26 अगस्त 1957 को सोवियत रूस ने दुनिया को बताया कि उसने एक ऐसी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल यानी ICBM का सफल परीक्षण कर लिया है, जो दुनिया के किसी भी हिस्से तक परमाणु हथियार पहुंचाने में सक्षम हो सकती है. इस घोषणा से 4 दिन पहले रूस ने मिसाइल का टेस्ट कर लिया था. इस ऐलान ने अमेरिका की चिंता बढ़ा दी और दोनों देशों के बीच मिसाइलों की होड़ ने एक नया मोड़ ले लिया.यह वह दौर था जब दुनिया दूसरे विश्व युद्ध की तबाही से अभी पूरी तरह उबर भी नहीं पाई थी.
अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध तेजी से बढ़ रहा था. दोनों देश परमाणु हथियारों के साथ-साथ ऐसी लंबी दूरी की मिसाइल बनाने में जुटे थे, जो हजारों किलोमीटर दूर तक जाकर हमला कर सके.
दूसरे विश्व युद्ध के आखिरी दिनों में नाजी जर्मनी ने V-1 और V-2 रॉकेट विकसित किए थे. इनका इस्तेमाल ब्रिटेन पर हमले के लिए किया गया था. युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने जर्मनी की इस तकनीक और वैज्ञानिकों से फायदा उठाया.
दोनों देशों के वैज्ञानिकों का लक्ष्य एक ऐसी मिसाइल बनाना था जो लंबी दूरी तक उड़ सके, ज्यादा सटीक हो और परमाणु हथियार लेकर हमला कर सके. यही कोशिश आगे चलकर इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल यानी ICBM के विकास की वजह बनी.
जुलाई 1957 में अमेरिका को लगा कि वह इस रेस में आगे निकल गया है. अमेरिका ने एटलस नाम की ICBM को टेस्ट के लिए तैयार किया था. यह मिसाइल करीब 20,000 मील प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ने और लगभग 5,000 मील तक की दूरी तय करने में सक्षम बताई गई थी. लेकिन जब इसका परीक्षण किया गया तो नतीजा उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा.
मिसाइल हवा में करीब 5,000 फीट तक ही पहुंच पाई. इसके बाद उसका संतुलन बिगड़ गया, वह पलटने लगी और आखिरकार जमीन पर आ गिरी. अमेरिका के लिए यह बड़ा झटका था.
अमेरिकी मिसाइल टेस्ट के ठीक एक महीने बाद सोवियत रूस ने दुनिया को चौंका दिया. अगस्त 1957 में सोवियत सरकार ने घोषणा की कि उसने अपनी ICBM का सफल परीक्षण कर लिया है. सोवियत ऐलान में कहा गया कि मिसाइल ने बेहद कम समय में बहुत लंबी दूरी तय की और तय लक्ष्य वाले इलाके में जाकर गिरी.
हालांकि, सोवियत रूस ने इस परीक्षण से जुड़ी ज्यादा जानकारी सार्वजनिक नहीं की थी. अमेरिका में कुछ लोगों को इस दावे पर संदेह भी था. उन्हें लगता था कि सोवियत परीक्षण उतना सफल नहीं रहा होगा, जितना बताया जा रहा है. फिर भी इस ऐलान ने अमेरिका में चिंता पैदा कर दी.
उस समय तक सोवियत रूस परमाणु और हाइड्रोजन बम का भी सफल परीक्षण कर चुका था. अब अगर उसके पास लंबी दूरी तक परमाणु हथियार पहुंचाने वाली मिसाइल भी थी, तो अमेरिका का कोई भी हिस्सा संभावित हमले से पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता था.यही वजह थी कि सोवियत ICBM के सफल परीक्षण की खबर ने अमेरिका में मिसाइलों को लेकर बहस तेज कर दी.
इसे अमेरिका और सोवियत संघ के बीच मिसाइल क्षमता का अंतर कहा जाने लगा. ICBM के ऐलान के दो महीने से भी कम समय बाद सोवियत रूस ने एक और ऐसा काम किया, जिसने अमेरिका को और परेशान कर दिया. सोवियत संघ ने दुनिया का पहला सैटेलाइट स्पूतनिक अंतरिक्ष में भेज दिया.
अब अमेरिका में चिंता और गहरी हो गई. लोगों को लगने लगा कि सोवियत संघ न सिर्फ परमाणु और मिसाइल तकनीक में आगे निकल रहा है, बल्कि अंतरिक्ष की दौड़ में भी बढ़त बना रहा है.
दरअसल, एक लंबी दूरी की मिसाइल और अंतरिक्ष रॉकेट की तकनीक में कई समानताएं थीं. इसलिए स्पूतनिक की सफलता को सोवियत रूस की मिसाइल क्षमता से भी जोड़कर देखा गया.
इस तरह 1957 का वह ICBM परीक्षण सिर्फ एक मिसाइल का परीक्षण नहीं था. उसने अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हथियारों की होड़ को और तेज किया और अंतरिक्ष की दौड़ को भी नई रफ्तार दी.
यही वह दौर था जब दुनिया ने पहली बार महसूस किया कि परमाणु हथियारों से लैस मिसाइलें हजारों किलोमीटर दूर बैठे दुश्मन तक तबाही पहुंचा सकती हैं. शीत युद्ध के इतिहास में यह घटना इसलिए बेहद अहम मानी जाती है.