26 सितंबर 1945 को वियतनाम की धरती पर पहले अमेरिकी की जान गई थी. उस वक्त अमेरिका और वियतनाम के बीच कोई युद्ध शुरू नहीं हुआ था. वहां अगस्त क्रांति का दौरा था. दुनिया भी द्वितीय विश्व युद्ध से बाहर निकल रही थी. इसी दौरान गलती से अमेरिकी अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल पीटर ड्यूई की गोली मारकर हत्या कर दी गई. उन्हें आम तौर पर वियतनाम में मारे गए पहले अमेरिकी के रूप में दर्ज किया जाता है.
ड्यूई अमेरिकी सेना के अधिकारी थे और उन्हें अमेरिका की खुफिया संस्था ऑफिस ऑफ स्ट्रैटेजिक सर्विसेज (OSS) ने वियतनाम भेजा था. उनका काम जापान के खिलाफ युद्ध के दौरान लापता हुए अमेरिकी पायलटों की तलाश करना और जापान के आत्मसमर्पण के बाद वियतनाम के हालात की जानकारी जुटाना था.
26 सितंबर 1945 को साइगॉन में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई. खास बात यह है कि यह घटना उस समय हुई, जब वियतनाम में अगस्त क्रांति के बाद सत्ता को लेकर संघर्ष चल रहा था और वियतनाम युद्ध शुरू होने में अभी करीब एक दशक बाकी था.
अगस्त 1945 में जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध में आत्मसमर्पण कर दिया था. इसी दौरान वियतनाम में हो ची मिन्ह और उनके नेतृत्व वाले वियत मिन्ह ने देश की सत्ता पर अपना दावा किया.
वियत मिन्ह का कहना था कि वह वियतनाम का वैध प्रतिनिधि है. लेकिन मामला इतना आसान नहीं था. वियतनाम पर लंबे समय से फ्रांस का औपनिवेशिक शासन रहा था और फ्रांसीसी अधिकारी दोबारा अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहते थे.
जापानी सेना ने युद्ध के दौरान कई फ्रांसीसी सैनिकों को निहत्था करके कैद कर लिया था. जापान के हारने के बाद फ्रांसीसी अधिकारियों ने फिर से ताकत हासिल करने की कोशिश शुरू कर दी. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मित्र देशों ने जापानी सैनिकों को निहत्था करने के लिए अलग-अलग इलाकों की जिम्मेदारी तय की थी.
पॉट्सडैम कॉन्फ्रेंस के फैसले के मुताबिक, वियतनाम में 16वीं समानांतर रेखा के दक्षिण में मौजूद जापानी सैनिकों को निहत्था करने की जिम्मेदारी ब्रिटिश सेना को दी गई थी. दक्षिणी वियतनाम में ब्रिटिश मेजर जनरल डगलस डी. ग्रेसी पहुंचे. उन्होंने वियत मिन्ह को सत्ता में स्वीकार नहीं किया.
फ्रांसीसी सैनिकों को दोबारा हथियार दिए गए ताकि वे ब्रिटिश सेना के साथ मिलकर इलाके में व्यवस्था संभाल सकें. इसके बाद फ्रांसीसी और ब्रिटिश सैनिकों ने साइगॉन में वियत मिन्ह के कब्जे वाले कुछ सरकारी दफ्तरों से उन्हें बाहर कर दिया.
इसी दौरान अमेरिकी अधिकारी पीटर ड्यूई भी साइगॉन में मौजूद थे. वह वियत मिन्ह के प्रति सहानुभूति रखते थे. ड्यूई को लगता था कि वियत मिन्ह में ऐसे राष्ट्रवादी भी शामिल हैं जो वियतनाम पर फ्रांस का दोबारा औपनिवेशिक शासन नहीं चाहते.
उनकी यह सोच ब्रिटिश कमांडर ग्रेसी से मेल नहीं खाती थी. ड्यूई खुले तौर पर अपनी राय रखने वाले अधिकारी थे और जल्द ही उनके और ब्रिटिश नेतृत्व के बीच मतभेद बढ़ गए. आखिरकार ग्रेसी ने ड्यूई को इंडोचाइना छोड़ने का आदेश दे दिया.
26 सितंबर 1945 को ड्यूई एयरपोर्ट के लिए निकले. उनके साथ एक अन्य OSS अधिकारी कैप्टन हेनरी ब्लूचेल भी थे. रास्ते में उन्हें वियत मिन्ह के तीन लड़ाकों ने एक चेकपोस्ट पर रोकने की कोशिश की. ड्यूई ने रुकने से इनकार कर दिया. उन्होंने फ्रेंच भाषा में उन लोगों पर चिल्लाकर जवाब दिया.
इसके बाद वहां मौजूद लोगों ने गोली चला दी. ड्यूई को गोली लगी और उनकी मौके पर ही मौत हो गई. उनके साथ मौजूद कैप्टन ब्लूचेल बच निकले और पैदल वहां से चले गए. बाद में सामने आया कि वियत मिन्ह के लड़ाकों ने ड्यूई को फ्रांसीसी समझकर उन पर गोली चलाई थी.
यानी जिस अधिकारी की हत्या हुई, वह अमेरिका और वियतनाम के बीच किसी युद्ध में लड़ते हुए नहीं मारा गया था. उस समय अमेरिका और वियतनाम के बीच वह युद्ध शुरू भी नहीं हुआ था, जिसे बाद में दुनिया वियतनाम युद्ध के नाम से जानेगी.पीटर ड्यूई की मौत को आम तौर पर वियतनाम में मारे गए 'पहले अमेरिकी' के तौर पर दर्ज किया जाता है.