6 अक्टूबर 1973 को इजरायल पर मिस्र और सीरिया ने मिलकर हमला कर दिया था. इस युद्ध को योम किप्पुर युद्ध भी कहा जाता है. क्योंकि, यह हमला यहूदियों के पवित्र दिन योम किप्पुर के अवसर पर शुरू किया गया था. यह युद्ध लगभग तीन सप्ताह तक चला था. इस जंग ने अमेरिका और सोवियत संघ को भी आमने- सामने खड़ा कर दिया था. योग किप्पुर युद्ध अरब-इजरायल के बीच होने वाली चौथी लड़ाई थी.
यह जंग इजरायल और मिस्र -सीरिया के नेतृत्व वाले अरब राज्यों की गठबंधन सेना के बीच लड़ी गई. ज़्यादातर लड़ाई सिनाई प्रायद्वीप और गोलान हाइट्स में हुई. कुछ लड़ाई मिस्र और उत्तरी इजरायल में भी हुई. इस युद्ध में मिस्र का लक्ष्य सिनाई प्रायद्वीप की वापसी के लिए बातचीत करने को लेकर स्वेज नहर के पूर्वी तट पर कब्जा करना था.
जंग शुरू होते ही मिस्र और सीरियाई सेनाओं ने सिनाई और गोलान हाइट्स में बढ़त बना ली. मिस्र की सेना ने ऑपरेशन बद्र में स्वेज नहर को पार किया और सिनाई में आगे बढ़ी, जबकि सीरियाई सेना गोलान हाइट्स के इलाके में घुस गई.
शुरुआत में ऐसा लग रहा था कि मिस्र और सीरिया इस लड़ाई में विजयी होंगे. आधुनिक सोवियत हथियारों से लैस दोनों देश 1967 के छह दिवसीय युद्ध में मिली अपनी अपमानजनक हार का बदला लेने की उम्मीद कर रहे थे. अचानक हुए इस हमले से इज़रायल हैरान था. दो मोर्चों पर हुए इस हमले से पहले तो बुरी तरह लड़खड़ा गया. फिर सीरियाई और मिस्री सेनाओं में फैली अव्यवस्था के दम पर इज़रायली जवाबी हमलों ने युद्ध का रुख पलट दिया.
अचानक से इजरायल ने चौंका दिया. इजरायल शुरू में तो दो मोर्चों पर हमले से लड़खड़ाया, लेकिन जवाबी हमलों ने स्थिति को बदल दिया. तीन दिनों के बाद, इजरायल ने मिस्र को आगे बढ़ने से रोक दिया और सीरियाई लोगों को पीछे धकेल दिया. इसके बाद इज़रायल ने दमिश्क के बाहरी इलाके में गोलाबारी करते हुए सीरिया पर जवाबी हमला किया.
इजरायली सैनिकों ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण गोलान हाइट्स पर कब्जा कर लिया. मिस्री सेना की हालत और भी बदतर थी. सिनाई रेगिस्तान से पीछे हटते हुए, उनके हजारों सैनिक इज़रायली सेना द्वारा घेर लिए गए और उनका संपर्क टूट गया.
22 अक्टूबर को, संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता वाला युद्ध विराम टूट गया, जिसमें दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर उल्लंघन का आरोप लगाया. योम किप्पुर युद्ध के महत्वपूर्ण परिणाम हुए. इसके परिणामस्वरूप 1978 के कैंप डेविड समझौते हुए , जब इजरायल ने सिनाई प्रायद्वीप को मिस्र को वापस कर दिया और मिस्र-इजरायल शांति संधि हुई. पहली बार किसी अरब देश ने इजरायल को मान्यता दी.