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आंखो देखी: 6 साल के नन्हे अमृत ने उठाई देश के लिए आवाज, छात्रों के विरोध प्रदर्शन की अनोखी कहानी

दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों पर हुए लाठीचार्ज के विरोध में चंडीगढ़ में पांच दिनों तक प्रदर्शन चला. यहां अलग ही नज़ारा देखने को मिला. एक छह वर्षीय बच्चा भी अपने पिता के कंधे पर बैठकर इस प्रदर्शन में पहुंचा.

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छात्रों का प्रदर्शन
छात्रों का प्रदर्शन

दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक और प्रदर्शनकारी छात्रों पर लाठीचार्ज के विरोध में चंडीगढ़ के सेक्टर 17 स्थित प्लाजा में पांच दिन तक आंदोलन चला. आंदोलन के दौरान चंडीगढ़ के सेक्टर 17 में अलग-अलग तस्वीरें देखने को मिली. चंडीगढ़ के सेक्टर 17 में एक छह वर्षीय प्रतिभागी अपने पिता के कंधे पर बैठकर आया था. ये नजारा सबसे खास था. उसने हाथों में पोस्टर भी पकड़े थे. 

इस विरोध प्रदर्शन में सबसे कम उम्र के प्रतिभागी अमृत पासवान को उसके पिता अमरजीत पासवान यहां लाए थे. उसके पिता पेशे से बैंकर हैं. अमरजीत पासवान ने कहा कि वह अपने बेटे को यहां इसलिए लाए हैं, ताकि अभी से उनका बेटा अपनी बात कहना और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को समझे.  

अमरजीत ने कहा, "जब कुछ गलत हो, तो इंसान को आवाज उठानी चाहिए. मैं उसे यहां इसलिए लाया, ताकि वह समझ सके कि विरोध क्या होता है. वह अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के बारे में जान सके."
  
नन्हें अमृत के लिए यह पहला विरोध प्रदर्शन था. अपने आस-पास लगे पोस्टरों को देखते हुए उसकी आंखों में उत्सुक्ता झलक रही थी. प्लेकार्ड पर लिखे शब्दों और 'भगत सिंह' के पोस्टर्स को लेकर उसके मन में काफी सवाल उमड़-घुमड़ रहे थे. अमरजीत ने कहा कि उनकी कोशिश है कि वो अपने बेटे को यह दिखा पाएं कि असली विरोध आखिर होता कैसा है. यह लोगों को दिखाई देने वाली तस्वीरों और कहानियों से अलग होता है.

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उन्होंने कहा, "हम विरोध प्रदर्शनों के बारे में सिर्फ अलग-अलग तरह की बातें सुनते हैं. मैं चाहता था कि वह खुद ये अनुभव ले कि असली विरोध होता कैसा है, जहां लोग बिना जाति-धर्म का भेदभाव किए एक जगह एकत्रित होते हैं. जैसा यहां देखने को मिला." 

चंडीगढ़ में हुए इस विरोध प्रदर्शन में सामाजिक कार्यकर्ता, वकील, नेता, क्षेत्रीय हस्तियां सब शामिल हुए... अलग-अलग स्कूल-कॉलेज के छात्रों ने इसमें बढ-चढ़कर हिस्सा लिया. 'हमें न्याय चाहिए', 'पेपर लीक बंद करो', ऐसे नारे पांच दिनों तक चंडीगढ़ के प्लाज़ा पर गूंजते रहे. 

प्रदर्शनकारियों ने पुलिस को भेंट किए फूल

सेक्टर 17 में प्रदर्शनकारियों के स्वागत में रंगीन चॉक से स्केच बनाया गया. क्रांति के कई नारे गूंजे. प्रदर्शनकारी अपनी रचनात्मकता दिखाने से कहीं पीछे नहीं हटे. चार दिनों के प्रदर्शन के बाद, पांचवे दिन का माहौल उत्साहपूर्ण रहा. प्रदर्शनकारियों ने संयम बरतने और लाठीचार्ज या आक्रामक पुलिस कार्रवाई न करने के लिए चंडीगढ़ पुलिस की तारीफ की और उन्हें फूल भेंट किए.

प्रदर्शन आमतौर पर शाम 5:30 बजे शुरू होते थे और दो से तीन घंटे तक चलते थे. इनमें ऐसे लोग भी एक साथ आते थे जो शायद किसी और स्थिति में एक मंच पर नहीं आ पाते. एक समय ऐसा भी आया, जब अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समूहों के नेता और प्रतिनिधि पेपर लीक का विरोध करने के मकसद से एकजुट हुए.

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प्रदर्शनकारियों में बंटे फ्री मोमो, आइसक्रीम, लस्सी

सेक्टर 17 के दुकानदार अंकुश ने छात्रों के लिए मुफ़्त मोमो लंगर का आयोजन किया. वहीं, एक और दिन लोगों ने प्रदर्शनकारियों के बीच आइसक्रीम, बिस्कुट, कोल्ड ड्रिंक्स और लस्सी बांटी. 

विरोध प्रदर्शन में शामिल एक रिटायर्ड प्रिंसिपल ने कहा कि ये मुद्दा सिर्फ़ छात्रों का नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है. सेना में एक जवान के पिता भी इस भीड़ में शामिल हुए और कहा कि युवाओं की आवाज सुनी जानी चाहिए. पांचवें दिन तक, इस विरोध प्रदर्शन का अपना एक अलग ही अंदाज बन गया था.

स्पाइडर मैन का मास्क पहनकर आए प्रदर्शनकारी

चंडीगढ़ के प्लाज़ा में प्रदर्शन के पांचवें दिन एक प्रदर्शनकारी स्पाइडर-मैन का मास्क पहनकर आया, जबकि एक अन्य ने सांकेतिक तौर पर अपनी दाढ़ी सफेद रंग ली और साथी प्रदर्शनकारियों के बीच मेलोडी टॉफी बांटी. छात्रों के विरोध प्रदर्शन के तौर पर शुरू हुई यह मुहिम पांचवें दिन तक एक बड़े जन-आंदोलन में बदल गई, जिसमें छात्र, अभिभावक, वरिष्ठ नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक प्रतिनिधि एक साथ आए. 

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नारें, गानों, कविताओं और कभी-कभी होने वाले सन्नाटे के बीच सेक्टर 17 प्लाज़ा एक ऐसी जगह बन गया, जहां अलग-अलग तरह के लोग इकट्ठा हुए. उन्होंने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए और युवाओं की बात सुने जाने की मांग की. इन सबके बीच छह साल का अमृत अपने पिता के कंधों पर बैठा था. उसने एक पोस्टर पकड़ा हुआ था और भगत सिंह के बारे में सवाल पूछ रहा था- शायद वह इस बात की सबसे छोटी मिसाल था कि प्रदर्शनकारी असल में किसके लिए लड़ रहे थे. अगली पीढ़ी को सपना देखने, पढ़ने और एक ऐसा भविष्य बनाने का अधिकार देने के लिए जिस पर वे भरोसा कर सकें.

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