पश्चिम बंगाल के सियासी इतिहास में बीजेपी की सरकार बन गई. ममता बनर्जी के मजबूत दुर्ग को ध्वस्त कर कमल खिलाने वाले शुभेंदु अधिकारी के हाथों में सत्ता की कमान सौंपी गई हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह सहित बीजेपी के दिग्गज नेताओं की मौजूदगी में शुभेंदु अधिकारी ने कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.
शुभेंदु अधिकारी के साथ दिलीप घोष, अग्निमित्रा पॉल, निशीथ प्रामाणिक, अशोक कीर्तनिया और खुदीराम टुडू ने मंत्री पद की शपथ ली. बीजेपी ने शुभेंदु टीम के जरिए 'सोशल इंजीनियरिंग' और 'क्षेत्रीय संतुलन' का एक बेहतरीन संतुलन बनाने की कोशिश की है.
बंगाल में 'टीम शुभेंदु' के गठन में बीजेपी ने जिस बारीकी से जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों के धागे को पिरोया हैं, वह साफ बताता है कि पार्टी अब बंगाल में केवल 'ध्रुवीकरण' के भरोसे नहीं, बल्कि 'प्रतिनिधित्व' के फॉर्मूले पर सत्ता की लंबी पारी खेलने के लिए की कवायद में है.
शुभेंदु के जरिए बीजेपी ने साधा सियासी बैलेंस
पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक 'वर्ग संघर्ष' का बोलबाला रहा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में 'पहचान की राजनीति' और 'जातिगत समीकरणों' ने अपनी पैठ गहरी कर ली है. बीजेपी ने शुभेंदु अधिकारी को सीएम बनाने के साथ जिस तरह से उनकी टीम में नेताओं का चयन किया गया,उसने साफ कर दिया कि बीजेपी अब बंगाल में उसी 'सोशल इंजीनियरिंग' के फॉर्मूले पर काम कर रही है, जिसने उसे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में सफलता दिलाई है.
शुभेंदु अधिकारी की 'टीम' और मंत्री पद के लिए चुने गए चेहरों को अगर जाति के चश्मे से देखें, तो बीजेपी ने बंगाल के हर बड़े सियासी आधार वाले वोट बैंक को साधने का दांव चला है. बंगाल की राजनीति में 'भद्रलोक' (मुख्यतः ब्राह्मण, कायस्थ और वैद्य) का हमेशा से दबदबा रहा है. बीजेपी के पहले सीएम बने शुभेंदु अधिकारी खुद एक प्रभावशाली ब्राह्मण परिवार से आते हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक ताकत का आधार माहिश्य बाहुल्य मेदिनीपुर रहा है
बीजेपी ने उन्हें सीएम बनाकर बंगाल के 'भद्रलोक' को यह संदेश दिया कि नेतृत्व एक अनुभवी और अपनी मिट्टी से जुड़े व्यक्ति के हाथ में है. शुभेंदु के जरिए पार्टी ने न केवल सवर्ण मतदाताओं को साधा है, बल्कि राज्य की सबसे बड़ी गैर-आरक्षित जातियों में से एक (माहिश्य) के बीच अपनी पैठ बनाए रखने का है. उन्हें सत्ता की कमान देकर संदेश दिया कि पार्टी राज्य के पारंपरिक नेतृत्व और बौद्धिक वर्ग का सम्मान करती है.
शुभेंदु बंगाल में अब सवर्ण और भद्रलोक चेहरा है. शुभेंदु न केवल सवर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि पूर्वी मेदिनीपुर के प्रभावशाली माहिश्य समुदाय के बीच भी उनकी गहरी पैठ है. भवानीपुर से ममता बनर्जी को हराकर उन्होंने खुद को बंगाल के नए 'जननेता' के रूप में स्थापित किया है. शुभेंदु की स्वीकार्यता न केवल मेदिनीपुर क्षेत्र में है, बल्कि पूरे बंगाल के सवर्ण समाज में वे एक सशक्त आवाज बनकर उभरे हैं.
