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कहानी : प्रेमचंद की सीक्रेट डायरी | STORYBOX WITH JAMSHED

मुंशी प्रेमचंद की मौत के 90 साल बाद एक शख्स को मिली उनकी लिखी हुई एक डायरी. क्या था उस डायरी में जिसके बाद इलाके में मच गया हड़कंप, और कौन था वो ज़िला कलेक्टर जिसने हर कीमत पर उसे आम जनता से छिपाए रखने की कोशिश की? सुनिए जमशेद क़मर सिद्दीक़ी की लिखी कहानी 'प्रेमचंद की सीक्रेट डायरी' स्टोरीबॉक्स में.

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कहानी - प्रेमचंद की सीक्रेट डायरी
राइटर - जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

 

जून की उमस भरी दोपहर थी... चौराहे पर सख्त घूप आग बन कर बरस रही थी। बड़े चौराहे के किनारे बने हुए टैंपो स्टैंड पर बहुत सारे ऑटो रिक्शा सवारियां भर रहे थे। ऐसे ही एक शेयर्ड ऑटो में बाकी सवारियों के साथ बैठा था शेखर... शेखर की उम्र सैंतीस के आस-पास थी, नज़र का मोटा चश्मा, खिचड़ी दाढ़ी... वो बस स्टाप जा रहा था जहां से उसे चंदसर गांव की बस पकड़नी थी। शेखर सीट के सबसे किनारे बैठा, अपने झोले को संभाले... सड़क पर आते-जाते लोगों को देख रहा था.... कि तभी एक लड़का गुज़रा और लोगों को एक गुलाबी रंग का पम्पलेट पकड़ाता चला गया... किसी विज्ञापन का पर्चा था... शेखर ने देखा उस पम्पफेल पर कहानियों के सम्राट कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद की तस्वीर थी...  और नीचे लिखा था - प्रेमचंद जयंती पर विशाल समारोह ... नीचे लिखा था बताया गया था कि आने वाली इकत्तीस जुलाई को मुंशी प्रेमचंद की सालगिरह के मौके पर गांधी पार्क में ज़िला कलेक्टर साहब प्रेमचंद की बड़ी सी मूर्ति का अनावरण करेंगे।

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शेखर, यूं तो एक NGO में काम करता था जिसका काम दूर दराज़ के बेहद पिछड़े इलाको में पीने का पानी मयस्सर करने के लिए कोशिश करना था। उसी सिलसिले में वो चंदसर गांव जा रहा था... एक रिपोर्ट बनाने, उसकी टीम वहां पहले से थी।

ये नौकरी शेखर को पसंद थी... क्योंकि वो हमेशा से गरीबों की, मज़लूमों की, हाशिये पर खड़े लोगों की मदद करना चाहता था... लेकिन ये काम उसका पहला प्यार नहीं था... उसका पहला प्यार था... राइटिंग... वो किताबें लिखना चाहता था... कहानियां लिखना चाहता था.... उसने लिखी भी थीं... लेकिन जिस तरह की किताब उसने लिखी थी... कोई भी पब्लिशर उसे छापने को तैयार नहीं होता था। पिछले साल जब वो अपनी एक स्क्रिप्ट लेकर पब्लिशक के पास गया था... तो पब्लिशर ने कहा,

आप बहुत कड़वा लिखते हैं... लोगों को प्यार-मुहब्बत की कहानियां चाहिए... कौन जानना चाहता है कि दूर दराज़ के किसी गांव में पानी की लोगों के पास पीने को पानी नही है, या किसी को क्या फर्क पड़ता है कि फलां गांव में लोगों को चार किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाना पड़ता है... ये सब कोई नहीं पढ़ता... लीजिए... और जाइये कुछ और लिख कर लाइये.. कुछ ऐसा जो बिक सके... हम भी यहां बिज़नेस करने को बैठे हैं, समाजसेवा तो कर नहीं रहे”
 

