा है'

लोग समझते हैं कि कांवड़िया केवल जल लेकर जा रहा है. लेकिन सत्य यह है कि जब कांवड़िया चलता है तो उसके साथ स्वयं महाकाल चलते हैं, स्वयं भगवान शिव चलते हैं. लोग कहते हैं कि कांवड़िया जल लेकर जा रहा है. मैं कहता हूं, वह अपना आने वाला कल लेकर जा रहा है. और जब वह जल महाकाल पर चढ़ता है तो महाकाल अच्छे-अच्छों का कालचक्र बदल देते हैं. इसलिए वह केवल जल नहीं होता. एक लोटा जल सारी समस्याओं का हल होता है.

उन्होंने कहा- कांवड़ का जल साधारण नहीं, मस्ती का जल होता है. आपने कभी कांवड़ उठाई है? अवसर मिले तो अवश्य उठाइए. यदि यहां कोई कांवड़ लेकर आया होता तो हम आपके कंधे पर रख देते. जैसे ही कांवड़ कंधे पर रखी जाती है, उसका डंडा अपने आप झूमने लगता है और मुख से 'बोल बम... बोल बम...' निकलने लगता है. तब ऐसा अनुभव होता है मानो स्वयं महाकाल पूरी अवंतिका पुरी में मस्ती के साथ झूमते हुए चल रहे हों.
 

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