आजकल के दौर में महिलाएं हर क्षेत्र में अच्छा काम कर रही हैं. ऐसी कई शादीशुदा महिलाएं हैं जो अपने पतियों के बराबर या उनसे ज्यादा भी कमा रही हैं. अगर कोई महिला अपने पति से ज्यादा कमा रही है तो इसमें कोई दिक्कत-परेशानी की बात नहीं है.
लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात है कि समाज भले ही महिलाओं को कमाऊ और सशक्त व्यक्ति के रूप में स्वीकार कर रहा हो लेकिन यह स्वीकार्यता भी रिश्ते की प्रकृति पर निर्भर करती है. उदहारण के लिए मियां-बीवी का रिश्ता, यही वजह है कि जब पत्नी ज्यादा कमाती है तो इसका असर क्या होता है, ये जानने के लिए एक स्टडी की गई जिसमें कुछ हैरान करने वाली चीजें निकलकर सामने आईं.
'द इकोनॉमिस्ट' की एक हालिया एनालिसिस में यह जानने की कोशिश की गई कि जब अपोजिट सेक्स (यानी कपल या पार्टनर्स) वाले रिश्तों में महिलाएं ज्यादा कमाने वाली सदस्य बनती हैं तो उसका असर पति या उनके बीच के रिश्ते पर क्या होता है. इस रिसर्च के नतीजों से पता चलता है कि कुछ जोड़ों के लिए सदियों से चली आ रही भूमिका में बदलाव पुरुषों में ज्यादा मानसिक तनाव और महिलाओं में रिश्ते से कम संतुष्टि से जुड़ा हो सकता है.
इन नतीजों का मतलब यह नहीं है कि जिस भी पुरुष की पत्नी ज्यादा कमाती है, वो तनाव महसूस करेगा या जिन जोड़ों में महिला कमाने वाली सदस्य है, वो रिश्ते नाखुशी से भरे ही रहेंगे. लेकिन ये एक दिलचस्प सवाल जरूर उठाते हैं कि क्या जेंडर रोल्स में बदलाव के प्रति नजरिया सच में उतना बदला है जितना हम सोचते हैं.
जब पत्नी मुख्य कमाने वाली सदस्य बनती है
इस एनालिसिस में युवा, वर्किंग कपल के 17 साल के डेटा का इस्तेमाल किया गया जिसमें पाया गया कि हाल के वर्षों में जेंडर पे गैप (स्त्री-पुरुष की कमाई में अंतर) कम होने के बावजूद केवल लगभग 30% जोड़ों में ही पत्नियां अपने पतियों से ज्यादा कमाती थीं.
यह फर्क तब और साफ तौर पर दिखा जब घर की ज्यादातर कमाई महिलाओं की तरफ से होने लगी.
नतीजों के मुताबिक, जिन पुरुषों की पत्नियां घर की कुल कमाई का कम से कम 70% हिस्सा कमाती थीं, उनमें गंभीर मानसिक तनाव होने की संभावना उन पुरुषों के मुकाबले लगभग ढाई गुना ज्यादा थी जो घर में मुख्य रूप से कमाई करते थे.
इसका मतलब यह नहीं है कि कम कमाने से तनाव होता है. इस स्थिति के पीछे कई वजहें हो सकती हैं. कुछ पुरुषों को इसलिए दबाव महसूस हो सकता है क्योंकि वो यह मानकर बड़े हुए थे कि परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी करना उन्हीं की जिम्मेदारी है. वहीं, कुछ पुरुषों को इस बात की चिंता हो सकती है कि दोस्त, रिश्तेदार या समाज उनके रिश्ते को किस नजरिए से देखते हैं.
और फिर एक निजी सवाल भी है जिसे स्वीकार करना मुश्किल हो सकता है. अगर घर में ज्यादातर कमाई फीमेल पार्टनर करती है तो एक पुरुष की पहचान पर इसका क्या असर पड़ता है.
भले ही कोई कपल इस व्यवस्था से पूरी तरह सहज हो लेकिन उनके आस-पास के लोगों की उम्मीदें शायद उस तेजी से नहीं बदली हों. यानी कि वो अभी भी पुरानी सोच पर अटके हैं जहां पुरुष ही घर का कमाऊ सदस्य होता है.
