तमिलनाडु के स्कूल शिक्षा मंत्री ए. राजमोहन ने शनिवार को फिर आरोप लगाया कि पिछली डीएमके सरकार के दौरान ‘पेरियार अरिवुलगम’ और राज्य की अन्य सार्वजनिक लाइब्रेरी के लिए किताबों की खरीद में गड़बड़ी हुई. उन्होंने इसे 'भारत का पहला एआई घोटाला' बताया.
विपक्षी डीएमके ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया और सरकार से किताबों की खरीद से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग की. शनिवार को यहां प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंत्री ए. राजमोहन ने आरोप लगाया कि पिछली डीएमके सरकार ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कर कम गुणवत्ता और आपत्तिजनक किताबें तैयार कराईं. इन किताबों में ‘थामरई मुरली’, ‘कमलाम्बल करुणानिधि’ और ‘त्रिशा विजय’ जैसे बनाए गए लेखकों के नाम इस्तेमाल किए गए.
मंत्री ने आरोप लगाया कि एक ही प्रकाशक ‘अगल विलक्कु पथिप्पगम’ से हजारों किताबों की खरीद के आदेश 14 फरवरी को जारी किए गए और सात दिन के भीतर किताबें देने को कहा गया. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव से पहले मार्च में राज्य के खजाने से इन किताबों का भुगतान कर दिया गया. मंत्री ने कहा कि किताबों की सामग्री पूरी तरह मशीन से तैयार की गई है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि शास्त्रीय कृति ‘नालडियार’ में एक इंसान को दार्शनिक बताया गया है. उन्होंने डीएमके से तमिलनाडु के छात्रों और सिविल सेवा की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों से बिना शर्त माफी मांगने को कहा.
विशेष समिति बनाई जाएगी
राज्य सरकार ने औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है. मंत्री ने कहा कि कमाराजर, अन्ना और कलैग्नर शताब्दी लाइब्रेरी समेत कई लाइब्रेरी में हुई ऐसी खरीद की जांच के लिए एक विशेष समिति बनाई जाएगी.
डीएमके नेता आई. परंथामेन ने आरोपों को खारिज करते हुए इसे मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की सरकार की प्रशासनिक नाकामियों को छिपाने के लिए तैयार की गई “फर्जी कहानी” बताया. उन्होंने सवाल किया कि अगर किताबें खराब गुणवत्ता की हैं या उनमें गलतियां हैं, तो सरकार ने उन्हें तुरंत लाइब्रेरी से हटाने का आदेश क्यों नहीं दिया.
परंथामेन ने सरकार से सोशल मीडिया अभियान के बजाय आधिकारिक दस्तावेज जारी करने की मांग की. उन्होंने ऑनलाइन बैंक लेनदेन, खरीद आदेश की तारीख और विशेषज्ञ समितियों की सटीक सिफारिशें सार्वजनिक करने को कहा. डीएमके नेता ने कहा कि उनकी पार्टी की सरकार ने 2024 में सरकारी आदेश के जरिए किताबों की खरीद के लिए विशेषज्ञ समितियों के माध्यम से पारदर्शी ऑनलाइन खरीद नीति लागू की थी.
परंथामेन ने यह भी कहा कि विवादित किताबों पर लाइब्रेरी की मुहर जून 2026 में लगी थी, जबकि तब डीएमके का कार्यकाल खत्म हो चुका था. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार के दौरान मार्च में खरीदी गई किताबों को लेकर ऐसी कोई समस्या नहीं थी.
काल्पनिक लेखकों के नाम को लेकर लगाए गए आरोपों पर परंथामेन ने कहा कि उनकी पार्टी ‘त्रिशा विजय’ या ‘संगीता विजय’ जैसे नाम वाले लेखकों की किताबों को मंजूरी क्यों देगी. उन्होंने कहा कि डीएमके एक बौद्धिक आंदोलन है और उनकी पार्टी इस तरह राजनीति नहीं करती. यह विवाद सबसे पहले लेखक पेरुमल मुरुगन के जरिए सामने आया था. वह 137 सदस्यीय किताब चयन समिति का हिस्सा थे. सरकार ने उन्हें घोटाले का खुलासा करने वाला व्यक्ति बताया, जबकि डीएमके का कहना है कि मुरुगन जैसे समिति के सदस्यों को भी इन काल्पनिक किताबों के बारे में जानकारी नहीं थी. पार्टी ने असली जिम्मेदार लोगों का पता लगाने के लिए पारदर्शी जांच की मांग की.