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अफसरों के तबादलों में 12 साल से तोड़े जा रहे नियम? उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों के तबादलों में 12 साल से नियम टूटने के आरोप वाली याचिका पर केंद्र और राज्य सरकार से दो हफ्ते में जवाब मांगा है. याचिका में कहा गया है कि तय कार्यकाल, बोर्ड की सिफारिश और संपत्ति जांच जैसे नियम कागजों तक सिमट गए.

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अफसरों के ट्रांसफर को लेकर हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाई है. (Photo: Representational)
अफसरों के ट्रांसफर को लेकर हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाई है. (Photo: Representational)

नैनीताल स्थित उत्तराखंड हाईकोर्ट ने IAS, IPS और IFS अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग में नियमों के उल्लंघन के आरोपों वाली जनहित याचिका पर केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा है. सोमवार को हुई सुनवाई में कोर्ट ने दोनों पक्षों को दो हफ्ते के भीतर काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया. मामले को तीन हफ्ते बाद फिर सुनवाई के लिए लगाया गया है.

यह PIL बागेश्वर के सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक मंच से जुड़े पंकज पांडे ने दाखिल की है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि उत्तराखंड में 12 साल से ज्यादा समय से अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग में सुप्रीम कोर्ट के फैसले और कैडर नियमों का ठीक से पालन नहीं किया गया.

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2013 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

याचिका में 31 अक्टूबर 2013 के सुप्रीम कोर्ट के T.S.R. सुब्रमण्यम बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले का हवाला दिया गया है. इस फैसले में केंद्र और राज्यों को सिविल सर्विस बोर्ड बनाने और अधिकारियों को कम से कम दो साल का कार्यकाल देने की बात कही गई थी.

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इसके बाद 28 जनवरी 2014 को केंद्र ने कैडर नियमों में बदलाव किया. इन नियमों के मुताबिक ट्रांसफर और पोस्टिंग के लिए बोर्ड की सिफारिश जरूरी है और सामान्य तौर पर दो साल का न्यूनतम कार्यकाल होना चाहिए.

अफसरों के समय से पहले ट्रांसफर का आरोप

PIL में दावा किया गया है कि उत्तराखंड में कई IAS अधिकारियों के ट्रांसफर मौखिक निर्देशों पर किए गए और बाद में इन आदेशों को मंजूरी दी गई. याचिका में यह भी कहा गया कि कई समय से पहले किए गए ट्रांसफर में पर्याप्त वजह दर्ज नहीं की गई और केंद्र को इसकी तिमाही रिपोर्ट भी नहीं भेजी गई.

IPS अधिकारियों को लेकर याचिका में कहा गया है कि प्रस्तावित सिविल सर्विस बोर्ड लागू नहीं हुआ और पोस्टिंग की प्रक्रिया पुलिस एस्टैब्लिशमेंट बोर्ड के जरिए चलती रही. वहीं IFS मामलों में बोर्ड के सामने प्रस्ताव रखने की प्रक्रिया कई बार सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई और ट्रांसफर की वजहें दर्ज नहीं की गईं.

प्रॉपर्टी रिटर्न पर भी सवाल

याचिका में अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की चल-अचल संपत्ति की जानकारी यानी प्रॉपर्टी रिटर्न को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. आरोप है कि यह प्रक्रिया महज औपचारिकता बन गई है, जबकि ऑल इंडिया सर्विसेज कंडक्ट रूल्स के तहत सरकारों के पास अधिकारियों की संपत्तियों और उनके स्रोत की जांच करने की शक्ति है.

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PIL में कुछ अधिकारियों के मामलों का भी जिक्र किया गया है. इनमें IPS अधिकारी प्रमेंद्र सिंह डोबाल, पूर्व IAS अधिकारी एस. राजू, IPS अधिकारी बरिंदरजीत सिंह और IFS अधिकारी रंजन कुमार मिश्रा शामिल हैं.

याचिका में यह भी कहा गया कि बागेश्वर में चार साल में पांच DM और पांच SP बदले गए. याचिकाकर्ता का कहना है कि बार-बार ट्रांसफर से विकास कार्य और कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है.

PIL में मांग की गई है कि ट्रांसफर और पोस्टिंग सिर्फ सिविल सर्विस बोर्ड की सिफारिश पर हों, नियम से हटकर किए गए फैसलों की वजह दर्ज की जाए और जनवरी 2014 के बाद हुए सभी समय से पहले ट्रांसफर की समीक्षा की जाए.

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