मतुआ और राजवंशी समाज पर पकड़ बनाए रखने का दांव
बीजेपी जानती है कि दक्षिण बंगाल की सत्ता का रास्ता मतुआ (नमोशूद्र) समुदाय की बस्तियों से होकर गुजरता है. दक्षिण बंगाल, विशेषकर उत्तर और दक्षिण 24 परगना और नदिया जिलों में मतुआ (नमोशूद्र) समुदाय हार-जीत तय करता है. बीजेपी ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग में मतुआ समाज से आने वाले अशोक कीर्तनिया को शपथ ग्रहण के पहले दिन मंत्री बनाकर सियासी संदेश दिया है. सीएए (CAA) के वादे के बाद अब कैबिनेट में मतुआ समाज के चेहरों को प्रमुखता देना बीजेपी की 'कमिटमेंट पॉलिटिक्स' का हिस्सा है.
मतुआ समुदाय के प्रतिनिधियों को मंत्री बनाकर बीजेपी ने उत्तर 24 परगना और नदिया जैसे जिलों में तृणमूल कांग्रेस के बचे-खुचे आधार को ढहाने की कोशिश की है. यह संदेश दिया गया है कि मतुआ अब सिर्फ 'वोट बैंक' नहीं, बल्कि 'सत्ता के भागीदार' हैं. कैबिनेट में मतुआ चेहरों को शामिल करना यह दर्शाता है कि सीएए (CAA) और नागरिकता के वादे के साथ-साथ बीजेपी उन्हें सत्ता में भागीदारी भी दे रही है.
उत्तर बंगाल लंबे समय से उपेक्षा का आरोप लगाता रहा है. बीजेपी ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग में राजवंशी समुदाय को 'सिर आंखों' पर बिठाया है. शुभेंदु टीम में राजवंशी समाज से आने वाले निशीथ प्रामाणिक को मंत्री बनाकर बीजेपी ने कूचबिहार, जलपाईगुड़ी और दिनाजपुर के बेल्ट को यह विश्वास दिलाया है कि बंगाल की सरकार अब केवल 'कोलकाता' केंद्रित नहीं रहेगी.
बीजेपी यह कदम टीएमसी के उस नैरेटिव को काटने के लिए है जिसमें बीजेपी को 'बाहरी' बताया जाता था. अब राजवंशी समाज के प्रमाणिक के जरिए बीजेपी 'क्षेत्रीय पहचान' और 'राष्ट्रवाद' का फ्यूजन तैयार कर रही है. इस तरह बीजेपी ने राजवंशी वोटों पर अपनी पकड़ को बनाए रखने का दांव चला है.
जंगलमहल की 'लाल माटी' और आदिवासी अस्मिता
पुरुलिया, बांकुरा और झाड़ग्राम जैसे जिलों में संथाल और मुंडा आदिवासियों ने बीजेपी को एकतरफा वोट दिया था. 'टीम शुभेंदु' में आदिवासी समाज से आने वाले खुदीराम टुडू को मंत्री बनाकर सिर्फ एससी वोट ही नहीं बल्कि बीजेपी ने 'जंगलमहल' की लाल माटी के कर्ज को चुकाने की कोशिश की है. यह न केवल सरकार में सिर्फ भागीदारी है, बल्कि आरएसएस के उन दशकों पुराने सेवा कार्यों का राजनीतिक परिणाम भी है, जिसने इस क्षेत्र में वामपंथ को उखाड़ फेंका.
खुदीराम टुडू आदिवासी (संथाल) के चहेरे हैं. जंगलमहल के आदिवासी वोटरों ने बीजेपी की जीत में बड़ी भूमिका निभाई है. खुदीराम टुडू को मंत्रिमंडल में शामिल करना इस क्षेत्र के आदिवासियों के मान-सम्मान और विकास से जोड़कर देखा जा रहा है.
महिलाओं और युवाओं का 'बंगाली कनेक्शन'
ममता बनर्जी का सबसे बड़ा किला 'महिला वोट बैंक' रहा है. इसे मजबूत बनाए रखने के लिए बीजेपी ने शुभेंदु अधिकारी की कैबिनेट में अग्निमित्रा पॉल को मंत्री बनाया है. इस तरह महिला मंत्रियों को न केवल शामिल किया गया, बल्कि उन्हें भारी-भरकम विभाग भी सौंपे जा सकते हैं. अग्निमित्र सिर्फ बीजेपी की महिला फेस ही नहीं बल्कि शहरी भद्रलोक चेहरे हैं, जो कायस्थ समुदाय से आती हैं. बंगाल में कायस्थ वोटर बड़ी संख्या में है, जिसे साधे रखने के लिए उन्हें कैबिनेट में जगह दी गई है.
