दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा 828 मीटर ऊंची है. अब सऊदी अरब जेद्दा टावर के जरिए 1 किलोमीटर से भी ऊंची इमारत बनाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन क्या इंसान इससे भी कई गुना ऊंची इमारत बना सकता है? इस सवाल का जवाब खुद बुर्ज खलीफा के मुख्य स्ट्रक्चरल इंजीनियर बिल बेकर ने दिया है. अरबियन बिजनेस की रिपोर्ट के मुताबिक, बुर्ज खलीफा के चीफ स्ट्रक्चरल इंजीनियर बिल बेकर का मानना है कि इंसान की इंजीनियरिंग क्षमता अभी अपनी अंतिम सीमा तक नहीं पहुंची है.
बिल बेकर के मुताबिक, मौजूदा समय में सबसे बड़ी चुनौती तकनीक नहीं है. इंजीनियरों के पास ऐसी ऊंची इमारतें डिजाइन करने की क्षमता मौजूद है. असली सवाल यह है कि क्या इतनी ऊंची इमारत बनाना आर्थिक रूप से फायदेमंद होगा और क्या उसमें रहने या काम करने वाले लोगों को उससे वास्तविक लाभ मिलेगा. यानी अब बहस ऊंचाई की नहीं, बल्कि उसकी जरूरत की है.
1 किलोमीटर नहीं, कई किलोमीटर तक जा सकती है ऊंचाई
बेकर का कहना है कि आज उपलब्ध तकनीक और भविष्य में विकसित होने वाली अल्ट्रा-हाई स्ट्रेंथ कंक्रीट जैसी नई निर्माण सामग्री के साथ कई किलोमीटर ऊंचे टावर बनाना सैद्धांतिक रूप से संभव है. अगर नई सामग्री पहले से ज्यादा मजबूत और हल्की हुई, तो इमारतों की ऊंचाई बढ़ाने में और आसानी होगी. यानी इंजीनियरिंग के लिहाज से इंसान अभी अपनी सीमा से काफी दूर है. वो ऐसा कर भी सकता है.

हवा सबसे बड़ा दुश्मन क्यों बन जाती है?
बुर्ज खलीफा के चीफ स्ट्रक्चरल इंजीनियर बिल बेकर के मुताबिक, गगनचुंबी इमारतों में सबसे बड़ी चुनौती उनका वजन नहीं, बल्कि तेज हवाएं होती हैं. जैसे-जैसे इमारत की ऊंचाई बढ़ती है, हवा का दबाव और उसकी ताकत भी बढ़ने लगती है. इससे इमारत में झुकाव, कंपन और अस्थिरता का खतरा पैदा हो सकता है.
यही वजह है कि सुपरटॉल इमारतों को डिजाइन करते समय विंड लोड सबसे अहम फैक्टर माना जाता है. इंजीनियर इमारत का आकार, ढांचा और बाहरी डिजाइन इस तरह तैयार करते हैं कि हवा का बहाव टूट जाए और दबाव कम हो. बुर्ज खलीफा का सीढ़ीनुमा डिजाइन भी इसी सोच का नतीजा है, जिससे तेज हवा सीधे पूरी इमारत पर असर नहीं डाल पाती और उसकी स्थिरता बनी रहती है.
इसके साथ ही इंजीनियरों ने 'बट्रेस्ड कोर' नाम की नई संरचनात्मक प्रणाली विकसित की, जो पूरी इमारत को मजबूती देती है और उसे तेज हवाओं के बीच भी स्थिर बनाए रखती है. इसी तकनीक ने सुपरटॉल इमारतों के निर्माण में नया रास्ता खोला. बट्रेस्ड कोर एक खास स्ट्रक्चरल डिजाइन सिस्टम है, जिसे दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा के लिए विकसित किया गया था. इस डिजाइन में इमारत के बीच में एक बेहद मजबूत कंक्रीट कोर बनाया जाता है, जिसके चारों ओर तीन पंख (विंग) जैसी संरचनाएं होती हैं. ये तीनों हिस्से एक-दूसरे को सहारा देते हैं, इसलिए इसे 'बट्रेस्ड कोर' यानी सहारा देने वाला केंद्रीय ढांचा कहा जाता है.
इस डिजाइन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह इमारत का पूरा वजन संतुलित तरीके से नींव तक पहुंचाता है और तेज हवाओं या भूकंप के दौरान इमारत को ज्यादा हिलने-डुलने से बचाता है. इसी वजह से बुर्ज खलीफा जैसी 828 मीटर ऊंची इमारत को सुरक्षित और स्थिर बनाना संभव हो पाया.
ऊंची इमारत की अपनी चुनौतियां
बिल बेकर का मानना है कि भविष्य में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि दुनिया कितनी ऊंची इमारत बना सकती है. असली चुनौती यह होगी कि इतनी ऊंची इमारत लोगों के लिए कितनी सुविधाजनक और उपयोगी साबित होगी. ऊंचाई बढ़ने के साथ लिफ्ट सिस्टम, आपातकालीन निकासी, रखरखाव, ऊर्जा की खपत, निर्माण लागत और कार्बन उत्सर्जन जैसी चुनौतियां भी बढ़ जाती हैं. इसलिए भविष्य की गगनचुंबी इमारतों में सिर्फ ऊंचाई नहीं, बल्कि टिकाऊ विकास पर भी ध्यान देना होगा.
सिर्फ ऊंचाई नहीं, शहर की पहचान भी बदलती है
बेकर का कहना है कि बुर्ज खलीफा ने यह साबित किया कि एक सुपरटॉल इमारत किसी शहर की तस्वीर बदल सकती है. इसके बनने के बाद दुबई में पर्यटन, विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय पहचान में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई. दुनिया भर के पर्यटक सिर्फ इस इमारत को देखने के लिए दुबई पहुंचते हैं. हालांकि उनका मानना है कि भविष्य में ऐसी इमारतों की सफलता सिर्फ उनकी ऊंचाई से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि वे लोगों के जीवन, पर्यावरण और शहर के विकास में कितना योगदान देती हैं.