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कर्नाटक चुनाव: बीजेपी ने तेजस्वी सूर्या, कांग्रेस ने पायलट-दिग्विजय को नहीं बनाया स्टार प्रचारक, जानें क्या हैं संकेत

कर्नाटक चुनाव के लिए बीजेपी और कांग्रेस अपने-अपने स्टार प्रचारकों की लिस्ट जारी कर चुकी हैं. बीजेपी ने इस लिस्ट में युवा सांसद तेजस्वी सूर्या को जगह नहीं दी है, जबकि वह बैंगलोर दक्षिणी सीट से सांसद भी हैं. इसी तरह कांग्रेस ने अपनी प्रचारकों की लिस्ट जारी कर उस सबको हैरान कर दिया क्योंकि उसमें सचिन पायलट और दिग्विजय सिंह का नाम नहीं है. दोनों पार्टियों के इस एक्शन के अब कई मायने निकाले जा रहे हैं.

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बीजेपी और कांग्रेस ने जारी कर दी है स्टार प्रचारकों की लिस्ट (फाइल फोटो)
बीजेपी और कांग्रेस ने जारी कर दी है स्टार प्रचारकों की लिस्ट (फाइल फोटो)

कर्नाटक विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी और कांग्रेस ने अपनी तैयारी तेज कर दी है. उन्होंने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी है. चुनाव प्रचार भी तेज कर दिया है. दोनों ही पार्टियों ने अपने स्टार प्रचारकों की लिस्ट भी जारी कर दी है लेकिन इन लिस्ट के कारण राजनीति में चर्चा का बााजार गर्म हो गया है. एक तरफ जहां बीजेपी ने कट्टर हिंदू की छवि रखने वाले अपने फायर ब्रांड युवा नेता तेजस्वी सूर्या का नाम इस लिस्ट से हटा दिया है तो वहीं कांग्रेस ने राजस्थान के पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट और मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह को प्रचारकों की लिस्ट में शामिल ही नहीं किया है. तो आइए समझते हैं कि ऐसी क्या वजह हो सकती है कि इन दलों को यह कदम उठाना पड़ा.

अरविंद केजरीवाल का विरोध करने पर तेजस्वी सूर्या हिरासत में ले लिए गए थे

तो सबसे पहले तेजस्वी सूर्या की बात

बीजेपी की युवा इकाई के युवा मोर्चा राष्ट्रीय अध्यक्ष और बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या आलाकमान की गुड बुक में हैं. हिंदुत्व की विचारधारा वाले तेजस्वी को पिछले साल गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने स्टार प्रचारकों की लिस्ट में शामिल किया था. इस साल उनके अपने राज्य में ही जब चुनाव होने रहा है तो बीजेपी ने उन्हें प्रचारकों की लिस्ट में जगह ही नहीं दी. युवाओं में उनकी काफी लोकप्रियता है. वह मूल रूप से कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले के रहने वाले हैं. बासवांगुडी विधानसभा से विधायक एल.ए. रविसुब्रमण्यन उनके चाचा हैं. उनका क्षेत्र में अच्छा खासा प्रभाव है, इसके बाद भी उन्हें प्रचार से दूर कर दिया गया है. इसके अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं.

पिछले दिनों कर्नाटक के पूर्व सीएम और बीजेपी के वरिष्ठ नेता बी एस येदियुरप्पा ने एक ऐसा बयान दिया था, जो कर्नाटक में पार्टी की बदली लाइन की ओर इशारा कर रहता है. इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि हिंदुओं और मुसलमानों को "भाइयों और बहनों" की तरह रहना चाहिए. हिजाब और हलाल से जुड़े विवाद गैर जरूरी हैं. उन्होंने कहा था, 'मैं ऐसी चीजों का समर्थन नहीं करने जा रहा हूं. मैंने शुरू से ही यह स्टैंड लिया है. ये ऐसे मुद्दे थे जो जरूरी नहीं थे. मैं ऐसी चीजों का समर्थन नहीं करूंगा.' वहीं तेजस्वी के बयान उनके बयान से अलग रहे हैं, जैसे-

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- तेजस्वी सूर्या ने पिछले साल ऑस्ट्रेलिया इंडिया यूथ डायलॉग कार्यक्रम के दौरान कहा था कि इस्लाम का इतिहास रक्तपात और हिंसा से भरा हुआ है. भारत पर मुगलों का हमला यहूदियों पर किए गए अत्याचार जैसा था. उनके इस बयान का ऑस्ट्रेलिया में मुस्लिम छात्रों, संगठनों और धार्मिक संगठनों ने कई जगह जमकर विरोध किया था.

- तेजस्वी ने 2021 में उडुपी कृष्ण मठ में कहा था कि ईसाई धर्म और इस्लाम केवल धर्म नहीं हैं. वे राजनीति साम्राज्यवादी विचारधारा हैं. हिंदुओं को यह समझना जरूरी है कि उनके दुश्मन कौन हैं. 

एक-दो साल पहले दिए तेजस्वी सूर्या के बयानों और इस महीने दिए येदियुरप्पा के बयानों में जो अंतर आया है, क्या इससे अब यह माना जाए कि तेजस्वी सूर्या के बयानों के रिकॉर्ड को देखते हुए बीजेपी इस बार कोई चान्स नहीं लेना चाहती. 

