कर्नाटक की सबसे बड़ी निर्णय लेने वाली संस्था पहली बार राज्य के तटीय इलाके में अपनी कैबिनेट बैठक करने जा रही है. मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली सरकार की कैबिनेट बैठक 18 सितंबर को मंगलुरु में होगी. यह फैसला प्रशासनिक है, लेकिन 2028 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए इसे राजनीतिक तौर पर भी अहम माना जा रहा है. डीके शिवकुमार सरकार ने गुरुवार को 100 दिन पूरे किए.
कर्नाटक सरकार की कैबिनेट बैठकों का आयोजन आमतौर पर राजधानी बेंगलुरु में ही होता रहा है. पहली बार दक्षिण कन्नड़ जिले में सरकार की सबसे बड़ी निर्णय लेने वाली संस्था की बैठक होगी. कांग्रेस के लिए यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रभाव वाले इस इलाके में पार्टी दशकों से अपनी मजबूत जगह बनाने के लिए संघर्ष करती रही है.
तटीय कर्नाटक को लंबे समय से RSS की 'हिंदुत्व लैबोरेटरी' कहा जाता है. दक्षिण कन्नड़ और उडुपी को भी दक्षिण भारत की 'हिंदुत्व लैबोरेटरी' कहा जाता है, जहां RSS और उससे जुड़े संगठनों ने दशकों से जमीनी स्तर पर काम किया है.
आपातकाल से ही बढ़ा दायरा
1975 में इंदिरा गांधी की ओर से लगाए गए आपातकाल ने भी इस इलाके की राजनीति पर असर डाला. RSS ने तटीय कर्नाटक में कांग्रेस के विरोध का फायदा उठाया और आपातकाल के खिलाफ लोगों के लामबंद होने के साथ कांग्रेस के प्रति नाराजगी बढ़ी.
इसी वजह से डीके शिवकुमार का कैबिनेट को मंगलुरु ले जाने का फैसला अहम माना जा रहा है. कांग्रेस सिर्फ बेंगलुरु से बाहर शासन नहीं ले जा रही, बल्कि वह BJP के मजबूत चुनावी इलाकों में अपनी राजनीतिक पकड़ बनाने की कोशिश करती दिख रही है. 18 सितंबर की बैठक आधिकारिक तौर पर विकास से जुड़ी है, लेकिन 2028 के चुनावों को देखते हुए इसका राजनीतिक महत्व भी है.
बीजेपी का ग्राफ
उडुपी को अगस्त 1997 में अविभाजित दक्षिण कन्नड़ जिले से अलग किया गया था. मौजूदा समय में दक्षिण कन्नड़ में 8 और उडुपी में 5 विधानसभा सीटें हैं. 2023 के विधानसभा चुनाव में BJP ने उडुपी की सभी 5 सीटें और दक्षिण कन्नड़ की 8 में से 6 सीटें जीती थीं. कांग्रेस को बाकी 2 सीटें मिली थीं. इस तरह दोनों जिलों की 13 सीटों में से BJP ने 11 सीटें जीती थीं.करीब 30 साल से BJP इन दोनों तटीय जिलों में सबसे ज्यादा सीटें जीतती रही है. 2013 में स्थिति अलग थी, जब कांग्रेस ने 13 में से 10 सीटों पर जीत हासिल की थी.
2023 में कांग्रेस ने 135 विधानसभा सीटों के साथ सत्ता में वापसी की थी. इस जीत में सिद्धारमैया और कांग्रेस की AHINDA राजनीति से जुड़े सामाजिक गठजोड़ की अहम भूमिका रही. AHINDA में अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और दलित शामिल हैं.
कांग्रेस के लिए नया विकल्प
अब कांग्रेस के सामने 2028 में सिर्फ 2023 के आंकड़े बचाए रखने की चुनौती नहीं है, बल्कि नए चुनावी इलाकों में पकड़ बनाने की भी जरूरत है. सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री पद से हटने और सामाजिक न्याय व AHINDA राजनीति में उनकी दोबारा सक्रियता ने कांग्रेस के लिए एक नया राजनीतिक समीकरण बनाया है.
इसी बीच तटीय कर्नाटक डीके शिवकुमार और कांग्रेस के लिए अहम लक्ष्य बनता दिख रहा है. बेंगलुरु के वरिष्ठ पत्रकार और Asianet Suvarna News के पॉलिटिकल एडिटर प्रशांत नाटू ने कहा कि दक्षिण कन्नड़ और उडुपी करीब 30 साल से BJP का मजबूत गढ़ हैं और मंगलुरु में होने वाली कैबिनेट बैठक इस क्षेत्र के मतदाताओं तक पहुंच बनाने की दिशा में डीके शिवकुमार का एक कदम है.