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...जब DMK और AIADMK के विलय पर एमजीआर ने फेर दिया था पानी

तमिलनाडु की राजनीति में डीएमके और एआईएडीएमके के विलय के बारे में आज के प्रतिस्पर्धी दौर में कोई सोच भी नहीं सकता. लेकिन 1979 में दोनों दलों के विलय का एक असफल प्रयास खुद डीएमके प्रमुख करुणानिधि ने किया था.

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करुणानिधि के साथ एम जी रामचंद्रन, फाइल फोटो
करुणानिधि के साथ एम जी रामचंद्रन, फाइल फोटो

डीएमके के दिवंगत नेता एम करुणानिधि के 60 साल के राजनीतिक जीवन में वैसे तो कई बड़े घटनाक्रम रहे हैं. लेकिन उनके राजनीतिक सफर के दो मौके- पहला 1972 में डीएमके से एम जी रामचंद्रन (एमजीआर) का बेदखल होना और दूसरा 1979 में एआईएडीएमके का डीएमके में विलय का प्रयास अहम हैं.

जी हां आज के दौर में लगभग असंभव से लगने वाले इस प्रयास को पूर्व केंद्रीय मंत्री और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के पिता बीजू पटनायक ने 1979 में लगभग संभव कर दिया था. यह वो दौर था जब केंद्र में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी और राज्यों की राजनीति में अनिश्चितता थी. इस दौर में राज्यों की स्वायतता को लेकर करुणानिधि एक मुखर पैरोकार थे.

बता दें कि अभिनेता से नेता बने एमजीआर ने 1972 में करुणानिधि से मतभेद के चलते एआईएडीएमके की स्थापना की थी. पार्टी की स्थापना के पांच साल बाद ही एमजीआर की एआईएडीएमके तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज हो गई. एमजीआर ने केंद्र में चरण सिंह सरकार का समर्थन किया था और जब अगला चुनाव सिर पर था तब इंदिरा गांधी संभावित वापसी को देखते हुए एमजीआर उनके संपर्क में आ गए. लेकिन जब इंदिरा और एमजीआर की प्रस्तावित बैठक संभव नहीं हो पाई तब चरण सिंह सरकार में मंत्री रहे बीजू पटनायक ने डीएमके और एआईएडीएमके के विलय का प्रस्ताव रखा.

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पटनायक के इस प्रस्ताव पर जब करुणानिधि ने पूछा कि इसके पीछे कौन है? तब पटनायक ने जवाब दिया कि एमजीआर ऐसा चाहते हैं और इस पर आपकी राय क्या है यह भी जानना चाहते हैं. करुणानिधि इस शर्त पर तैयार हो गए कि डीएमके का नाम बरकरार रहेगा वहीं पार्टी का झंडा एआईएडीएमके का होगा. करुणानिधि का यह भी कहना था कि विलय के बाद एमजीआर मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं जबकि पार्टी की कमान करुणानिधि के पास रहेगी. जिसके बाद पटनायक ने चेपक गेस्ट हाउस में दोनों दलों के प्रमुखों की मीटिंग करवाई.

इस मौके पर डीएमके के महासचिव के अनबझगन और एआईएडीएमके के महासचिव वी आर नेदुनचेझियान व पी रामचंद्रन मौजूद थे. जबकि के बीच बंद कमरे में बैठक हुई. दोनों नेताओं ने एक समझौते पर सहमत होने के बाद पार्टी कार्यकारिणी की एक आपात बैठक बुलाने का निर्णय लिया जिसमें दोनों दलो के विलय संबंधी प्रस्ताव पारित होना था.

लेकिन कुछ ही घंटों बाद एमजीआर के विचार बदल गए जब वेल्लौर की एक जनसभा में एमजीआर ने तो मंच से विलय के संबंध में कुछ नहीं कहा लेकिन एआईएडीएमके के अन्य नेताओं ने डीएमके की आलोचना की. इसी के साथ विलय का यह अध्याय भी समाप्त हो गया.

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एमजीआर के साथ हुई इस बैठक के 30 साल बाद साल 2009 में करुणानिधि ने एक अवसर पर यह खुलासा किया था कि एमजीआर के कैबिनेट मंत्री ने ही विलय के मंसूबों पर पानी फेर दिया. करुणानिधि ने यह भी कहा था कि उन्हें शक है कि एमजीआर के बैठक से वेल्लौर जनसभा में जाने के बीच ही ऐसा हुआ होगा.

इस बैठक में मौजूद रहे एआईएडीएमके नेता पी रामचंद्रन ने दावा किया कि उन्होने ही एमजीआर के विचार यह कहकर बदल दिए कि दोनों दलों के विलय के उपरान्त एआईएडीएमके कैडरों का कोई महत्व नहीं रह जाएगा. रामचंद्रन की यह बात एमजीआर के समझ में आ गई और उन्होने विलय का विचार त्याग दिया.

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