वहीं कांग्रेस ने लिस्ट में तेजस्वी का नाम न होने पर उन्हें 'नफरती चिंटू' करार देते हुए कहा कि उनके राज्य में भी किसी को उनकी परवाह नहीं है. उनके लिए ऊंचे घोड़ों से नीचे उतरने का समय आ गया है. 

गहलोत सरकार के खिलाफ धरने पर बैठे थे सचिन

अब सचिन पायलट की करते हैं चर्चा

कर्नाटक चुनाव में प्रचार के लिए कांग्रेस ने स्टार प्रचारकों की लिस्ट से दो बड़े नामों की छंटनी कर दी है. इनमें से एक नाम पुराने कांग्रेसी दिग्विजय सिंह का है और दूसरा राजस्थान के पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट का. हैरानी की बात यह है कि पिछले साल गुजरात में हुए विधानसभा चुनावों में इन दोनों के नाम स्टार प्रचारकों की लिस्ट में शामिल थे. तो क्या माना जाए कि आलाकमान दोनों ही नेताओं से नाराज है और बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों में उनकी सक्रियता को खत्म करने का संकेत दे रहे हैं. 

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दरअसल 11 अप्रैल को सचिन पायलट वसुंधरा सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई की मांग को लेकर अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ गए थे. राजस्थान के प्रभारी सुखजिंदर रंधावा पायलट ने उन्हें रोकने के लिए कार्रवाई की चेतावनी भी दी थी लेकिन उन्होंने इसे नजरअंदाज कर दिया था.

वैसे सीएम पद की दावेदारी करने वाले सचिन पायलट पहले से ही गांधी परिवार के लिए मुश्किलें खड़ी करते रहे हैं. हालांकि उन्हें कई बार इस बात के स्पष्ट संकेत दिए जा चुके हैं कि पार्टी राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में ही आगे बढ़ेगी लेकिन इस पर भी वह गहलोत सरकार के खिलाफ बयान देने से बाज नहीं आ रहे हैं.

- मार्च में सचिन पायलट ने गहलोत सरकार पर हमला बोला था कि सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पदों पर नियुक्त होकर पार्टी कार्यकर्ताओं को उनका बकाया मिले. और सरकारी पद रेवड़ी की तरह न बांटे जाएं.

- इसके अलावा जब प्रदेश में डॉक्टर आंदोलन कर रहे थे, तब भी वह डॉक्टरों के साथ खड़े नजर आए थे. उन्होंने कहा था कि गहलोत सरकार को प्रदर्शनकारी डॉक्टरों की बात सुननी चाहिए. 

- पुलवामा के शहीदों के परिवारों के मामले में सचिन पायलट ने अपनी सरकार पर निशाना साध दिया था. उन्होंने कहा था कि अगर इच्छा शक्ति है, तो हर चीज का समाधान निकल सकता है, लेकिन इस मामले में पुलिस का जैसे व्यवहार रहा वो निंदनीय है. 

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इसी तरह मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह भी कई बार कांग्रेस के खिलाफ बयानबाजी कर चुके हैं. अपने ही नेताओं पर आरोप लगाते आ रहे हैं. फरवरी में एक मीडिया संस्थान को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि मेरे खिलाफ माहौल चलता है. ये माहौल बीजेपी चलाती है, कांग्रेस के मेरे कुछ मित्र भी चलाते हैं. वे कहते हैं कि दिग्विजय सिंह को मत भेजिये, इनके जाने से वोट कट जाएंगे. इससे पहले दिग्विजय सिंह ने बयान दे दिया था कि केंद्र सरकार लगातार सर्जिकल स्ट्राइक करने की बात करती है, लेकिन उनमें कितने लोगों को मार गिराया, इसका कोई सबूत नहीं है. हालांकि राष्ट्रवाद के इस मुद्दे पर खुद को घिरता देख कांग्रेस ने उस समय दिग्विजय के इस बयान ने पलड़ा झाड़ लिया था.

यानी यह कहा जा सकता है कि दिग्विजय सिंह और सचिन पायलट के लिए स्टार प्रचारकों की लिस्ट में नाम न होना हाई कमान की तरफ से अल्टीमेटम है. इस पर भी अगर वे अपने तेवर नरम नहीं करते हैं तो भविष्य में सख्त एक्शन भी हो सकता है.

10 मई को होगा मतदान, 13 को घोषित होंगे परिणाम

कर्नाटक में इस बार एक चरण में ही विधानसभा चुनाव होगा. यहां 224 विधानसभा सीटों के लिए 10 मई को वोटिंग होगी जबकि 13 मई को चुनाव परिणाम जारी कर दिए जाएंगे. मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के मुताबिक राज्य में 5.21 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें पुरुष मतदाताओं की संख्या 2.6 करोड़ है, जबकि महिला मतदाताओं की संख्या 2.5 करोड़ है. 224 सदस्यीय सदन में कांग्रेस के पास 68 विधायक हैं. हालांकि, 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 80 सीट, जेडीएस ने 37 सीट और भाजपा ने 104 सीटों पर जीत दर्ज की थी.

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