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उधमपुर हमले के शहीदों को अंतिम सलामी देने में भी नजर आया सियासी भेदभाव

उधमपुर हमले में शहीद हुए जवानों को अंतिम सलामी देने में सियासी फर्क साफ नजर आया. कॉन्स्टेबल रॉकी के अंतिम संस्कार में सरकार की ओर से कोई मंत्री नहीं पहुंचा, जबकि शुभेंदु रॉय को खुद सीएम ममता बनर्जी ने आख‍िरी विदाई दी.

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जम्मू में शहीद रॉकी और शुभेंदु रॉय को श्रद्धांजलि दी गई थी (फाइल)
जम्मू में शहीद रॉकी और शुभेंदु रॉय को श्रद्धांजलि दी गई थी (फाइल)

उधमपुर हमले में शहीद हुए जवानों को अंतिम सलामी देने में सियासी फर्क साफ नजर आया. कॉन्स्टेबल रॉकी के अंतिम संस्कार में सरकार की ओर से कोई मंत्री नहीं पहुंचा, जबकि शुभेंदु रॉय को खुद सीएम ममता बनर्जी ने आख‍िरी विदाई दी.

हमले में 44 जवानों की जान बचाने वाले में न तो केंद्र सरकार, न ही हरियाणा सरकार के किसी मंत्री ने शहीद को आखिरी विदाई देने की जहमत उठाई.

की कहानी को बड़े गर्व से बताते रहे, उसी जवान रॉकी के अंतिम संस्कार में जाने की किसी मंत्री को फुरसत नहीं मिली. आतंकियों से अकेले लोहा लेने वाले शहीद रॉकी को यमुनानगर में गांव में अंतिम विदाई दी गई. लेकिन इस मौके पर स्थानीय विधायक के अलावा कोई मौजूद नहीं था.

दूसरी ओर, उधमपुर हमले में शहीद हुए दूसरे जवान शुभेंदु रॉय के पार्थिव शरीर को जब दिल्ली से बागडोगरा हवाईअड्डे पर लाया गया, तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद मौजूद थीं. उन्होंने शहीद शुभेंदु की वीरता को सलाम किया.

आपको बता दें कि शहीद रॉकी ने अकेले अपने दम पर 44 लोगों की जान बचाई थी. लेकिन उसी शहीद को सलाम करने के लिए न केंद्र, न राज्य सरकार किसी के मंत्री को वक्त मिला. शायद इसीलिए राकी का परिवार आज गुस्से में है.

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सवाल उठता है कि शहीद-शहीद में फर्क क्यों किया गया? अगर ममता बनर्जी शहीद शुभेंदु को सम्मान देने जा सकती हैं, तो हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर शहीद को अंतिम विदाई देने का वक्त क्यों नहीं निकाल सके? अगर सीएम साहब किसी दूसरे काम में व्यस्त भी थे, तो सरकार के किसी दूसरे मंत्री को अंतिम संस्कार में शामिल होने के निर्देश क्यों नहीं दिए गए? ये किसी शहीद की शहादत का अपमान नहीं है, तो और क्या है?

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