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अचानक एक लगे ब्रेक से शेखर का ध्यान टूटा... उसने देखा तो बस स्टाप आ गया था। कुछ देर बाद वो एक बेहद जर्जर और टूटी फूटी बस की उधड़ी हुई सीट पर बैठा था। ये बस चंदसर गांव जा रही थी जो आबादी से कुछ तीन सौ किलोमीटर दूर था। यहां उसे एनजीओ के लिए रिपोर्ट बनानी

थी...खिड़की वाली सीट पर बैठा शेखर गुज़रते हुई सड़क को देख रहा था... कि तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी। मेघा कॉलिंग लिखा था।
हां मेघा, ... हां ऑफ़िस के काम से जा रहा हूं, बताया था ना चंदसर गांव.. हां अभी रास्ते में हूं”  पुणे की एक कंपनी में काम करने वाली मेघा शेखर से मुहब्बत करती थी... लेकिन वो दिल से चाहती थी कि शेखर कुछ बेहतर करे ताकि वो जल्दी कुछ बन सके... क्योंकि तभी उनकी शादी का रास्ता खुल सकता था। अभी जो जो शेखऱ कर रहा था, और जितनी उसकी तनख्वाह थी... मेघा अपने घर पर उसके बारे में बता भी नहीं सकती थी।

 हालांकि शेखर हर बार की तरह उसे कहता कि वो कोशिश कर रहा है... लेकिन जैसे ही उसकी नज़र गरीब, मज़लूमों और बुनियादी सुविधाओं से वंचित लोगों पर पड़ती थी... वो सब भूल जाता था।

 ख़ैर, आठ घंटे का सफ़र करके एक सुनसान चौराहे पर उतरा, वहां से एक पगडंडी पर तीन मील पैदल चलने के बाद एक बैलगाड़ी मिली और फिर वो एक ऐसे बीहड़ गांव में पहुंचा जहां बिजली के खंबे भी अबतक नहीं लगे थे... यही था चंदसर गांव। आबादी से कटा हुआ, यहां रहने वालों के लिए नल से गिरता हुआ पानी किसी ख़्वाब जैसा था। गांव से कई मील दूर एक तालाब से पानी लाने के लिए सर पर घड़ा रखकर कतार से जाती औरतों को शेखर ग़ौर से देखता रहा। कैमरे से कुछ तस्वीरें खींची। तेज़ धूप में कई गांव वालों से बात की, जानकारियां जुटाईं... दिनभर काम के बाद.. शाम को जब हल्का अंधेरा होने लगा... शेखर की नज़र वहां झोपड़े पर पड़ी। उसे एक गिलास पानी चाहिए था... गला सूख रहा था... बोसीदा सा लटकता हुआ छप्पर.. दिवार पर बने ताक पर ज़ंग खाया चिराग उंग रहा था... किसी ख़ानदान के आखिरी बुज़ुर्ग की तरह।

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कोई है, सुनिए... शेखर ने आवाज़ दी... तो अंदर से एक आहट के बाद आहिस्ता-आहिस्ता खांसता हुआ एक बुज़ुर्ग बाहर आया। नंगी पीठ, मैली सी धोती बांधे वो शख्स बोला, कौन आय

 
मैं.. मैं शेखर हूं... आप के इलाके में पीने के पानी के हालात पर एक रिपोर्ट... आ.. मतलब हम लोग उस पर काम कर रहे हैं।

बुज़ुर्ग ने तिरछा मुस्कुराहते हुआ कहा, जाओ.. बबुआ जाओ... कछु नहीं होत इस सब से... सैकड़न लोग आए और चले गए... ई गांव के नसीब में नलके नहीं न...
 

“ऐसा मत कहिए देखिए... मैं एनजीओ से हूं”... शेखर ने अपने बारे में बताया। थोड़ी देर बाद वो बुज़ुर्ग बातचीत के लिए मान गया। मिटटी से पुते एक कमरे में जहां जीने के सामान के तौर पर एक खाट, एक संदूक और कुछ टूटे-फूटे बर्तन थे। वहां बैठ कर शेखर ने उस बुज़ुर्ग से एक गिलास पानी मांगा... बुज़ुर्ग थोड़ी देर में एक ग्लास में पानी लेकर आया... वो पानी इतना मटमैला था... कि शेखर उसे पी नहीं सका...

