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बाजार खोलने से लेकर राष्ट्र निर्माण तक: भारत की अगली औद्योगिक क्रांति

नई औद्योगिक क्रांति की ओर बढ़ते भारत में निजी क्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ रही है. सरकार ने स्पेस, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, डेटा सेंटर, सोलर और एयरोस्पेस जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को निजी कंपनियों के लिए खोला है. इससे देश में निवेश और उत्पादन बढ़ने के साथ नई तकनीक और रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं.

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भारत न सिर्फ ज्यादा आत्मनिर्भर बन रहा है. बल्कि दुनिया की सप्लाई चेन के लिए बेहद जरूरी बनता जा रहा है. (Photo- ITG)
भारत न सिर्फ ज्यादा आत्मनिर्भर बन रहा है. बल्कि दुनिया की सप्लाई चेन के लिए बेहद जरूरी बनता जा रहा है. (Photo- ITG)

कुछ आर्थिक सुधार ऐसे होते हैं जो तुरंत नतीजे देते हैं. जबकि कुछ सुधार अर्थव्यवस्था के ढांचे को ही बदल देते हैं और ऐसे मौके पैदा करते हैं जिनका पूरा फायदा आने वाले दशकों में दिखता है. नरेंद्र मोदी सरकार का रणनीतिक और तकनीक से जुड़े क्षेत्रों को प्राइवेट कंपनियों के लिए खोलने का फैसला इसी दूसरी श्रेणी में आता है.

दशकों तक स्पेस, एयरोस्पेस और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर पूरी तरह से सरकार के ही भरोसे चलते रहे. प्राइवेट इंडस्ट्री के पास अपनी ताकत बढ़ाने, बड़े पैमाने पर निवेश करने या दुनिया से मुकाबला करने के लिए बहुत कम जगह थी. मोदी सरकार ने समझा कि अगर भारत को एक विकसित अर्थव्यवस्था बनना है, तो सरकार हर रणनीतिक उद्योग में मुख्य भूमिका में नहीं रह सकती. सरकार को मदद करने वाला बनना पड़ेगा- एक ऐसी नीतियां, छूट और ढांचा तैयार करना होगा जिससे प्राइवेट पूंजी और कारोबारी भारत की क्षमताओं को बड़े पैमाने पर आगे ले जा सकें.

यह बदलाव अब स्पेस, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर मैन्युफैक्चरिंग और एयरोस्पेस में एक नया औद्योगिक माहौल तैयार करने लगा है.

इस मौके का दायरा बहुत बड़ा है. भारत की उभरती औद्योगिक क्रांति पर जेफरीज़ के एक हालिया आकलन से पता चलता है कि भारत की स्पेस अर्थव्यवस्था 2030 तक करीब 45 अरब डॉलर तक बढ़ सकती है. डेटा सेंटर में लगभग 45 अरब डॉलर के निवेश का मौका है. सेमीकंडक्टर में पहले ही करीब 20 अरब डॉलर का निवेश हो चुका है और 13 अरब डॉलर की प्रोत्साहन योजना अलग से है. इसके अलावा इस दशक के अंत तक सोलर मैन्युफैक्चरिंग की 90% सप्लाई चेन भारत में ही बनने की संभावना है. जैसे-जैसे भारत मैन्युफैक्चरिंग और ग्लोबल सप्लाई चेन में गहराई से उतर रहा है, इलेक्ट्रॉनिक्स और एयरोस्पेस भी उतने ही बड़े मौके पैदा कर रहे हैं.

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इन आंकड़ों को सिर्फ आपस में जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि ये अलग-अलग क्षेत्रों और अलग-अलग समय से जुड़े हैं. लेकिन ये एक बात साफ कर देते हैं: भारत एक साथ कई नए, अरबों डॉलर के औद्योगिक तंत्र खड़े कर रहा है.

स्पेस सेक्टर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि जब सरकारी नीति और प्राइवेट कारोबार आपस में मिलते हैं तो क्या होता है. 2020 में स्पेस सेक्टर को प्राइवेट भागीदारी के लिए खोलने के फैसले ने इस पूरे उद्योग का चेहरा ही बदल दिया. स्काईरूट, अग्निकुल, पिक्सेल और दिगंतरा जैसे स्टार्ट-अप अब रॉकेट, सैटेलाइट, जमीन पर नजर रखने वाली तकनीक और दूसरी ऐसी चीजें बना रहे हैं जो कभी सिर्फ सरकारी क्षेत्र तक सीमित थीं. भारत की स्पेस अर्थव्यवस्था 2033 तक करीब 8.4 अरब डॉलर से बढ़कर लगभग 44 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जिसमें करीब 11 अरब डॉलर का निर्यात (एक्सपोर्ट) भी शामिल है.

इसकी अहमियत सिर्फ आंकड़ों से कहीं ज्यादा है. भारत अपना खुद का कमर्शियल स्पेस सेक्टर तैयार कर रहा है, जहां सरकारी क्षेत्र की तकनीकी ताकत को प्राइवेट पूंजी, नए विचारों और तेजी के साथ जोड़ा जा सकता है. यही मॉडल अब दूसरे रणनीतिक क्षेत्रों में भी अपनाया जा रहा है.

