उत्तराखंड के धर्मनगरी हरिद्वार में गंगा की वार्षिक बंदी यानी नहर बंद होने के साथ ही एक बार फिर अनोखा नजारा देखने को मिल रहा है. सूखी गंगनहर और नदी तल में धन संपदा और खजाना ढूंढने वालों की मौज आ गई है. बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और तलाशकर्ता सुबह से शाम तक यानी 8-8 घंटे तक सूखी नहर की रेती और पत्थरों के बीच खोजबीन कर रहे हैं. मान्यता और परंपरा के अनुसार, सालभर देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु मां गंगा में श्रद्धा स्वरूप सिक्के, आभूषण और धातुएं अर्पित करते हैं, जिन्हें तलाशने के लिए यह लोग सालभर इस वार्षिक बंदी का इंतजार करते हैं.
दरअसल, हरिद्वार से उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात तक जाने वाली उत्तरी खंड गंगनहर को वार्षिक रखरखाव, सिल्ट सफाई और घाटों की मरम्मत के लिए दशहरे की रात्रि में बंद कर दिया गया था. उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग द्वारा इन दिनों नहरों की साफ-सफाई का कार्य किया जा रहा है.
अब गंगा का पानी 7-8 नवंबर की रात्रि को वापस लौटेगा. इस अवधि के दौरान हर की पौड़ी के ब्रह्म कुंड घाट से लेकर अस्थि प्रवाह घाट, नाई घाट, सुभाष घाट और मालवीय घाट तक हजारों लोग सूखी गंगनहर के बीच उतर आए हैं. ये वे लोग हैं जिनकी आजीविका का एक बड़ा हिस्सा इसी विशेष अवसर पर निर्भर करता है.
सोना, चांदी और सिक्कों की तलाश में जुटे परिवार
रेत और पत्थरों के बीच धातु और सिक्के ढूंढ रहे स्थानीय लोगों पन्नालाल, शुभम, राजा और विशु ने बताया कि यह काम काफी कठिन और मेहनत भरा होता है. उनका कहना है कि जो जितनी मेहनत करता है, मां गंगा उसे उतना ही फल देती है. देखें VIDEO:-
क्या-क्या मिलता है?
सूखी नहर में तलाश के दौरान तांबा, पीतल, भारी मात्रा में सिक्के और कई बार भाग्य साथ देने पर सोने-चांदी के आभूषण तक मिल जाते हैं.
गुजर-बसर का जरिया
इन लोगों का कहना है कि गंगा बंद होने के बाद जो भी कीमती धातु या सिक्के मिलते हैं, उसी से उनके परिवार का सालभर का गुजर-बसर चलता है. दीपावली के बाद जब नहर में पानी दोबारा छोड़ दिया जाएगा, तब यह तलाश बंद हो जाएगी.
स्वच्छता में भी मिल रहा है सहयोग
विशेषज्ञों का मानना है कि इन लोगों की इस खोजबीन से एक तरफ जहां गरीब परिवारों को आजीविका का संबल मिलता है, वहीं दूसरी ओर गंगनहर और घाटों के तल की प्राकृतिक सफाई भी हो जाती है. प्रशासन और सिंचाई विभाग के रखरखाव कार्यों के साथ-साथ यह स्थानीय गतिविधि हर साल चर्चा का विषय बनी रहती है.