भारत में किसान अपने खेतों में खरपतवार नाशक के रूप में एजेंट ऑरेंज के मुख्य घटक 2,4-D, पैराक्वाट, ग्लाइफोसेट, एसीफेट का इस्तेमाल कर रहे हैं. WHO की कैंसर एजेंसी इन सभी केमिकल्स को संभावित कैंसरकारी मान चुकी है, लेकिन इसके बावजूद भी भारत ऐसे केमिकल्स इस्तेमाल हो रहे हैं जो यूरोप और दुनिया के कई देश में प्रतिबंधित है. पर ये हमारे खेतों से हमारी थाली तक पहुंच रहे हैं. इसके अलावा भारत के खेतों में 'डाइमेथोएट' (dimethoate) का भी इस्तेमाल हो रहा है जो DNA को नुकसान पहुंचाने की चिंताओं के कारण 31 देशों में बैन है, लेकिन भारत में बिक रहा है.
पैराक्वाट एक ऐसा खतरनाक शाकनाशी (हर्बिसाइड) है जो दुनिया के एक बड़े हिस्से में अपनी अत्यधिक जहरीला होने के कारण प्रतिबंधित है, लेकिन भारत में इसका बाजार लगातार फल-फूल रहा है. इस रसायन को सबसे पहले 1882 में ऑस्ट्रियाई रसायनज्ञ ह्यूगो वीडेल ने तैयार किया था और 1950 के दशक में ब्रिटेन की इंपीरियल केमिकल इंडस्ट्रीज ने 'ग्रामोक्सोन' नाम से इसका व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू किया था. बाद में ये स्विस कंपनी सिनजेंटा और अब चीन की केमचाइना के स्वामित्व में है.
यूरोपीय संघ ने साल 2007 में ही पैराक्वाट के कृषि इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी थी और आज दुनिया के कम से कम 74 देशों में ये प्रतिबंधित है.
जैव-चिकित्सीय शोधों के अनुसार, इसकी थोड़ी-सी मात्रा भी जानलेवा साबित हो सकती है और इसके जहर की कोई निश्चित मारक दवा (एंटिडोट) उपलब्ध नहीं है. इसके संपर्क में आने से फेफड़ों को गंभीर नुकसान, किडनी फेल होना और पार्किंसंस रोग का खतरा बहुत बढ़ जाता है.
सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है मामला
राजस्थान के किसान महापंचायत जैसे किसान संगठनों ने पैराक्वाट पर कड़े प्रतिबंध लगाने की मांग की है. देश के कुछ राज्यों, जिनमें केरल और तेलंगाना शामिल हैं, ने इस शाकनाशी के खिलाफ कड़े कदम उठाए हैं. इंडिया टुडे/आजतक डिजिटल के कृषि, पर्यावरण और जलवायु से जुड़े पोर्टल 'किसान तक' के संपादक और कृषि विशेषज्ञ ओम प्रकाश के अनुसार, इस कीटनाशक पर देशव्यापी प्रतिबंध लगाने की मांग वाली एक याचिका वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है.
भारत में कंपनियां कमा रही मौटा मुनाफा
ग्लाइफोसेट दुनिया और भारत में सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाले खरपतवारनाशकों में से एक है. स्विस रसायनज्ञ हेनरी मार्टिन द्वारा खोजे गए इस रसायन को अमेरिकी कंपनी मोनसेंटो ने 1974 में 'राउंडअप' नाम से बाजार में उतारा था. साल 2015 में डब्ल्यूएचओ की कैंसर एजेंसी (IARC) ने इसे 'संभावित कैंसरकारी' (ग्रुप 2ए) की कैटेगरी में डाल दिया, जिससे दुनिया भर के नियामकों के बीच एक बड़ी बहस छिड़ गई.
नागरिकों के स्वास्थ्य से खिलवाड़
अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी जैसे नियामक भले ही इसके कैंसर से संबंध को नकारते हों, लेकिन मोनसेंटो को खरीदने वाली कंपनी बायर ने कैंसर के दावों वाले मुकदमों को सुलझाने के लिए अरबों डॉलर का भुगतान किया है. भारत में बहुराष्ट्रीय और घरेलू कंपनियां इसके जरिए हर साल अरबों डॉलर का मुनाफा कमा रही हैं.
'किसान तक' के संपादक ओम प्रकाश का कहना है कि भारतीय नियामक कंपनियों के डेटा के आधार पर इसे सुरक्षित बता रहे हैं जो नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है.
