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Indian Railways: रेलवे ट्रैक के किनारे लगे खंभों पर नंबर क्यों लिखे होते हैं?

रेलवे ट्रैक के किनारे लगे खंभों पर लिखे नंबर सिर्फ पहचान के लिए नहीं होते. इन नंबरों की मदद से रेलवे ट्रैक की सटीक लोकेशन का पता लगाने और इमरजेंसी के समय सही जगह तक मदद पहुंचाने में आसानी होती है.

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इन नंबरों की जानकारी आम यात्रियों के लिए भी उपयोगी हो सकती है. ( Photo: ITG)
इन नंबरों की जानकारी आम यात्रियों के लिए भी उपयोगी हो सकती है. ( Photo: ITG)

अगर आपने ट्रेन से सफर किया है तो रेलवे ट्रैक के किनारे लगे खंभों पर लिखे नंबर जरूर देखे होंगे. इन खंभों पर 56/8, 90/10 या इस तरह के नंबर लिखे होते हैं. ज्यादातर लोग इन्हें देखकर सोचते हैं कि आखिर इन नंबरों का मतलब क्या है और इन्हें यहां क्यों लिखा जाता है. दरअसल, ये नंबर रेलवे के लिए बेहद जरूरी होते हैं. इनकी मदद से ट्रैक की सटीक लोकेशन का पता लगाया जाता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत मदद पहुंचाई जा सकती है.

रेलवे के इन खंभों को क्या कहते हैं?
ट्रैक के किनारे लगे इन खंभों को रेलवे की भाषा में मास्ट कहा जाता है. ये खंभे कई जगह लोहे के होते हैं, जबकि कुछ जगहों पर सीमेंट या कंक्रीट के खंभे भी दिखाई देते हैं. इनका इस्तेमाल रेलवे की बिजली व्यवस्था और ट्रैक से जुड़ी दूसरी व्यवस्थाओं में किया जाता है. इन खंभों पर लिखे नंबर केवल पहचान के लिए नहीं होते, बल्कि ये ट्रैक पर किसी खास जगह की लोकेशन बताने का काम करते हैं. आम तौर पर दो मास्ट के बीच करीब 60 मीटर की दूरी होती है. घुमावदार ट्रैक वाले हिस्सों में यह दूरी कम भी हो सकती है.

नंबर से कैसे पता चलती है जगह?
मान लीजिए किसी खंभे पर 56/8 लिखा है. ऐसे नंबर ट्रैक की दूरी और उस हिस्से में खंभे की पहचान बताने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं. यानी रेलवे कर्मचारी इस नंबर के जरिए यह पता लगा सकते हैं कि ट्रैक के किस हिस्से की बात हो रही है. यही वजह है कि ट्रेन चलाने वाले लोको पायलट के लिए ये नंबर काफी महत्वपूर्ण होते हैं. अगर उसे रास्ते में ट्रैक पर कोई खराबी दिखाई देती है तो वह संबंधित रेलवे अधिकारियों को उस जगह की जानकारी देने के लिए इस लोकेशन नंबर का इस्तेमाल कर सकता है. इससे कर्मचारियों को यह समझने में आसानी होती है कि समस्या आखिर किस जगह पर है.

हादसे से पहले मिलती है चेतावनी
कई बार रेलवे ट्रैक पर मरम्मत का काम चल रहा होता है. ऐसी स्थिति में उस हिस्से से गुजरने वाली ट्रेनों के लिए गति कम करने या अतिरिक्त सावधानी बरतने के निर्देश दिए जा सकते हैं. किलोमीटर की पहचान होने से लोको पायलट को पता रहता है कि किस जगह उसे विशेष सावधानी बरतनी है. इस तरह ये नंबर रेलवे के ट्रैक रखरखाव और ट्रेन संचालन में सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.

ट्रेन खराब हो जाए तो भी काम आता है नंबर
मान लीजिए किसी ट्रेन का इंजन खराब हो गया और ट्रेन आगे नहीं बढ़ पा रही है. ऐसी स्थिति में रेलवे अधिकारियों को ट्रेन की सही लोकेशन बताना बहुत जरूरी होता है. यहां भी ट्रैक के किनारे लगे नंबर काफी काम आते हैं. ट्रेन के लोको पायलट या ट्रेन मैनेजर संबंधित खंभे का नंबर बताकर रेलवे अधिकारियों को यह जानकारी दे सकते हैं कि ट्रेन किस जगह खड़ी है. इससे मदद और तकनीकी टीम को सही जगह भेजने में आसानी होती है.

यात्रियों के लिए भी उपयोगी हैं ये नंबर
इन नंबरों की जानकारी आम यात्रियों के लिए भी उपयोगी हो सकती है. उदाहरण के लिए, अगर सफर के दौरान आपका कोई सामान ट्रेन से बाहर गिर जाता है और आपको ट्रैक के पास का नंबर दिखाई देता है, तो उस नंबर के जरिए रेलवे को जगह की जानकारी देने में मदद मिल सकती है. इसी तरह ट्रैक के पास कोई संदिग्ध चीज या समस्या दिखाई देने पर भी लोकेशन बताने के लिए ये नंबर उपयोगी हो सकते हैं. रेलवे के लिए सबसे बड़ी बात यह है कि बिना किसी लंबे विवरण के ट्रैक के एक खास हिस्से की पहचान की जा सकती है.

अगली बार ट्रेन से सफर करें तो जरूर देखें
अगली बार जब आप ट्रेन में सफर करें तो खिड़की से बाहर रेलवे ट्रैक के किनारे लगे इन खंभों पर नजर डालिए. इन पर लिखे छोटे-छोटे नंबर देखने में भले ही सामान्य लगें, लेकिन रेलवे के लिए इनका महत्व काफी बड़ा है. ये नंबर ट्रैक की लोकेशन पहचानने, रखरखाव के काम और इमरजेंसी के समय सही जगह तक मदद पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं.

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