सेमीकंडक्टर बहुत जरूरी हैं क्योंकि ये आज के दौर के उद्योगों की जान हैं. गाड़ियां, स्मार्टफोन, टेलीकॉम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रक्षा प्रणाली और फैक्ट्रियों की मशीनें- सब इन्हीं पर चलती हैं. इसलिए भारत का सेमीकंडक्टर मिशन सिर्फ चिप्स बनाने तक सीमित नहीं है. यह चिप्स बनाने, उनकी पैकिंग और टेस्टिंग, चिप डिजाइनिंग, लगने वाले सामान, उपकरण और उनसे जुड़े पूरे उद्योग का एक माहौल तैयार करने के बारे में है. इस सेक्टर में अब तक जो करीब 20 अरब डॉलर लगाए गए हैं और साथ में 13 अरब डॉलर का जो प्रोत्साहन पैकेज है, वह इस बात की शुरुआत है कि भारत अब उस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने जहां विदेश पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता हमारी बहुत बड़ी कमजोरी थी.

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इलेक्ट्रॉनिक्स दिखाता है कि यह तरीका कितना सही काम कर सकता है. भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन 2014-15 के करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 13.11 लाख करोड़ रुपये हो गया है. वहीं इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट लगभग 38,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 4.24 लाख करोड़ रुपये हो गया है. मोबाइल फोन का एक्सपोर्ट करीब 1,500 करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 2.59 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. भारत ज्यादातर मोबाइल फोन बाहर से मंगवाने की स्थिति से निकलकर अब बाहर भेजने वाला देश बन चुका है, और देश में बिकने वाले लगभग सभी फोन अब भारत में ही बनते हैं.

यही वह रास्ता है जो मायने रखता है: देश के अंदर ही सामान बनाओ, उसके कल-पुर्जों का पूरा माहौल मजबूत करो, काम को बड़े पैमाने पर ले जाओ और फिर दुनिया के बाजारों में मुकाबला करो.

डेटा सेंटर एक और नया क्षेत्र है. भारत में डेटा सेंटरों की क्षमता बहुत तेजी से बढ़ी है और आने वाले सालों में यह 2 गीगावाट से बढ़कर 5-10 गीगावाट तक पहुंच सकती है. इससे बिजली, कूलिंग, कंस्ट्रक्शन, नेटवर्किंग और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में करीब 45 अरब डॉलर के निवेश के मौके बन सकते हैं. जैसे-जैसे AI, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल सेवाएं बढ़ेंगी, भारत में मौजूद इंजीनियरों का टैलेंट, डिजिटल इस्तेमाल और कम लागत भारत को पूरे क्षेत्र का एक बड़ा डिजिटल-इंफ्रास्ट्रक्चर हब बना सकते हैं.

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सोलर मैन्युफैक्चरिंग इसमें एक और अहम रणनीतिक कड़ी जोड़ती है. सोलर क्षेत्र से जुड़ी पूरी सप्लाई चेन को देश के भीतर तैयार करने से बाहर से मंगाए जाने वाले कल-पुर्जों पर निर्भरता कम होती है. साथ ही एक ऐसा उद्योग खड़ा होता है जो भारत से बाहर तेजी से बढ़ रहे बाजारों को भी सामान दे सके. 2030 तक सोलर मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े 90% हिस्से को देश में ही बनाने के लक्ष्य के साथ, भारत ऊर्जा सुरक्षा को एक बेहतरीन एक्सपोर्ट के मौके में बदल सकता है.

एयरोस्पेस शायद मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और दुनिया के व्यापार को जोड़ने वाला सबसे साफ रास्ता दिखाता है. भारत के पास बेहतरीन इंजीनियरों की बड़ी तादाद और कम लागत का फायदा है, जो दुनिया की एयरोस्पेस कंपनियों को बहुत आकर्षित करता है. भारतीय कंपनियां बोइंग और एयरबस जैसे दुनिया के बड़े निर्माताओं को पहले से ही कल-पुर्जे सप्लाई कर रही हैं. जैसे-जैसे वैश्विक कंपनियां अपने सप्लाई चेन को अलग-अलग देशों में बांट रही हैं, भारत के पास सिर्फ छोटे-मोटे कल-पुर्जे बेचने वाले से हटकर एक बड़ा एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग हब बनने का मौका है.

इन सभी छह क्षेत्रों में जो बात एक जैसी है, वह है बड़े पैमाने पर काम करने की क्षमता. भारत का घरेलू बाजार एक ऐसी चीज देता है जो दुनिया के बहुत कम देशों के पास है: एक बहुत बड़ी मांग, जहां किसी भी तकनीक को विदेश ले जाने से पहले इस्तेमाल किया जा सकता है, परखा जा सकता है और बेहतर बनाया जा सकता है.

