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व्यंग्य: सिर्फ किस्सों में क्यों मिलते हैं ये किरदार?

अरविंद केजरीवाल को एक रोज नाके पर एक भिखारी ने पांच रुपये दे डाले या किसी बच्चे ने गुल्लक से निकाल सात हजार रुपये का चंदा दे डाला, ऐसी बातें सुन अक्सर मैं खुद को बड़ा दुर्भाग्यशाली समझता हूं, क्योंकि हमारे आस-पास ऐसे किरदार नहीं दिखते.

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अरविंद केजरीवाल को एक रोज नाके पर एक भिखारी ने पांच रुपये दे डाले या किसी बच्चे ने गुल्लक से निकाल सात हजार रुपये का चंदा दे डाला, ऐसी बातें सुन अक्सर मैं खुद को बड़ा दुर्भाग्यशाली समझता हूं, क्योंकि हमारे आस-पास ऐसे किरदार नहीं दिखते.

चुनावी खबरों के बीच जब पता चलता है कि कोई ऑटोवाला बिना पैसे लिए फलां पार्टी का प्रचार कर रहा है, तो मन करता है पकड़कर चौक के सारे ऑटोवालों को दिखाऊं कि एक वो है और एक तुम जो बीस रुपये ज्यादा लेने के लिए बीच सड़क पर बांह चढ़ा लेते हो. दो सवारियों का किराया ज्यादा वसूलने को मुझे मवेशी सा ठूस देते हो. अंटी में बंधे होने पर भी जब फुटकर तीन रुपये देने में ऑटोवाले को बारहां सोचते देखता हूं, तो उन ऑटोवालों को प्रणाम करने का दिल करता है, जो पैसों की परवाह नहीं करते.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ राजनीति से जुड़े किस्सों के किरदार हमारी असल जिन्दगी से गायब हैं. एक होते हैं रऊफ चाचा, जिनकी मोहल्ले में किसी से नहीं बनती. बच्चे तक न झेले जाते, क्योंकि बेटा दंगों में मारा गया, पर एक रोज लिखने वाले के सामने किसी बच्चे की हरकतों पर वो सब भुला बैठते हैं. अंत में उनकी आंखें भीग जाती हैं. सेक्युलर तड़के के लिए बच्चे को हिन्दू बता दिया जाता है. ऐसे ही किसी रोज कोई आवारा जानवर इंसानियत दिखा जाता है और अंत में लेखक की आंखें भीग जाती हैं.

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आप यकीन न करेंगे, पर अंत में अगर 'आंखें भीग गईं' न लिखा हो, तो हमें पता ही न चले किस्सा कब खत्म हुआ. मानव मन की गहराइयों से खुरचन कदाचित इसलिए भी न निकल पाती है, क्योंकि असल जिन्दगी में रऊफ चाचा बीड़ी पी-पी धुंआ छोड़ रहे होते हैं, इसलिए बच्चे उधर फटकते नहीं और जानवर आजकल नगर निगम वाले उठा लेते हैं.

भाव-विह्वल तो मैं नारी-विमर्श पढ़कर हो जाता हूं. लेखक के सामने किसी युवती को छेड़ा जा रहा होता है और वो सहसा प्रतिकार कर उठती है या जब सब चुप मारकर बैठे होते हैं, तभी कोई सयानी महिला बुरे के खिलाफ उठ खड़ी होती है. ऐसे किस्सों में अगला अपनी कायरता स्वीकार भी करता है और लगे हाथ कारण बता जस्टिफाई भी कर डालता है. शोषक के प्रति आक्रोश लिए जब किस्सा नारी शक्ति को प्रणाम कर खत्म होता है, तो सवाल उठता है कि जब लिखने वाले ने यहां इतनी कलम चला दी, तो मौके पर जुबान क्यों न चला दी थी? मेहनत बचती और अफसोस भी न रहता.

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