कुछ समय से लग रहा था कि आईफोन ने अपना असली काम करना बंद कर दिया है. कभी भी इसका काम सिर्फ कॉल मिलाना ही नहीं था. इसका असली काम था कमरे में मौजूद लोगों को आपकी हैसियत बताना, इससे पहले कि आप मुंह खोलें और अपनी SoBo या SoDe टोन में घमंड दिखाएं. लेकिन बढ़ती अर्थव्यवस्था और 'नो-कॉस्ट ईएमआई' ने सब गुड़-गोबर कर दिया. टप्पू, डुग्गू और हरकू, हर किसी के हाथ में आईफोन आ गया था. यहां तक कि हरकू के पास तो हैरी से भी ज्यादा स्टोरेज वाला फोन था, क्योंकि उसने सेकंड-हैंड जो खरीदा था.
भारत OG वर्ण-व्यवस्था वाला देश है. दो दशकों के उदारीकरण ने इस पुरानी ऊंच-नीच की व्यवस्था पर चोट करना शुरू किया था, लेकिन तभी आईफोन आ गया. एक नया इन-हैंड स्टेटस सिंबल, जिसके पीछे कटे हुए सेब का निशान बना था. फिर समय आया, और उसने सबको एक बराबर कर दिया. महलों में रहने वाले किसी बड़े अमीर और आम मोहल्ले के किसी आम आदमी के बीच की कमाई का फ़र्क लगातार बढ़ता ही चला गया. इतना बढ़ा कि दोनों के बीच का फासला महासागर जितना गहरा हो गया. लेकिन इस फ़र्क से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ा. भले ही अमीरों की लिस्ट में दोनों बहुत दूर थे, लेकिन एप्पल की लिस्ट में दोनों बिल्कुल पास आ गए. दोनों के हाथों में '17 प्रो मैक्स' आ गया.
अमीर भाई के पास 2टीबी स्टोरेज वाला फोन था- वे चाहें तो लाखों टीबी खरीद सकते थे, लेकिन आईफोन में 2टीबी से ज्यादा की जगह होती ही नहीं. और टेराबाइट (टीबी) किसी को बाहर से तो दिखता नहीं. स्टोरेज की यही सबसे बड़ी त्रासदी है, यह ऐसा स्टेटस सिंबल है जो फोन के अंदर ही छिपा रहता है. अगर आईफोन एक स्टेटस सिंबल था, तो उस हिसाब से अमीर और गरीब दोनों एक ही बराबरी पर आ खड़े हुए थे.
ऐसे में अमीर और पॉश लोगों ने खुद को अलग दिखाने का नया रास्ता निकाला. बड़े-बड़े इलाकों में ऐसे लोगों की भरमार हो गई जिन्होंने सैमसंग गैलेक्सी अल्ट्रा खरीदना शुरू कर दिया. बड़े घर का रोहन अल्ट्रा फोन सिर्फ़ इसलिए नहीं फ्लॉन्ट करता क्योंकि उसे एंड्रॉइड से प्यार है, बल्कि इसलिए करता है क्योंकि उसका ड्राइवर हरेराम अल्ट्रा खरीदने के लिए अपनी किडनी नहीं बेचेगा. हां, आईफोन के लिए वह खुशी-खुशी दोनों किडनियां बेच देता. यानी अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए पुराना रास्ता छोड़ दिया गया.
एप्पल की नजर इस पर पड़ गई. भारत में आईफोन तो बहुत थे, लेकिन लोगों के अंदर इसे पाने की तड़प या चाहत कम हो रही थी. सब एक बराबर जो हो रहे थे. यह यूरोपीय देशों वाली बीमारी थी, जहां सिर्फ़ बेहद गरीब के पास आईफोन नहीं होता और टेक-प्रेमी इसे खरीदना नहीं चाहते. अमेरिका का भी यही हाल है- फोन मतलब आईफोन. लेकिन भारत न तो यूरोप है और न ही अमेरिका. अगर भारत में आईफोन का क्रेज खत्म हुआ तो सब कुछ खत्म हो जाएगा, क्योंकि भारत का मतलब ही है आगे बढ़ने और कुछ हासिल करने की चाहत.
इसलिए बुधवार रात को एप्पल ने वही किया जो मनु ने किया था. उसने नए नियम लिख दिए. आईफोन डुओ-256 जीबी के लिए 2,99,900 रुपये, और 2टीबी के लिए 4,49,900 रुपये. 2टीबी की जरूरत तो आपको नहीं है, लेकिन फिर भी आप इसे खरीदेंगे. 16 अक्टूबर से बुकिंग शुरू, 23 अक्टूबर से डिलीवरी, और उसी दिन आपकी खोई हुई 'इज्जत' वापस आपके हाथ में. जिन्हें संस्कृत की समझ कम है, उनकी जानकारी के लिए बता दें कि 'डुओ' का मतलब होता है दो. द्विज. यानी उच्च वर्ग. इस लाइन-अप का असली 'ब्राह्मण'. यह बीच से मुड़ जाता है. और जब आप इसकी ईएमआई देखेंगे तो आप भी बीच से मुड़कर झुक जाएंगे. दो साल तक हर महीने लगभग साढ़े बारह हजार रुपये की ईएमआई. आम तौर पर टप्पू जैसे लोग इतना ही तो महीने में कमाते हैं. यानी इस स्कीम का फायदा सिर्फ़ उन्हीं को है जिन्हें किसी स्कीम की कभी जरूरत ही नहीं थी. असली खेल यही है. डुओ में 'फ़ेस आईडी' (चेहरा पहचानने वाला फीचर) तक नहीं है. इसे आपका चेहरा पहचानने की जरूरत ही नहीं है, बल्कि आपके चेहरे को इसे पहचानने की जरूरत है.
