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कभी लड़कों की पहचान होता था पिंक, कब बना लड़कियों का सिग्नेचर रंग? पिंक के ‘जेंडर स्विच’ की कहानी

क्या आप जानते हैं क‍ि आज ज‍िस प‍िंक कलर को लड़क‍ियों के ल‍िए एक तरह से 'र‍िजर्व' मानते हैं, वो कभी लड़कों के ल‍िए इस्तेमाल होता था. इस 'जेंडर स्पेश‍िफ‍िक' कलर का इत‍िहास काफी अलग रहा है. क्या है वह द‍िलचस्प इत‍िहास, जानकर आप भी चौंक जाएंगे.

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Pink color interesting history
Pink color interesting history

इंसानी जिंदगी में हर रंग का एक खास असर और अहमि‍यत होती है. लेकिन आज हम बात कर रहे हैं 'गुलाबी' रंग की. गुलाबी एक ऐसा रंग है जि‍से लड़कियों का पसंदीदा बताया जाता है. आपने अक्सर अपने आसपास ये सुना ही होगा- अरे! पिंक तो लड़कियों का कलर है! इसका ही नतीजा है पुरुष इस रंग से परहेज करते दिखते हैं. तो इसे लेकर समाज एक तरह से धारणा ही बन गई कि पिंक लड़कियों के लि‍ए बना है और एक तरह से उनके लि‍ए ही आरक्षि‍त है.

लेकिन सवाल ये है कि आखिर एक रंग सिर्फ एक जेंडर से किस आधार पर ताल्लुक रखता है. और इस धारणा की शुरुआत कब से हुई? क्या पिंक हमेशा से लड़कियों का रंग माना जाता था? इसका जवाब है नहीं. 19वीं सदी के अंत में गुलाबी रंग लड़कों और नीला रंग लड़कियों से जोड़ा जाता था. उस समय गुलाबी को मजबूत और नीले को कोमल रंग माना जाता था. लेकिन 1940-50 तक आते-आते ये पूरी तरह बदल गया. जहां महिलाओं का झुकाव पिंक कलर की ओर ज्यादा होने लगा. इसके पीछे दो बड़े कारण बताए जाते हैं-  पहला सामाजिक प्रभाव और दूसरा वक्त के साथ बदलती मार्केटिंग.

1940–50 के दशक में कपड़ों की कंपनियों ने रंगों को जेंडर से जोड़ना शुरू किया. उन्होंने गुलाबी को लड़कियों और नीले को लड़कों के लिए प्रचारित किया. ऐसा इसलिए किया गया ताकि अलग-अलग जेंडर के लिए ज्यादा कपड़े बेचे जा सकें. वक्त के साथ विज्ञापनों और दुकानों ने भी इसी सोच को बढ़ावा दिया. धीरे-धीरे यह सोच समाज में सामान्य बन गई और गहरी होती चली गई और पता ही नहीं चला कब एक रंग 'जेंडर स्पेस्फिक' बन गया.

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ब्रिटानिका इनसाइक्लोपीडिया के एक आर्टिकल के मुताबिक, अमेरिका के अस्पतालों में नए नवजात का सेक्स मार्क करने के लिए उन्हें गुलाबी या नीले कपड़ों में लपेटा जाता है. लेकिन क्या अमेरिका हमेशा से एक जेंडर को सिग्निफाई करने के लिए इन रंगों का इस्तेमाल करता था? इसका सीधा-सा जवाब है- नहीं. ये प्रैक्टिस अमेरिका में 19वीं शताब्दी के मध्य में प्रचलन में आई. लेकिन ये रंग 20वीं सदी तक लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग तौर पर तय नहीं किए गए थे. गुलाबी रंग को लड़कियों से जोड़ने के पीछे कई अलग-अलग कारण रहे.

1. मार्केटिंग और विज्ञापन:

कंपनियों ने ज्यादा बिक्री के लिए लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग रंग के उत्पाद बनाए, जिससे गुलाबी और नीला जेंडर से जुड़ गए.

2. प्रीनेटल टेस्टिंग:

आधुनिक विज्ञान में ऐसी मशीनें ईजाद की गईं, जि‍ससे माता-पिता को बच्चे के जन्म से पहले ही उसका लिंग पता चलने लगा, जिससे वे पहले से ही जेंडर विशेष रंगों और चीज़ों का चुनाव करने लगे.