अग्निमित्रा पॉल आसनसोल से आती हैं. अग्निमित्रा पॉल के जरिए बीजेपी ने महिला सशक्तिकरण और शहरी मध्यम वर्ग को साधा है. एक फैशन डिजाइनर से राजनेता बनीं अग्निमित्रा 'आधुनिक और सशक्त बंगाली महिला' का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो टीएमसी के महिला वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए जरूरी है.अग्निमित्रा पॉल जैसे चेहरों के जरिए बीजेपी ने आधुनिक, शहरी और कामकाजी बंगाली महिलाओं के बीच अपनी छवि को 'प्रो-वुमेन' बनाने की सफल कोशिश की है.
दिलीप घोष के जरिए ओबीसी को संदेश
शुभेंदु अधिकारी की कैबिनेट में दिलीप घोष को शामिल करना बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग का सबसे मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है. दिलीप घोष केवल एक नेता नहीं, बल्कि बंगाल में बीजेपी के उस उत्थान के प्रतीक हैं, जिसने पार्टी को शून्य से शिखर तक पहुंचाया. दिलीप घोष सद्गोप समुदाय से आते हैं, जो बंगाल में एक प्रभावशाली पिछड़ी जाति है. बंगाल की कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा ओबीसी और पिछड़ी जातियों का है. लंबे समय तक ये जातियां वामपंथ और फिर टीएमसी के साथ रहीं.
दिलीप घोष को सत्ता के केंद्र में लाकर बीजेपी ने संदेश दिया है कि पार्टी 'भद्रलोक' की राजनीति से आगे बढ़कर पिछड़ों और वंचितों को नेतृत्व सौंपने में विश्वास रखती है. यह कदम राज्य के माहिश्य, तेली और सद्गोप जैसे समुदायों को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश है. दिलीप घोष आरएसएस की पृष्ठभूमि के लिए जाने जाते हैं, वे बीजेपी के उन चुनिंदा नेताओं में से हैं जिनकी पकड़ जंगलमहल से लेकर उत्तर बंगाल तक के ग्रामीण क्षेत्रों में बेहद मजबूत है. बीजेपी ने 'अनुभव और आक्रामकता' का एक ऐसा कॉकटेल तैयार किया है, जो टीएमसी के जमीनी कैडर का मुकाबला करने के लिए अनिवार्य है.
क्षेत्रीय संतुलन, उत्तर से दक्षिण तक 'वन बंगाल'
ममता सरकार पर अक्सर आरोप लगते थे कि उनका ध्यान सिर्फ कोलकाता और आसपास के इलाकों पर रहता है. शुभेंदु कैबिनेट की बनावट में क्षेत्रीय संतुलन का खास ख्याल रखा गया है. बीजेपी ने उत्तर बंगाल के चाय बागान और राजवंशी हितों के लिए प्रतिनिधित्व दिया है. इतना ही नहीं अपनी मजबूत गढ़ जंगलमहल को साधने की है, जहां पर आदिवासी और पिछड़े वर्ग बीजेपी का बड़ा वोटबैंक है. आसनसोल-दुर्गापुर क्षेत्र से श्रमिक वर्ग की आवाज. मछुआरा समुदाय और सुंदरबन क्षेत्र की नुमाइंदगी.
बीजेपी ने शुभेंदु अधिकारी के जरिए वह कर दिखाया है जो कभी वामपंथियों ने 'वर्ग' के नाम पर और ममता ने 'मां, माटी, मानुष' के नाम पर किया था. लेकिन बीजेपी का यह मॉडल 'कास्ट प्लस हिंदुत्व' का है. ब्राह्मण को नेतृत्व, मतुआ को सुरक्षा, राजवंशी को सम्मान और आदिवासी को अधिकार.बीजेपी की यह वह 'सोशल इंजीनियरिंग' है जिसने ममता बनर्जी के अभेद्य दुर्ग को ढहा दिया,
शुभेंदु अधिकारी की यह कैबिनेट सिर्फ सरकार चलाने के लिए नहीं है, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव और बंगाल के सामाजिक ताने-बाने में बीजेपी को 'स्थायी' बनाने के लिए डिजाइन की गई है. बंगाल में अब 'दीदी' के करिश्मे का मुकाबला बीजेपी के 'सोशल फॉर्मूले' से है।. 'टीम शुभेंदु' की यह तस्वीर बंगाल की राजनीति के नए अध्याय की शुरुआत है.