डुओ के नीचे आता है- क्षत्रिय. आईफोन 18 प्रो मैक्स, कीमत 1,79,900 रुपये. पिछले साल से 30,000 रुपये महंगा. यह मुड़ता तो नहीं है, लेकिन फिर भी एक योद्धा की तरह बेहद अमीर और ठीक-ठाक अमीर लोगों के बीच की सरहद पर पहरा देता है. इसके नीचे आता है- वैश्य. आईफोन 18 प्रो, कीमत 1,64,900 रुपये. व्यापारी वर्ग, अपर-मिडिल क्लास, सीए, या अपने स्टार्टअप को दूसरे साल में कामयाबी से ले जाने वाला फ़ाउंडर. आराम से जीने वाला, महत्वाकांक्षी, जो प्रो मैक्स से हमेशा 15 हजार रुपये दूर रह जाता है और डुओ खरीदने की औकात से कुछ टैक्स ब्रैकेट पीछे. क्रिकेट की भाषा में कहें तो 'प्रो' का मतलब आईपीएल कॉन्ट्रैक्ट है, 'प्रो मैक्स' का मतलब टेस्ट कैप है, और 'डुओ' का मतलब है खुद बीसीसीआई. बस बात खत्म. तीन वर्ण हो गए. चौथे वर्ण पर आकर एप्पल की यह मनुस्मृति बिल्कुल चुप हो जाती है.
कोई साधारण आईफोन 18 है ही नहीं. यहां सिर्फ़ आईफोन 18 प्रो और आईफोन 18 प्रो मैक्स हैं. प्रेस रिलीज में एक छोटी सी लाइन लिख दी गई है कि साधारण आईफोन 18 वसंत के मौसम में आ सकता है- जिसका एप्पल की भाषा में मतलब है 'अभी नहीं'. पूरी सर्दियों में अमीरों को थोड़ा और अमीर महसूस कर लेने दो. जब सर्दी आ ही गई है, तो वसंत भी आ ही जाएगा. तब तक सुनयना के चाल की चमक देखिए, जब वह मॉल के सामने से खुद को पिक करने के लिए ड्राइवर को फोन लगाती है- ‘भाया, मुझे प्रोमेनेड के सामने लेने आ जाओ’.
इस बीच, बाकी नीचे के पायदान वाले लोग जलते रहें और एक वक्त का खाना छोड़ने की तैयारी करें. पिछले साल का आईफोन 17 अब 99,900 रुपये का है. यानी एक साल पुराना होने के बावजूद पिछले साल की तुलना में 17,000 रुपये ज्यादा महंगा. आईफोन 16, जो कि 2024 का फोन है, वह 89,900 रुपये का है- पूरे 20,000 रुपये महंगा. 17e (e मतलब इकोनॉमी या सस्ता वाला) 79,900 रुपये का है, यानी यह भी 15,000 रुपये महंगा हो गया. एयर मॉडल की कीमत तीस हजार बढ़ गई है. और 17 प्रो तथा 17 प्रो मैक्स बंद ही कर दिया गया है, जो हर आम-ओ-खास के हाथ में दिख जाते थे. वो अकेला आईफोन जो सबके लिए आम हो गया था, उसका वजूद ही मिटा दिया गया. यह कोई रेट लिस्ट नहीं है, यह तो सीधी-सादी 'कॉस्ट आधारित जाति जनगणना' है. लोअर-मिडिल क्लास को साफ बता दिया गया है कि उसका ईएमआई वाला फोन अब डेढ़ गुना ईएमआई का हो चुका है. स्टेटस सिंबल एक बार फिर से असली स्टेटस सिंबल बन गया है.
भारत में लगने वाले एक्स्ट्रा टैक्स (प्रीमियम) पर भी जरा गौर कीजिए. अमेरिका में डुओ की कीमत 1,999 डॉलर है, यानी टैक्स लगने से पहले लगभग 1.90 लाख रुपये. जबकि हम यहां उसी फोन के लिए 2,99,900 रुपये दे रहे हैं- एक लाख दस हजार रुपये ज्यादा. एप्पल हमें अच्छी तरह जानता है. हमें सबसे सस्ता फोन नहीं चाहिए. हमें तो ऐसा फोन चाहिए जो यह साबित कर सके कि हम सस्ते नहीं हैं. साऊथ डेल्ही के वे 'अल्ट्रा' वाले अमीर लोग अब वापस अपने घर लौट सकते हैं. अल्ट्रा तो बस एक विरोध जताने का जरिया था. असली ताजपोशी तो इस डुओ से हुई है.
16 अक्टूबर को शाम 5.30 बजे से बुकिंग शुरू होगी. एक ऑनलाइन कतार लगेगी. अकेली ऐसी लाइन जिसमें यह अमीर वर्ग खड़ा होगा. कोई आम इंसान पेज को सिर्फ बार-बार रिफ़्रेश करेगा, कीमत देखेगा, और चुपचाप अपने पुराने '17 प्रो मैक्स' को देखने लगेगा- एक ऐसा फोन जिसका अब कोई आधिकारिक वजूद ही नहीं बचा है. वह वही करेगा जो भारत का आम आदमी तब करता है जब वह कोई चीज खरीद नहीं पाता. वह गुनगुनाएगा: अच्छा चलता हूं, डुओ में याद रखना...
बैलेंस एक बार फिर बहाल हो चुका है. और एप्पल का बैंक बैलेंस भी!