अगली बार जब आप कुतुब मीनार या लाल किले के सामने खड़े हों, तो एक बार जरूर सोचिएगा. इन ऐतिहासिक इमारतों के निर्माण के समय आज वाला पोर्टलैंड सीमेंट मौजूद नहीं था. जोसेफ एस्पडिन ने 1824 में पोर्टलैंड सीमेंट का पेटेंट कराया था. भारत में 1904 में मद्रास में पहला सीमेंट प्लांट शुरू हुआ, लेकिन वह व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हो सका; 1914 में गुजरात के पोरबंदर में व्यावसायिक उत्पादन वाला प्लांट शुरू हुआ. कुतुब मीनार का निर्माण 13वीं सदी की शुरुआत में हुआ, जबकि लाल किले का निर्माण 1638 में शुरू हुआ.
यानी पोर्टलैंड सीमेंट के आने से सैकड़ों साल पहले ही ये ऐतिहासिक इमारतें खड़ी हो चुकी थीं.तो सवाल लाज़िमी है-बिना सीमेंट के इतनी बड़ी और मजबूत इमारतें कैसे बन गईं, जो आज भी उतनी ही शान से खड़ी हैं?
जवाब है चूने का गारा
पुराने कारीगरों के पास आधुनिक सीमेंट नहीं था, लेकिन उनके पास निर्माण की विकसित परंपरा और तकनीक थी. पत्थरों और ईंटों को जोड़ने के लिए चूने पर आधारित मोर्टार का इस्तेमाल किया जाता था. भारत में पारंपरिक निर्माण सामग्री और संरक्षण तकनीकों पर प्रकाशित सामग्री के मुताबिक, चूने में सुर्खी (पिसी हुई ईंट), गुड़, बेल-गिरी, गोंद, उड़द दाल और बताशे जैसी स्थानीय सामग्री मिलाई जाती थी.
यह जानकारी भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की योजना में प्रकाशित लेख में भी दी गई है. वहीं, यूनेस्को के कुतुब मीनार संरक्षण रिकॉर्ड में भी 1944-49 के संरक्षण कार्यों में प्रभावित हिस्सों को लाइम मोर्टार से दोबारा जोड़े जाने का जिक्र है.
इतिहासकारों के मुताबिक, इस मिश्रण में चूना, सुर्खी यानी पिसी हुई पकी ईंट, गुड़, बताशे, उड़द दाल, बेल-गिरी और गोंद जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता था. चूने को पानी में लंबे समय तक गलने दिया जाता था, जबकि सुर्खी मोर्टार की मजबूती बढ़ाने और नमी के असर को कम करने में मदद करती थी. गुड़ और बताशे जैसे पदार्थ मिश्रण को बांधने में मदद करते थे, वहीं उड़द दाल, बेल-गिरी और गोंद जैसे प्राकृतिक पदार्थ अलग-अलग पारंपरिक मिश्रणों में एडिक्टिल के तौर पर इस्तेमाल किए जाते थे.
चूने के मोर्टार की खासियत यह है कि यह ऐतिहासिक इमारतों के पारंपरिक निर्माण तंत्र के साथ मुताबिक ही रहता है. यूनेस्को के दस्तावेज में कुतुब मीनार के संरक्षण इतिहास के दौरान लाइम मोर्टार के इस्तेमाल की भी बात कही गई है.
कुतुब मीनार में क्या लगा है?
दिल्ली की कुतुब मीनार का निर्माण 1199 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने शुरू करवाया था. इसे बनाने में मुख्य रूप से लाल और स्लेटी बलुआ पत्थर का इस्तेमाल हुआ, जबकि ऊपरी मंजिलों में बाद में संगमरमर भी जोड़ा गया.
पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए पारंपरिक चूने के मोर्टार का इस्तेमाल किया गया. इसके साथ ही पत्थरों को एक-दूसरे में फंसाकर रखने यानी इंटरलॉकिंग की तकनीक भी अपनाई गई, जिससे मीनार को अतिरिक्त मजबूती मिली.
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और लाल किला?
शाहजहां ने 1638 में लाल किले का निर्माण शुरू करवाया था, जो 1648 में बनकर तैयार हुआ. नाम से ही जाहिर है कि इसकी दीवारें ज्यादातर लाल बलुआ पत्थर से बनी हैं. इसके कुछ अंदरूनी हिस्सों में संगमरमर का भी इस्तेमाल हुआ है.यहां भी जोड़ाई के लिए चूने के गारे की पारंपरिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जो उस दौर की कई बड़ी मुगल इमारतों में प्रचलित थी.
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यह तकनीक इतनी टिकाऊ क्यों थी?
इंजीनियरों के मुताबिक, चूने के गारे में मौजूद प्राकृतिक सामग्री एक धीमी रासायनिक प्रक्रिया से गुजरती है. इससे पत्थरों के बीच एक मजबूत बॉन्ड बनता है, जो नमी को नियंत्रित करने में मदद करता है.यही वजह है कि इन इमारतों ने गर्मी-सर्दी के बदलाव, नमी और दूसरे पर्यावरणीय प्रभावों को सदियों तक झेला है.
दिलचस्प बात यह भी है कि कुछ हेरिटेज कंजर्वेशन प्रोजेक्ट्स में आज फिर से इसी तरह की पारंपरिक तकनीकों को अपनाया जा रहा है. इसकी एक वजह यह है कि चूने पर आधारित सामग्री पर्यावरण के लिहाज से अपेक्षाकृत बेहतर मानी जाती है और पुरानी इमारतों की संरचना के साथ अधिक अनुकूल हो सकती है.