“आप लोग यही पानी पीते हैं”
“हां भैय्या... यही पीते हैं... गंदा लग रहा होगा... अब तालाब का पानी है... ऐसा होता है...”

शेखर ने गिलास किनारे रख दिया... उसकी आंखों में आंसू उतर आए... बुज़ुर्ग बोला.... “भैय्या, वो जब चुनाव वाली गाड़ी आती है तो नेता लोग भोंपू से कहते हैं कि अबकी यहां नल आ जाएंगे... पर कुछ नहीं बदलता... तीस-पैंतीस साल से तो हमीं देख रहे हैं... अब तो लगता है इस गांव के नसीबमें यही मटमैला पैमी हैं”

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 शेखर ने सूखे गले से कुछ गटका... और झोले से कागज़ निकालकर कुछ लिखने लगा... उसी दौरान उसके झोले से वो पैंपलेट सरक कर फर्श पर गिरा जो उसे आटो में बैठे वक्त लड़के ने दिया था... जिस पर प्रेमचंद जयंती के बारे में लिखा था...

 ये... ये वहीं हैं न.. प्रेमचंद? बुज़ुर्ग ने पैमफ्लैट उठाते हुए पूछा। शेखर मुस्कुराया.
जी... आप जानते हैं इन्हें? वो बोले, “हां.. बाउजी बतावत रहें... कि ये उनके दोस्त रहें...

-    अच्छा...  जी... शेखर ने कहा और बात मुद्दे की तरफ घुमाते हुए कहा, तो... ये बताइये कि क्या इस पानी से आस पास के गांवो में कुछ लोगों की मौत भी हुई है.. कुछ नंबर बता सकते हैं कि कितने लोगों की मौत हुई होगी?

कोई जवाब नहीं आया... शेखर ने सर उठाकर देखा तो बुज़ुर्ग अब भी वही पंफ्लेट देख रहा था। “हम बहुत छोट रहें उस वक्त... तब ये रहें... ये आपन कछु सामान भूल गए रहें... बाउजी रखें रहें बहुत समय तक... फिर उनके बाद हमने रख लिया... ”
- क्या बात कर रहे हैं... 
शेखर मुस्कुराया...

-    दिखाएं? 

-    हां दिखाइये...

बुज़ुर्ग उठा और अंदर वाले कमरे में जाकर देर तक अलमारी, पुराने बक्से खोलता बंद करता रहा... थोड़ी देर के बाद... एक मैली सी पोटली लेकर आया। “ये देखोयही आय...”
 

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 शेखर ने पोटली खोली, तो देखा कि उसमें कुछ कागज़ थे जो तकरीबन गल गए थे... कुछ खत थे और कुछ रसीदें।
“हमाए तो किसी काम के नहीं हैं ये, तुम ही रख लो” कहते हुए बुज़ुर्ग एक किनारे हो गया। लेकिन शेखर की आंखे हैरानी से फैल गयीं। उसमें एक सादे कागज़ों को एक तरफ से जोड़कर बनाई गयी एक डायरी सी थी... जिसमें उन्होंने ऊपर तारीख लिखी थी... सिंतबर 1936... यानि उनकी मौत से पहले... और फिर पन्नों पर लिखा था.. प्रेमचंद के हाथों से लिखी हुई कुछ पक्तियां थीं... जो शायद उन्होंने वैसे ही लिखा होगा... जैसे राइटर्स अक्सर लिखते हैं... कि अगली कहानी में इसे इस्तेमाल करूंगा।

