गर्मी का मौसम और कुल्फी. लेकिन कल्पना कीजिए उस समय की, जब न बिजली थी, न फ्रिज और न कोई मशीन. फिर भी भारत में लोग कुल्फी का मजा कैसे लेते थे? सवाल ये है कि दिल्ली-आगरा की भयंकर गर्मी में बिना फ्रिज के आखिर कुल्फी जमाई कैसे जाती थी?
मुगल बादशाहों के लिए बर्फ कोई साधारण चीज नहीं थी. आइन-ए-अकबरी में इसका जिक्र मिलता है. अकबर के समय हिमालय के पहाड़ी इलाकों, कश्मीर, हिमाचल और गढ़वाल से बर्फ मंगवाई जाती थी.
लेकिन सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करके बर्फ दिल्ली तक पहुंचती कैसे थी? इसके लिए पूरी व्यवस्था थी. बर्फ को बड़े-बड़े ब्लॉक्स में काटा जाता, साफ कपड़े, जूट और भूसे में अच्छी तरह लपेटा जाता. घोड़ों, हाथियों और नावों के जरिए रिले सिस्टम से पहुंचाया जाता. रास्ते में कुछ बर्फ पिघलती जरूर थी, लेकिन इंसुलेशन की वजह से काफी मात्रा बच जाती थी.
सिर्फ पहाड़ों पर निर्भर नहीं थे
सारी बर्फ पहाड़ों से नहीं आती थी. सर्दियों की ठंडी और साफ रातों में लोग खुद भी बर्फ बना लेते थे. उथले मिट्टी के बर्तनों में पानी भरकर उन्हें खुले आसमान के नीचे सूखी घास या पुआल पर रख दिया जाता था. रातभर ठंडक के कारण पानी की ऊपरी परत जम जाती थी. सुबह उसे इकट्ठा करके खास बर्फघरों में स्टोर कर लिया जाता था.
बर्फघर-गर्मी से बचाने का कमाल
बर्फ को महीनों तक बचाकर रखना सबसे बड़ी चुनौती थी. इसके लिए खास भूमिगत कमरे बनाए जाते थे. उनकी दीवारें मोटी होती थीं और अंदर भूसे, राख या कपड़ों की परतों का इस्तेमाल किया जाता था. इससे बाहर की गर्मी अंदर तक आसानी से नहीं पहुंच पाती थी. यह तरीका कुछ हद तक आज के थर्मस या इंसुलेटेड बॉक्स की तरह काम करता था.
बर्फ तो आ गई, लेकिन कुल्फी कैसे जमती थी?
सबसे पहले दूध को धीमी आंच पर घंटों पकाया जाता था, ताकि वह गाढ़ा और क्रीमी हो जाए. इसमें चीनी, केसर, इलायची और पिस्ता डालकर स्वाद दिया जाता था. फिर इस मिश्रण को धातु के लंबे सांचों में भरकर बंद कर दिया जाता था.
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नमक मिलाने से बर्फ का हिमांक नीचे चला जाता है. इससे बर्फ और नमक का मिश्रण शून्य डिग्री सेल्सियस से भी कम तापमान तक पहुंच सकता है. कुल्फी के सांचों को इसी बेहद ठंडे मिश्रण से भरे बड़े मटके में रखा जाता था. धातु ऊष्मा की अच्छी चालक होती है, इसलिए सांचे के अंदर मौजूद मिश्रण की गर्मी बाहर निकलती जाती थी और कुल्फी धीरे-धीरे जम जाती थी.
कई बार सांचों को हल्का हिलाया या घुमाया भी जाता था, ताकि कुल्फी समान रूप से जमे. कुल्फी को सामान्य आइसक्रीम की तरह फेंटकर उसमें हवा नहीं भरी जाती. यही वजह है कि इसका टेक्सचर आइसक्रीम की तुलना में ज्यादा घना और मलाईदार होता है.
शोरा का भी था रोल
सिर्फ नमक ही नहीं, शोरा यानी पोटैशियम नाइट्रेट का भी इस्तेमाल चीजों को ठंडा करने के लिए किया जाता था. पानी में घुलने की प्रक्रिया के दौरान यह आसपास से गर्मी सोखता है, जिससे तापमान कम हो सकता है. आइन-ए-अकबरी में भी शोरे के जरिए पानी को ठंडा करने की तकनीक का जिक्र मिलता है.
कुल्फी की शुरुआत कहां से हुई?
कुल्फी के मौजूदा रूप का विकास मुगलकालीन भारत से जोड़ा जाता है, खासकर 16वीं सदी से. हालांकि, इसके शुरुआती विचार पर फारसी और मध्य एशियाई खानपान की परंपराओं का प्रभाव माना जाता है. भारत में दूध को गाढ़ा करने की परंपरा पहले से मौजूद थी. माना जाता है कि मुगलकाल में शीतलन की तकनीकों और अलग-अलग पाक परंपराओं के मेल से कुल्फी का पारंपरिक रूप विकसित हुआ.
अगली बार जब आप कुल्फी खाएं, तो याद कीजिए कि यह सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि सदियों पुराने ज्ञान, तकनीक, धैर्य और स्वाद का कमाल भी है. बिना फ्रिज के भी लोग ठंडक का इंतजाम करना जानते थे. शायद यही वजह है कि पारंपरिक तरीके से बनी कुल्फी का स्वाद और टेक्सचर आज भी सामान्य आइसक्रीम से अलग महसूस होता है.