यह पैटर्न सिर्फ शादीशुदा जोड़ों तक ही सीमित नहीं है
दिलचस्प बात यह है कि एनालिसिस में ऐसे जोड़ों में भी एक जैसा पैटर्न देखा गया जो साथ तो रह रहे थे लेकिन शादीशुदा नहीं थे.
जब महिलाओं की कमाई घर की कुल कमाई का आधे से ज्यादा हिस्सा होती थी तो पुरुषों में मानसिक तनाव महसूस करने की संभावना लगभग 1.5 गुना ज्यादा होती थी.
उम्र, पढ़ाई और कुल इनकम जैसे फैक्टर्स को ध्यान में रखने के बाद भी यही पैटर्न बना रहा. इसलिए एनालिसिस के अनुसार, मुद्दा सिर्फ यह नहीं हो सकता कि किसी घर के पास कितना पैसा है.
इसका संबंध इस बात से ज्यादा हो सकता है कि पैसा कौन कमा रहा है और इसे किस नजरिए से देखा जाता है. पीढ़ियों से पुरुषों से घर चलाने वाले (कमाऊ सदस्य) होने की उम्मीद की जाती रही है जबकि महिलाओं से घर और परिवार की देखभाल करने की उम्मीद की जाती थी. समय के साथ ये भूमिकाएं काफी बदल गई हैं, लेकिन वो पुरानी उम्मीदें हैरानी की हद तक समाज में मौजूद हैं.
एक पुरुष अपनी पत्नी के करियर का पूरा सपोर्ट कर सकता है और उसकी सफलता पर सचमुच गर्व महसूस कर सकता है लेकिन जब वो परिवार की मुख्य कमाने वाली सदस्य बन जाती है तो उसे एक असहज दबाव महसूस हो सकता है.
हो सकता है कि महिलाएं ज्यादा कमा रही हों, लेकिन क्या वो घर के कम काम कर रही हैं?
इस स्टडी के नतीजे बातचीत के एक और पहलू की ओर इशारा करते हैं जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है.
जिन घरों में महिलाएं मुख्य कमाने वाली थीं, वहां की महिलाओं ने उन जोड़ों की तुलना में रिश्तों से कम संतुष्टि जताई, जहां कमाई का बंटवारा ज्यादा संतुलित था या जहां पुरुष मुख्य कमाने वाले थे.
इसकी एक संभावित वजह यह भी हो सकती है कि ज्यादा पैसे कमाने का मतलब यह नहीं है कि महिलाएं घर पर बिना पैसे वाला काम कम कर रही हैं.
जैसा कि कैनसस यूनिवर्सिटी की अर्थशास्त्री डॉ. मिस्टी हेगेनेस ने 'द इकोनॉमिस्ट' को बताया, चाहे कोई भी ज्यादा कमाए. अक्सर घर की जिम्मेदारियों का एक बड़ा हिस्सा महिलाओं को ही उठाना पड़ता है.
उन्होंने कहा, 'घर का काम आज भी ज्यादातर महिलाओं के कंधों पर ही होता है, चाहे वो कमाने वाली हों या न हों.'
और यहीं से निकलता है 'डबल बर्डन' का आइडिया
एक औरत फुल-टाइम जॉब कर सकती है, घर की ज्यादातर इनकम कमा सकती है और फिर भी खाना बनाने, सफाई करने, बच्चों की देखभाल करने, परिवार के इवेंट्स की प्लानिंग करने और घर चलाने वाली सभी छोटी-छोटी चीजों को याद रखने जैसे काम खुद के कंधों पर पाती है.
ऐसी सिचुएशन में ज्यादा कमाने का मतलब जरूरी नहीं कि ज्यादा पावर या आजादी हो. इसका सीधा मतलब ज्यादा जिम्मेदारियां हो सकता है.
क्या कपल्स ने हमेशा इस सिचुएशन से बचने की कोशिश की है?
यह एनालिसिस पहले की रिसर्च से भी जुड़ता है जो यह भी बताता है कि कुछ कपल्स अनजाने में भी इस स्थिति में असहज महसूस कर सकते हैं जब उन कपल में फीमेल साफ तौर पर ज्यादा कमाने वाली बन जाती हैं.
यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की इकोनॉमिस्ट मैरिएन बर्ट्रेंड की 2015 की एक स्टडी में पाया गया कि घर की इनकम में पत्नियों का बताया गया हिस्सा 50% से थोड़ा कम था. नतीजों से यह पॉसिबिलिटी सामने आई कि कुछ कपल्स ऐसी सिचुएशन को रिपोर्ट करने या मानने से बच सकते हैं जहां औरतें अपने पतियों से ज्यादा कमाती हैं.
इसका मतलब जरूरी नहीं कि कपल्स जानबूझकर अपनी इनकम छिपा रहे हों.
इसके बजाय यह उन बारीक तरीकों को दिखा सकता है जिनसे पारंपरिक जेंडर उम्मीदें रिश्तों पर असर डालती हैं. कभी-कभी तो दोनों पार्टनर को इसका पता भी नहीं चलता.
फ्रांस में हुई एक और स्टडी में पाया गया कि जिन जोड़ों में महिला घर की कुल कमाई का लगभग 75% हिस्सा कमाती थी, उनके अलग होने की संभावना उन जोड़ों के मुकाबले लगभग 30% ज्यादा थी जिनकी कमाई लगभग बराबर थी.
फिर भी ये आंकड़े यह साबित नहीं करते कि महिला की ज्यादा कमाई ही रिश्ते के टूटने की वजह बनती है. रिश्ते इतने जटिल होते हैं कि किसी एक वजह से सब कुछ नहीं समझाया जा सकता. लेकिन ये आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि पारंपरिक आर्थिक भूमिकाओं से हटकर कुछ नया करने पर कभी-कभी ऐसी चुनौतियां आ सकती हैं जिनके लिए जोड़े तैयार नहीं होते.
ऐसा लगता है कि रिश्तों की तुलना में समाज तेजी से बदल रहा है.
शायद सबसे दिलचस्प बात यह है कि लोगों की सोच अलग दिशा में बढ़ती दिख रही है.
'द इकोनॉमिस्ट' के एनालिसिस से पता चला है कि 2022 में सर्वे में शामिल सिर्फ 10% अमेरिकियों का मानना था कि अगर कोई महिला अपने पति से ज्यादा कमाती है तो ये कोई दिक्कत वाली बात है.
यह 1998 के मुकाबले एक बड़ा बदलाव है, जब एक-तिहाई से ज्यादा लोग ऐसा सोचते थे. दूसरे शब्दों में कहें तो समाज अब महिलाओं के ज्यादा कमाने की बात को ज्यादा आसानी से स्वीकार कर रहा है. लेकिन पर्सनल रिश्तों में इस बदलाव को अपनाने में ज्यादा समय लग सकता है.
यह कहना एक बात है कि महिलाओं को आर्थिक रूप से आजाद होना चाहिए और उन्हें भी पुरुषों की तरह सफल होना चाहिए. लेकिन ऐसे रिश्ते में रहना जहां पारंपरिक भूमिकाएं पूरी तरह से उलट गई हों, एक बिल्कुल अलग बात है.
और शायद यही वो असली बातचीत है जो इन नतीजों से शुरू होती है. किसी महिला की सफलता से पुरुष को खुद को कमतर नहीं समझना चाहिए. पुरुष की कम कमाई से उसकी अहमियत तय नहीं होनी चाहिए. और महिला के ज्यादा कमाने का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि घर के काम का ज्यादा बोझ भी उसी को उठाना पड़े.
कपल्स के लिए सबसे अच्छा तरीका यह नहीं है कि कौन ज्यादा कमाता है, बल्कि यह है कि क्या दोनों लोगों की रिश्ते में अहमतियत है.
पैसा रिश्ते का बैलेंस बदल सकता है लेकिन जरूरी नहीं कि ये उसे तय करे
बड़ी चुनौती शायद इस पुरानी सोच को छोड़ना हो सकती है कि एक आदमी की कीमत उसकी सैलरी से जुड़ी होती है या एक औरत की सफलता किसी और की कीमत पर होती है. क्योंकि अगर कपल्स इन उम्मीदों से आगे बढ़ सकें तो शायद अपने पार्टनर से ज्यादा कमाना वैसा बन सकता है जैसा उसे हमेशा से होना चाहिए था. बस एक फाइनेंशियल सच्चाई, यह इस बात का पैमाना नहीं है कि रिश्ते में कौन ज्यादा मायने रखता है.