शेखर के हाथ कांप रहे थे... ये प्रेमचंद की वो लिखावट है जिसे दुनिया में अबतक किसी ने नहीं पढ़ा... उनकी मौत के इतने सालों बाद अब और कीमती हो गयी है.... शेखर की आंखे हैरानी से फैल गयीं। उसके दिमाग में न जाने क्या आया पैफ्लेट उठाते हुए बोला

- “ये कागज़... ये आप...मुझे दे सकते हैं... असल में 31 तारीख को एक कार्यक्रम हो रहा है... मैं सोचता हूं... कि आयोजकों से बात करूंगा और कार्यक्रम में ये पढ़कर सुनाऊंगा... आप का ज़िक्र भी करूंगा... ये तो बहुत कीमती चीज़ है... मैं इसे ले जाऊं

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“हां, लिये जाओ... हमाए किस काम की है” उसने मासूमियत से कहा

शेखर प्रेमचंद की वो डायरी लेकर अगले दिन वापस आ गया। इस एक दिन में उसके मन में हल्की लालच सी आ गयी थी... उसे लगने लगा था कि प्रेमचंद की मौत के 90 साल बाद जब वो इसे पढ़ेगा मंच से तो पूरे हिंदुस्तान में बल्कि दुनिया जहां जहां प्रेमचंद को पढ़ने वाले रहते हैं... हंगामा मच जाएगा...

शेखर ने उसने 31 जुलाई वाले कार्यक्रम में जहां उनकी बड़ी सी मूर्ति लगनी थी... उस कार्यक्रम के ऑरगनाइज़ अस्थाना साहब को फोन करके बताया... तो ज़ाहिर अस्थाना साहब भी चौंक गए... बोले, “कल दफ्तर आओ...बिल्कुल इसको शामिल करेंगे.. एक बार देख लेते हैं, कल आ जाओ... मैं कुछ और अधिकारियों को बुला लूंगा.. आओ फिर... कल मिलते हैं

 

शेखर अगली सुबह पहुंच गया। ऑर्गनाइज़र्स के दफ्तर के बाहर बड़े-बड़े लोगों की गाड़िया खड़ी थीं। हिंदी साहित्य संगम के अध्यक्ष, प्रेमचंद क्लब के चीफ़, साहित्य संस्थान के बड़े अधिकारी और न जाने कौन कौन। “आइये-आइये, शेखर जी” गोल गले का सूट पहने अस्थाना साहब ने शेखर के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा। “भई कमाल ही हो गया... आप ने जो ढूंढ निकाला है, उससे हमारा शहर दुनिया में मशहूर हो जाएगा, और जलसे में तो चार चांद लग ही जाएंगे। डायरी लाए हैं ना?”

शेखर को एक सभागार में ले जाया गया। उसे अच्छा लग रहा था क्योंकि ज़िंदगी में पहली बार इतनी अहमियत मिल रही थी। एक इतिहासकारों की टीम भी थी वहां जिन्हें अस्थाना साहब ने बुलाया था... इस टीम ने डायरी पर बने दस्तख्वत मिलाकर ये सुनिश्चित किया कि डायरी वाकई प्रेमचंद की है। अब सबके चेहरे पर उत्साह था।

चलिए पढ़िये भई, क्या लिखा है देखा जाए” सरकार के एक बड़े अधिकारी ने कहा, तो शेखर ने गला खंखार कर पढ़ना शुरु किया। ये कहानी नहीं थी, कहानी की आउटलाइनिंग थी... जिसमें उन्होंने लिखा था कि एक ज़िला था... जिसमें एक नया कलेक्टर आता है और वो वहां की जनता के लिए काम करने के बजाए अय्याशियों में डूब जाता है। ज़िले के लोग कैसे उसके जुल्म का शिकार होते हैं और बाद में इसे नियति मानकर उस ज़ुल्म के आदी हो जाते हैं। कुछ लोग उस कलेक्टर को भगवान मानने लगते हैं और उसकी पूजा होने लगती है... वो कलेक्टर भ्रष्ट है, लेकिन कोई उसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाता क्योंकि लोगों को लगता है कि ऐसा करने पर पाप पड़ेगा... – कुछ इसी तरह की कहानी थी।

