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हम अपने दुखों पर भी गर्व करते हैं, जो गलत है: जावेद अख्तर

जावेद अख्तर ने कहा कि लोग अपनी दौलत, कामयाबी पर कभी कभी घमंड करने लगते हैं. इसी तरह हम कभी कभी अपने दुखों और नाकामी पर भी घमंड करने लगते हैं. मेडल की तरह सीने पर लगा लेते है.

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जावेद अख्तर
जावेद अख्तर

लॉकडाउन के बीच आजतक की ओर से ई-साहित्य का आयोजन किया गया. इस दौरान कोरोना वॉरियर्स को सलाम करने के लिए मशहूर गीतकार जावेद अख्तर मौजूद थे. उन्होंने आजतक से बातचीत करते हुए अपने जीवन, लेखनी और बचपन के बारे में खूब बात की. इसी दौरान उन्होंने इस संकट की घड़ी में लोगों से हौसला बनाए रखने के लिए कहा. साथ ही अपने संघर्ष के दिनों के बारे में बात की.

संघर्ष को लोग आजकल मेडल की तरह सीने पर लगा लेते हैं
जावेद अख्तर ने कहा- 'लोग अपनी दौलत, कामयाबी पर कभी कभी घमंड करने लगते हैं. इसी तरह हम कभी कभी अपने दुखों और नाकामी पर भी घमंड करने लगते हैं. मेडल की तरह सीने पर लगा लेते है. वास्तव में वे ये नहीं बता रहे होते कि मैंने कितना संघर्ष किया, क्या क्या देखा, दरअसल वे ये बता रहे होते हैं कि देखो मैं कहां से कहां आ गया.'

'मुझे भी दिक्कतें हुईं पर ये सबको होती है'

जावेद अख्तर बोले, 'मुझे इस टॉपिक पर बात करने में थोड़ी दिक्कत होती है. ये सच है कि मुंबई में मैं पांच साल किसी तरह बचा रहा. बस-ट्रेन से एक्सीडेंट नहीं हुआ, मुझे कैंसर जैसी दिक्ततें नहीं हुई. पर दिक्कतें मैंने भी झेली हैं. रात को कहां सोना है नहीं मालूम, एक दिन नहीं कई दिन ऐसा होता रहा. नाश्ता तो मेन्यू से निकल ही गया था. वर्षों तक ऐसा हाल रहा.'

आगे कहा, 'पर इस पर मैं इतराउं ये ठीक नहीं. इस पर फैज की बहुत अच्छी लाइन है- 'इस राह में जो सब पर गुजरती है वो गुजरेगी'. मेरे जैसे न जाने कितने लोग ऐसे हैं जो इससे गुजरे हैं और गुजर रहे हैं. सिर्फ मेरे साथ ऐसा हुआ ऐसी कोई बात नहीं है.''

यंग जेनरेशन उम्मीद करें, नाकारात्मक ना हों

जावेद अख्तर ने कहा,' यंग जेनरेशन से यही कहूंगा कि आपको नकारात्मक नहीं होना चाहिए. जिंदगी बड़ी जिंदा चीज है, फिर उठेगी फिर ठीक होगी. ये धूल जो बदन पर लगी है फिर झाड़कर चल पड़ेगी. फिर वही गहमागहमी, वही हंगामा होगा. जिंदगी आसानी से मानती नहीं, ये अजीब प्लेनेट है.

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'सब खत्म होने के बाद भी बोती है शुरुआत'

उन्होंने कहा,'विशेषज्ञों को मालूम है कि हम लोग तीसरी बार के हैं. दुनिया में दो बार ऐसा हो चुका है जब लगा है कि सबकुछ खत्म हो चुका है. पहले कुछ जानवर थे, एक पिंड टकराया और सबखत्म हो गया. फिर 8 करोड़ साल बाद डायनासोर आए. फिर पिंड से टक्कर हुई और वे भी खत्म हो गए. फिर इंसान आया. इसलिए नाउम्मीद तो होना ही नहीं चाहिए. हम हारते कब हैं, जब हम कोशिश करना बंद कर देते हैं. जब तक हम कोशिश करते हैं तो जंग जारी है. जिस दिन कोशिश बंद की हम हार जाते हैं.'

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