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यह विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) में भारत के लिए एक बहुत बड़ा मौका बनाता है. अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका के देश ऐसी तकनीक तलाश रहे हैं जो सिर्फ आधुनिक ही न हो, बल्कि सस्ती, भरोसेमंद और बड़े पैमाने पर परखी हुई हो. भारत इस मांग को पूरा करने के लिए सबसे सही जगह पर है.

मौका सिर्फ सामान एक्सपोर्ट करने का नहीं है. मौका उन समाधानों को एक्सपोर्ट करने का है जो विकासशील देशों की जमीनी सच्चाई को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं चाहे वह सस्ते सैटेलाइट और स्पेस ऐप्स हों, सोलर तकनीक हो, इलेक्ट्रॉनिक्स हो, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर हो, एयरोस्पेस के पार्ट्स हों या सेमीकंडक्टर से जुड़े प्रोडक्ट्स और सेवाएं हों.

यहीं आकर आत्मनिर्भर भारत की सोच के बड़े मायने समझ आते हैं. आत्मनिर्भरता का मतलब दुनिया के लिए दरवाजे बंद करना नहीं है. इसका मतलब दुनिया से मुकाबला करने की क्षमता हासिल करना है. मकसद सिर्फ बाहर से आने वाले सामान की जगह लेना नहीं है, बल्कि ऐसे प्रोडक्ट्स और टेक्नोलॉजी बनाना है जो इतने बेहतर हों कि वे विदेशी बाजारों को जीत सकें.
इसका एक सीधा सा क्रम है: बाहर से सामान मंगाना बंद करने से देश के अंदर क्षमता बनती है; अंदर की क्षमता से काम बड़े पैमाने पर होता है; बड़े पैमाने पर काम होने से लागत कम होती है; कम लागत से दुनिया में मुकाबला करने की ताकत मिलती है; और यही ताकत एक्सपोर्ट को बढ़ावा देती है.

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इसी तरह एक पूरा औद्योगिक माहौल आर्थिक फायदे में बदल जाता है.

इसलिए मोदी सरकार के सुधारों का सबसे बड़ा और दूरदर्शी पहलू कोई अकेली छूट या योजना नहीं है. यह सरकार की भूमिका को ही बदलने का फैसला है एक मालिक या मुख्य खिलाड़ी बनने के बजाय प्राइवेट निवेश, नए प्रयोगों और मुकाबले का रास्ता साफ करने वाला बनना.
एक सुधार दूसरे नए मौके को जन्म देता है. सेमीकंडक्टर बनने से इलेक्ट्रॉनिक्स मजबूत होता है. इलेक्ट्रॉनिक्स से कल-पुर्जे बनाने वाले उद्योगों का माहौल बनता है. डेटा सेंटरों से बिजली, कूलिंग और नेटवर्किंग की मांग बढ़ती है. स्पेस सेक्टर से रॉकेट चलाने, नई धातुओं, एवियोनिक्स और सैटेलाइट में महारत हासिल होती है. एयरोस्पेस से बारीक इंजीनियरिंग की समझ बढ़ती है जो रक्षा और आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग में काम आती है. सोलर मैन्युफैक्चरिंग से ऊर्जा सुरक्षा और एक्सपोर्ट की क्षमता दोनों मजबूत होते हैं.

ये सारे फायदे आपस में जुड़कर कई गुना हो जाते हैं.

और 'विकसित भारत 2047' के सफर में भारत को ठीक इसी की जरूरत है. एक विकसित भारत सिर्फ सामान खरीदने और इस्तेमाल करने से नहीं बन सकता. इसके लिए गहरी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, तकनीकी ताकत, प्राइवेट निवेश, कुशल रोजगार, बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर और दुनिया के बाजारों के लिए बेहतर सामान बनाने की काबिलियत चाहिए.

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इसलिए इन छह सेक्टरों को प्राइवेट कंपनियों के लिए खोलने का फैसला सिर्फ नियम बदलने से कहीं बढ़कर था. यह एक दूरदर्शी और प्रगतिशील ढांचागत सुधार था, जिसने बहुत पहले ही समझ लिया था कि 21वीं सदी के भारत को दुनिया के सामानों का सिर्फ एक बड़ा बाजार बनने के बजाय, दुनिया भर में पसंद की जाने वाली तकनीक का एक बड़ा उत्पादक और एक्सपोर्टर बनना होगा.

इसके फायदे अभी से दिखने लगे हैं, लेकिन इसका सबसे बड़ा नतीजा आने वाले दो दशकों में सामने आएगा.

भारत न सिर्फ ज्यादा आत्मनिर्भर बन रहा है. बल्कि वह ज्यादा सक्षम, ज्यादा प्रतिस्पर्धी और दुनिया की सप्लाई चेन के लिए बेहद जरूरी बनता जा रहा है. 

भारत की नई औद्योगिक क्रांति का असली वादा यही है, और यह 'विकसित भारत 2047' के रास्ते की सबसे मजबूत नींवों में से एक है.

(लेखक बीजेपी पश्चिम बंगाल के सह-प्रभारी और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं. इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं.)

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