शिवसेना चुनाव चिह्न विवाद पर वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने दलील दी तो जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने पूछा कि आखिर निर्वाचन आयोग ने तृणमूल कांग्रेस और पूर्व में हुए पार्टियों में विभाजन के बाद अपनाई गई स्थापित प्रक्रिया पर अमल क्यों नहीं किया.
उन स्थितियों में भी तो आयोग ने मूल पार्टी का नाम और निशान फ्रीज कर दिया था. सभी धड़ों को उनकी पसंद और प्राथमिकता के आधार पर अलग नाम और निशान दिए थे. तो शिवसेना के मामले में ऐसा क्यों किया गया.
इस बीच सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ के समक्ष वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने कहा कि राजनीतिक दल बनाम विधायी दल ही बहस का मुख्य मुद्दा है. क्योंकि निर्वाचन आयोग ने भी माना है कि शिवसेना के शिंदे और ठाकरे गुटों के बीच विवाद सिर्फ विधायकों तक सीमित नहीं था. यह पूरे राजनीतिक दल में था.
दोनों के बीच एक गहरा संबंध है. यद्यपि यह परीक्षण कमजोर माना जा सकता है, लेकिन किसी भी फैसले ने इसे पूरी तरह खारिज नहीं किया है. स्थिति के अनुसार उपयुक्त परीक्षण चुनने का पूरा अधिकार चुनाव आयोग का है. विधानसभा से अयोग्य ठहराए जाने का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति राजनीतिक दल से भी बाहर हो गया है. अध्यक्ष (Speaker) का फैसला चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र को प्रभावित नहीं करता.
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार चुनाव चिह्न को लंबे समय तक फ्रीज नहीं रखा जा सकता. जैसे ही आयोग तय कर लेता है कि कौन सा गुट असली पार्टी है, उसे आरक्षित चिह्न आवंटित करना ही होता है. बार-बार फैसला बदलने से चुनाव चिह्न पेंडुलम की तरह घूमता रहेगा, जिससे अराजकता फैलेगी. आयोग का फैसला तत्कालीन वोटों, सीटों और सदस्यता के आधार पर पूरी तरह तर्कसंगत है.
सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले में अगली सुनवाई मंगलवार और बुधवार को दो बजे से करेगा. शिंदे गुट की दलीलें पूरी होने के बाद अब ठाकरे गुट के वकील कपिल सिब्बल प्रतिउत्तर देंगे.