वियतनाम युद्ध में हुआ था इस्तेमाल
वहीं, साल 1940 के दशक में विकसित हुआ 2,4-डी वही रसायन है जो वियतनाम युद्ध में अमेरिका द्वारा इस्तेमाल किए गए खतरनाक 'एजेंट ऑरेंज' का मुख्य हिस्सा था. भारत में इसका इस्तेमाल गेहूं, धान, मक्का और गन्ने की फसलों में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए सबसे आम तौर पर किया जाता है. साल 2015 में इसे भी 'मानव के लिए संभावित रूप से कैंसरकारी' (ग्रुप 2बी) की श्रेणी में रखा गया था.
कपास, सब्जियों और दालों पर इस्तेमाल होने वाले ऑर्गेनोफॉस्फेट कीटनाशक 'एसेफेट' से जुड़ी चिंताएं कैंसर से ज्यादा पर्यावरण और परागणकर्ताओं (मधुमक्खियों और तितलियों) पर पड़ने वाले इसके घातक प्रभाव को लेकर हैं.
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि एसेफेट के संपर्क में आने से शहद पैदा करने वाली मधुमक्खियों और अन्य लाभकारी कीड़ों को भारी नुकसान पहुंचता है, जो पौधों में फल और बीज बनाने के लिए परागण करते हैं.
मधुमक्खियों की आबादी में गिरावट से उन सभी फलों, सब्जियों और तिलहन फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है जो कीट परागण पर निर्भर हैं. हालांकि, भारत ने जोखिम भरे कीटनाशकों की समीक्षा की है. लेकिन एसेफेट अभी-भी पंजीकृत है और किसान इसका इस्तेमाल एफिड्स, जैसिड्स, थ्रिप्स और सफेद मक्खियों को नियंत्रित करने के लिए बड़े पैमाने पर कर रहे हैं. इस सस्ते विकल्प के कारण देश में सुरक्षित और आधुनिक विकल्पों को अपनाने में देरी हो रही है.
उर्वरक लॉबी और इन रसायनों के समर्थक ये तर्क दे सकते हैं कि आधुनिक कृषि इन कीटनाशकों के बिना प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकती और इन पर प्रतिबंध लगाने से फसलों की पैदावार कम होगी और लागत बढ़ेगी. लेकिन दूसरी तरफ पश्चिमी देशों द्वारा खारिज किए जा रहे इन रसायनों के लिए भारत एक बड़ा डंपिंग ग्राउंड बनता जा रहा है. अब हमारे नीति निर्माताओं को ये तय करना होगा कि क्या किसी भारतीय के जीवन की कीमत किसी अन्य देश के नागरिक से कम है.
EU ने 365 भारतीय उत्पादों को किया अस्वीकार
डेक्कन हेराल्ड समाचार पत्र में 6 जून को छपी एक रिपोर्ट में यूरोपीय आयोग और यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण के डेटा का विश्लेषण किया गया. इसमें पाया गया कि EU के 27 सदस्य देशों ने मई 2024 और मई 2026 के बीच कीटनाशकों और भारी धातुओं (heavy metals) की मौजूदगी के कारण 365 भारतीय उत्पादों को चिह्नित किया और उन्हें अस्वीकार कर दिया.
भारत के सबसे बड़े व्यापारिक समूह, EU में भारतीय कृषि उत्पादों का निर्यात अस्वीकार होना कोई सुखद बात नहीं है. इससे भी ज़्यादा चिंताजनक और परेशान करने वाली बात लाखों भारतीयों द्वारा खाए जाने वाले भोजन की सुरक्षा है. कुछ केमिकल जिन्हें दूसरी जगहों पर बहुत जोखिम भरा माना जाता है, प्रतिबंधित किया गया है या जिनकी कड़ी जांच-पड़ताल होती है, उनका भारतीय खेतों में बेधड़क छिड़काव किया जाता है.
भारत के लिए स्थिति गंभीर है, क्योंकि यहां कैंसर पहले से ही सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक चुनौती बना हुआ है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के अनुसार, 2022 में भारत में कैंसर के अनुमानित 14.6 लाख नए मामले दर्ज किए गए. केंद्र सरकार ने कहा कि 2025 में ये संख्या लगभग 15.7 लाख तक पहुंच जाएगी. हालांकि, कैंसर के कई कारण होते हैं और किसी एक कीटनाशक से इसके मामलों में बढ़ोतरी की व्याख्या नहीं की जा सकती, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि 'संभावित' या 'संभव' कैंसरकारी पदार्थों के संपर्क में आने को जहां भी संभव हो, कम से कम किया जाना चाहिए.