3. सामाजिक और मीडिया प्रभाव:

फिल्मों, विज्ञापनों और समाज में बार-बार दोहराए जाने से यह धारणा मजबूत हो गई कि गुलाबी लड़कियों और नीला लड़कों का रंग है.

20वीं सदी की शुरुआत में कुछ दुकानों ने लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग 'उपयुक्त' रंग सुझाने शुरू किए. 1918 में Earnshaw’s Infants’ Department नामक प्रकाशन ने लिखा कि गुलाबी लड़कों के लिए और नीला लड़कियों के लिए बेहतर माना जाता है, क्योंकि गुलाबी को मजबूत रंग और नीले को नाजुक समझा जाता था. सोचिए कितनी अजीब है ये बात कि किसी बच्चे के जन्म लेते ही उसे एक रंग से जोड़ दिया जाए और वो रंग उसके जेंडर की पहचान बन जाए. 1927 में Time मैगजीन ने भी बताया कि कई बड़े स्टोर्स लड़कों के लिए गुलाबी रंग की सलाह देते थे.

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हालांकि, O B. Paoletti, जो Pink and Blue: Telling the Boys From the Girls in America की लेखिका हैं, ने स्मिथसोनियन मैगज़ीन (2011) को बताया कि पहले बच्चों को सफेद कपड़े पहनाना एक व्यावहारिक तरीका था, क्योंकि सफेद कपड़े आसानी से साफ और ब्लीच किए जा सकते थे, लेकिन बाद में इस बात पर फ‍िक्र जताई जाने लगी कि गलत रंग पहनाने से बच्चे के विकास पर असर पड़ सकता है. 1940 के दशक तक आते-आते यह धारणा बदल गई और गुलाबी लड़कियों जबकि नीला लड़कों का रंग बन गया. इन बदलावों के पीछे मार्केटिंग, विज्ञापनों और समाज में बढ़ती जेंडर आधारित सोच का बड़ा प्रभाव था. 1940 के दशक तक आते-आते यह सोच पूरी तरह बदल गई और गुलाबी लड़कियों तथा नीला लड़कों का रंग बन गया. इसके पीछे बच्चों के कपड़ों की मार्केटिंग और समाज में बढ़ती जेंडर आधारित सोच का बड़ा हाथ था. 1960–70 के दशक में महिलाओं के अधिकार आंदोलन के कारण जेंडर-न्यूट्रल कपड़ों का चलन बढ़ा, लेकिन 1980 के बाद प्रीनेटल टेस्टिंग और विज्ञापनों की वजह से जेंडर-आधारित रंगों का ट्रेंड फिर से मजबूत हो गया.

आजकल सोशल मीडिया पर पुरुषों द्वारा पिंक पहनने का ट्रेंड चला है. और महिलाएं ऐसे पुरुषों की बहुत सराहना करती हैं और उस पुरुष को 'फैमिनाइन मैन' मानती हैं यानी वो पुरुष जो संवेदनशील हो या कोमल स्वभाव रखता हो या फिर वो जो कम आक्रामक व्यवहार रखते हैं. न सिर्फ पुरुष, बल्कि इस पैटर्न को रीड करें तो ये साफ दिखाई देता है कि महिलाएं भी गुलाबी रंग को अपना ही रंग मानती है.

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PLOS One जर्नल में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, गुलाबी रंग को लड़कियों से जोड़ना कोई प्राकृतिक सोच नहीं बल्कि समाज और मीडिया द्वारा बनाई गई धारणा है. Research में बताया गया है कि समय के साथ ‘पिंक फॉर गर्ल्स’ जैसी सोच मजबूत हुई, जिसके कारण कई लड़के गुलाबी रंग पसंद होने के बावजूद उसे अपनाने से बचने लगे, क्योंकि समाज इसे लड़कियों का रंग मानने लगा था.

वहीं Psychology of Men & Masculinity जर्नल में प्रकाशित When Boys Wear Pink नाम की रिसर्च में बताया गया है कि जब लड़के गुलाबी रंग पहनते हैं तो समाज अलग तरह से प्रतिक्रिया देता है. क्योंकि समाज में गुलाबी रंग को लंबे समय से लड़कियों और फेमिनिटी से जोड़कर देखा जाता है. रिसर्च के अनुसार, अगर कोई लड़का पिंक पहनता है तो लोग उसकी मर्दानगी, व्यक्तित्व और व्यवहार को अलग नजर से आंकने लगते हैं. यह रिसर्च दिखाता है कि रंगों को लेकर बनी सामाजिक धारणाएं लोगों की सोच और व्यवहार को प्रभावित करती हैं.

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