 कहानी खत्म हुई तो लोगों के चेहरे से मुस्कुराहट धीरे-धीरे गायब हो गयी थी। चेहरों पर कुछ मायूसी थी। एक अधिकारी बोले, “चलिए, फिर जैसा होता है आपको बताते हैं” कह कर सब उठे और चले गए। शेखर को समझ नहीं आया। अस्थाना साहब ने इशारा किया कि वो फोन करके बात करेंगे... और वो भी बाहर जाते लोगों के पीछे भागे। शेखर को समझ नहीं आया... कि आखिर हुआ क्या...

 उसे जवाब अगली सुबह मिला जब अस्थाना साहब का फोन आया। बोले, 

-    देखिए शेखर बाबू... डायरी में जो लिखा है वो... असल में थोड़ा... निगेटिव है.. मतलब थोड़ी डायरेक्ट है...
- डायरेक्ट मतलब?
- मतलब ये कि .. देखिए... हमारे प्रोग्राम में चीफ़ गेस्ट कलेक्टर साहब होंगे और डायरी मं जो लिखा है उसमें कलेक्टर साहब के करप्शन के बारे में ही है.. तो ये थोड़ा अनकंफर्टेबल हो जाएगा.. यो नो
- तो यानि आप इस डायरी को नहीं शामिल करेंगे
- नहीं, नहीं ऐसा मैंने कब कहा... करेंगे.. लेकिन आपको हमारा साथ देना होगा...

-    क्या

-    बस ये कि कहानी को...मतलब थोड़ा सा ट्विस्ट कर देना है.. मतलब बीच के एक आध पन्ने गायब कर दीजिए और जब दूसरे पन्ने पर उतारिये तो अपनी तरफ से कुछ जोड़ दीजिए.. सिंपल

शेखऱ को बड़ी हैरानी हुई... उसने कहा कि अरे सर क्या बात कर रहे हैं... प्रेमचंद इतने बड़े राइटर और मैं... मैं उनका लिखा बदल दूं.. ये नहीं हो पाएगा सॉरी... कहकर उसने कॉल कट कर दी।
लेकिन शायद अस्थाना साहब मसले को इतनी आसानी से नहीं जाने देने वाले थे... वो शाम को ही

शेखर से मिलने उसके घर आ गए। साथ में हिंदी साहित्य संस्थान के कोई चेयरपर्सन भी थे। बोले,

देखिए शेखर बाबू, कहानी आपके हाथ लगी है... हक आपका है। हम आप पर कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं डाल रहे। लेकिन घुमा फिरा कर बात हम करते नहीं हैं। सीधी बात ये है कि कलेक्टर साहब मंत्री जी के खास हैं। हम चाहते हैं कि आप डायरी पढ़े लेकिन कहें कि इसे ढूंढने में साहित्य संस्थान ने आपकी पूरी मदद की... आप कहिए कि संस्था ने आपको सभी रिसोर्स दिये... और ये ऐसे ही नहीं मिल गयी... आप ने इसे सालों की मेहनत से ट्रैक किया... आप ने गांवों की खाक छानी, सैकड़ों लोगों से मिले... और हर कदम पर साहित्य संस्थान के अधिकारियों ने आपका साथ दिया... हर तरह से मदद की... तब जाकर ये डायरी मिल पाई है... इसके बाद आप डायरी मे लिखी बातों को थोड़ा बदल दें... और देखिए... इधर देखिए... अगर आप मान जाते हैं तो हम भी आपका ख्याल रखेंगे... साहित्य संस्थान में आपको सीनियर रिसर्चर के पद पर परमानेंट नियुक्ति दे सकते हैं।.... मोटी सैलरी, पेंशन, सरकारी घर... सब मिलेगा... ज़िंदगी आराम से कटेगी... सोच लीजिए और बताइयेगा।

 

