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Know Your Laws: पैतृक संपत्ति में बेटियों का हक बेटों के बराबर, शादी के बाद भी खत्म नहीं होते अधिकार

भारत में बेटियों के संपत्ति अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट लगातार स्पष्ट संदेश दे रहा है कि हिंदू कानून के तहत बेटियां बेटों के बराबर उत्तराधिकारी हैं. बावजूद इसके सामाजिक सोच अब भी महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों से दूर रखती है. कानून बदलने के साथ समाज की मानसिकता में बदलाव भी जरूरी है, तभी वास्तविक समानता संभव होगी.

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सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में कहा है कि हिंदू कानून के तहत बेटियां अपने पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर हक रखती हैं. (Photo: ITG)
सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में कहा है कि हिंदू कानून के तहत बेटियां अपने पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर हक रखती हैं. (Photo: ITG)

भारत में बेटियों के संपत्ति अधिकारों को लेकर कानूनी लड़ाइयां लगातार बढ़ रही हैं. अदालतों में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है, जहां बेटियों को पैतृक संपत्ति में उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है. शाही परिवारों से लेकर सामान्य परिवारों तक, सामाजिक सोच अब भी कानून से पीछे नजर आती है. हाल ही में मेवाड़ राजघराने में संपत्ति विवाद का मामला चर्चा में रहा, जहां दिवंगत राजा की बेटियों ने दिल्ली हाई कोर्ट में वसीयत को चुनौती दी.

आरोप है कि राजा की निजी संपत्तियां पूरी तरह उनके बेटे के नाम कर दी गईं. वहीं फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने हैदराबाद के एक पुराने पारिवारिक संपत्ति विवाद में मध्यस्थता का निर्देश देते हुए कहा था कि लंबी कानूनी लड़ाई की बजाय समझौता बेहतर रास्ता हो सकता है. 15 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने एक अहम फैसले में दोहराया कि हिंदू कानून के तहत बेटियों को संपत्ति में बराबरी का अधिकार प्राप्त है.

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2005 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन से पहले भी बेटियों को पैतृक संपत्ति में पिता के हिस्से पर बराबर अधिकार था. यह अधिकार Notional Partition यानी काल्पनिक बंटवारे के सिद्धांत के तहत मान्य था. कोर्ट ने कहा कि बेटियां पैतृक और स्वयं अर्जित दोनों तरह की संपत्तियों में समान उत्तराधिकारी हैं. हालांकि सामाजिक स्तर पर अब भी कई परिवारों में बेटियों को शादी के समय उपहार देकर संपत्ति पर दावा छोड़ने की अपेक्षा की जाती है, जबकि बेटे पूरी संपत्ति के उत्तराधिकारी बन जाते हैं.

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यह कानून से ज्यादा सामाजिक सोच का मुद्दा

एडवोकेट वरुण चोपड़ा के मुताबिक, महिलाओं को संपत्ति अधिकार से वंचित करना कानून से ज्यादा सामाजिक सोच का मुद्दा है. कई महिलाएं पारिवारिक विवाद से बचने के लिए अपने अधिकारों का दावा नहीं करतीं, जबकि कई को अपने कानूनी अधिकारों की जानकारी ही नहीं होती. 2005 में संसद ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 में संशोधन कर बेटियों को बेटों के पैतृक संपत्तियों में समान सहभाजक (Coparcener) का दर्जा दिया. सहभाजक का मतलब हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) में जन्म से मिलने वाला वह अधिकार है, जिसके तहत व्यक्ति पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांग सकता है. इससे पहले बेटियां केवल पिता की मृत्यु के बाद उनके हिस्से की उत्तराधिकारी होती थीं, लेकिन संपत्ति के विभाजन की मांग नहीं कर सकती थीं.

सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के ऐतिहासिक विनीता शर्मा जजमेंट में इस सिद्धांत को और मजबूत किया. कोर्ट ने कहा कि बेटी जन्म से ही सहभाजक होती है और विवाह के बाद भी उसका अधिकार समाप्त नहीं होता. इसके बाद 2025 के राम चरण जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासी महिलाओं को भी समान उत्तराधिकार अधिकार देने की बात कही. कोर्ट ने कहा कि महिलाओं को संपत्ति अधिकार से वंचित करने वाली परंपराएं संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करती हैं. हालांकि, कई राज्यों के कानूनों में अब भी भेदभाव मौजूद है, खासकर कृषि भूमि के मामलों में.

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कई राज्यों के कानूनों में अब भी भेदभाव मौजूद

उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 में कृषि भूमि के उत्तराधिकार में विधवा, बेटे और अविवाहित बेटियों को प्राथमिकता दी गई है, जबकि विवाहित बेटियों को बाद में रखा गया है. भारत में अलग-अलग धर्मों के तहत उत्तराधिकार के नियम भी अलग हैं. मुस्लिम पर्सनल लॉ में जन्म से उत्तराधिकार का अधिकार नहीं होता और संपत्ति माता-पिता की मृत्यु के बाद ही विभाजित होती है. इसमें बेटों को आमतौर पर बेटियों से दोगुना हिस्सा मिलता है. वहीं भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत ईसाइयों में बेटियों और बेटों को समान अधिकार प्राप्त हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने हालिया बी.एस. ललिता मामले में भी स्पष्ट किया कि बाद में किया गया संपत्ति बंटवारा बेटियों के पहले से स्थापित अधिकारों को खत्म नहीं कर सकता. कोर्ट ने कहा कि बेटियों को हमेशा से पिता की संपत्ति में बराबरी का अधिकार प्राप्त रहा है. पिछले दो दशकों में भारत के उत्तराधिकार कानूनों में बड़ा बदलाव आया है, लेकिन सामाजिक स्तर पर बेटियों को बराबरी का अधिकार देने में अब भी हिचक दिखाई देती है. वास्तविक समानता तभी आएगी, जब समाज भी कानून की तरह बेटियों को बराबर उत्तराधिकारी मानेगा.

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