देखिए साहब, ईमानदार बना रहना बहुत आसान होता है... जब तक आपको बेइमानी का मौका न मिले। एक छोटी सी उसूलों की बेइमानी से शेखर की ज़िंदगी से सारे मसले हल हो रहे थे। फैसला आसान नहीं था। और वैसे भी उसके उसूलों ने अब तक उसे दिया क्या था... मेघा से शादी नहीं हो पा रही थी, किताब छप नहीं रही थी, नौकरी में तनख्वाह चूरन बराबर थी... मुश्किल होता है ऐसे में अपने उसूलों पर डिगे रहना।

 

ख़ैर... वो दोनों तो जा चुके थे लेकिन शेखर के कानों में उनकी आवाज़ें देर तक गूंज रही थीं। आइने के सामने खड़े होकर उसने खुद को देखा... उम्र ढल रही थी। आंखों के नीचे की खाल ढीली पड़ने लगी थी। वो सोशल मीडिया अपने पुराने दोस्तों की तस्वीरें अक्सर देखता था... सब कहां से कहां पहुंच गए थे, कोई बढ़ी कंपनी में था, कोई विदेश में परिवार के साथ छुट्टी मना रहा था, कोई बिज़नेस ट्रिप पर था... और वो....उसे तो याद आ रहा था कि कि शहर वाले मकान में कई सालों से पुताई नहीं हुई है। ज़िंदगी एक मौका दे रही थी, जब सब कुछ बदला जा सकता था। शेखर ने फैसला कर लिया था।

 

अगले दिन उसने मेघा को फोन करके सब बताया... वो बोली, “तुम्हारा दिमाग ख़राब हो गया है। तुम प्रेमचंद की डायरी में फ्रॉड करोगे? ये गलत है
- और सही क्या है? 
शेखर ने उसकी बात काटी.. ये सही है कि ज़िंदगीभर बीहड़ गावों की खाक छानता रहूं? हां... क्रांति के नाम पर जिस समाज के लिए काम करता रहा, आज वो समाज मेरी नाकामयाबी पर हंसता है, चिढ़ाता है मुझे। तुम्हें पता है.. जब मैं उस ऑडिटोरयम में प्रेमचंद की डायरी पढ़ने गया तो बड़े-बड़े अफ़सर मेरा इंतज़ार कर रहे थे। शान थी.. मैंने दो पल में वो ज़िंदगी जी... जिसकी ख्वाहिश मुझे ज़मानों से थी। क्या फर्क पड़ेगा अगर बिना कुछ बदले डायरी सुना दी.. इस समाज में कुछ नहीं बदलना... जितना कुछ लिखा है.. क्या उससे कुछ बदला है?

-  और तुम्हारा ज़मीर? मेघा ने अचानक कहा तो शेखऱ रुक गया... फिर बोला...

-    एक शानदार नौकरी के बदले ज़मीर की नाराज़गी सह लूंगा मैं... उसने कहा और फोन काट दिया।

उसी रात... आठ-साव आठ का वक्त होगा...। शेखर ने कांपते हुए हाथों से वो पुलिदा उठाया और उस डायरी को पढ़ना शुरु किया। और फिर कहानी में बदलाव करना शुरु कर दिए। हाथ कांप रहे थे उसके, लेकिन वो नहीं रुका। और देर रात तक उसने कहानी से वो सब हटा लिया जो अस्थाना चाहते थे। कुर्सी पर बैठे-बैठे ही उसकी आंख लग गयी। रात करीब तीन साढ़े तीन बजे किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। शेखर ने पलट कर देखा तो वही ज़हानत भरी दो आंखे, घनी मूंछों वाला चेहरा.. कमरे में मुंशी प्रेमचंद खड़े थे।

एक औसत दर्जे का कोट, धोती और फटे हुए जूते उनके पैरों में थे। शेखर घबराकर पीछे हटा, प्रेमचंद मुस्कुराए। “घबराओ मत, मैं तो बस ये देखने आया था कि तुम मेरे नाम से जो कुछ लिख रहे हो, उसके साथ न्याय कर पा रहे हो या नहीं?”
 

-    मैं... मैं तो बस .. ये 

-    “कोई बात नहीं... हालात तुम्हारे हैं फैसला भी तुम्हारा होगा। पर ये बताना मेरा कर्तव्य है कि ये धोखा तुम्हारे पैरों के नीचे मखमली कालीन बिछा देगा, पर वो आराम नहीं दे पाएगा जो इन फटे जूतों में है” शेखऱ ने सर झुका लिया वो आगे बढ़े “दिखाओ ज़रा क्या लिखा है...” शेखर चीखा और अचानक उसकी आंख खुल गयी। कमरे में अकेला था। डायरी मेज़ के किनारे रखी थी। हाफंते हुए चेहरे से पसीना पोंछा। एक गिलास पानी के बाद... वो बालकनी पर गया और देर तक वहीं खड़ा सोचता रहा।

उसने बहुत सोचा... पाप-पुण्य, उसूल आदर्श, सच और झूठ के बारे में... लेकिन फिर उसने सोचा..

शेखर अगर प्रेमचंद की कहानी का किरदार होता तो इस कहानी का अंत सत्य की जीत पर होता। वो ठुकरा देता उन सूहूलतों को जो उसके ज़मीर का सौदा कर रही थीं... लेकिन ये प्रेमचंद की कहानी नहीं है। ये इस दौर की है जिसमें शेखर, हम और आप रहते हैं। शेखर ने फैसला कर लिया।

इकत्तीस जुलाई की दोपहर थी। गांधी पार्क में हज़ारों लोग मौजूद थे... सरकारी कार्यक्रम था। पीछे प्रेमचंद की बड़ी सी तस्वीर थी। और एक बड़ी सी मूर्ति कपड़े से ढकी हुई थी और मंच पर बड़े-बड़े अधिकारी, साहित्य की नामवर शखसियात, कलेक्टर साहब और मंत्रियों के साथ सोफे पर शेखर बैठा था। नीचे मीडिया के कैमरे चमक रहे थे। कुछ देर बाद मुंशी प्रेमचंद की मूर्ति पर से कपड़ा हटाया गया। गांधी पार्क तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज गया। मुंशी प्रेमचंद की तारीफ में कसीदे पढ़े गए और फिर शेखर को माइक पर बुलाया गया। वो बोला, “दोस्तों, ईमानदारी की बात तो ये है कि इस डायरी को खोजने का श्रेय मेरा नहीं, साहित्य संस्थान के चेयरपर्सन, अधिकारी गण और पूरे विभाग का है... मुजे तो बस पता था कि उनकी डायरी कहीं है... लेकिन उसे ढूंढने में बहुत विभाग मेरी मदद न करता.. आर्थिक तौर पर.. तो मैं ये कभी नहीं ढूंढ पाता... इसे पता चलता है कि विभाग अपनी साहित्यिक धरोहर के लिए कितना गंभीर है, और कितना प्रतिबद्ध है। अब मैं आपको डायरी में लिखी वो कहानी की रूपरेखा सुना रहा हूं जो प्रेमचंद की मौत के 90 साल बाद आज पहली बार पढ़ी जा रही है... इत्तिफाक दखिए कि सामने कलेक्टर साहब बैठे हैं, और इस कहानी में भी एक कलेक्टर है... उन्हीं की तरह अपने ज़िले के लोगों की सेवा करता है... चलिए शुरु करते हैं....” तालियों का शोर थमा तो शेखर ने डायरी पढ़नी शुरु की... स्टेज पर उसकी आवाज़ गूंज रही थी... और शेखर के ठीक पीछे लगी प्रेमचंद की मूर्ति मुस्कुराकर रही थी। और वहां से बहुत दूर एक गांव में .... एक बूढ़ा आदमी... अपनी झोपड़ी में बैठा गंदे पानी का कटोरा हाथ में लिए घूंट-घूंट पी रहा था....     

 

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